
27 मई, 2026 को भारत के संवैधानिक इतिहास, विधायी राजनीति और सामाजिक सुधार के क्षेत्र में एक अत्यंत युगांतरकारी घटनाक्रम सामने आया है। असम विधानसभा (Assam Legislative Assembly) ने मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार द्वारा पटल पर रखे गए समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code – UCC) विधेयक, 2026 को ध्वनिमत से पारित कर दिया है। इसके साथ ही असम, देश के दो अन्य राज्यों उत्तराखंड और गुजरात के बाद इस ऐतिहासिक और दूरगामी कानून को मंजूरी देने वाला भारत का तीसरा राज्य बन गया है।
यह विधेयक असम के सामाजिक और जनसांख्यिकीय (Demographic) ढांचे को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। असम का यह यूसीसी मॉडल बहु-सांस्कृतिक ताने-बाने को अक्षुण्ण रखने और कुछ सामाजिक कुप्रथाओं पर कड़ा प्रहार करने के बीच एक अनूठा संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है। विधेयक के तहत राज्य के सभी अनुसूचित जनजातियों (Scheduled Tribes – ST) को इस कानून के दायरे से पूरी तरह बाहर (Exempted) रखा गया है। इसके साथ ही, सामाजिक सुरक्षा और महिला अधिकारों को सुदृढ़ करने के लिए इस कानून में बहुविवाह (Bigamy/Polygamy) के लिए सात वर्ष के कड़े कारावास और लिव-इन रिलेशनशिप (Live-in Relationships) का पंजीकरण न कराने पर तीन महीने की जेल जैसे अत्यंत कड़े और दंडात्मक प्रावधान (Punitive Measures) किए गए हैं।
भारतीय संविधान के भाग 4 के तहत समाहित राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों (DPSP) के अनुच्छेद 44 में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि राज्य पूरे भारत के क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा। पिछले कई दशकों से यह विषय भारत की राजनीति में सबसे संवेदनशील और विवादास्पद बहसों का केंद्र रहा है।
चूंकि विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे विषय संविधान की समवर्ती सूची (Concurrent List) के अंतर्गत आते हैं, इसलिए राज्य सरकारों को भी इन पर कानून बनाने का पूर्ण वैधानिक अधिकार प्राप्त है। असम में यूसीसी का पारित होना पूर्वोत्तर भारत (Northeast India) की भू-राजनीति के लिहाज से एक बहुत बड़ा कदम है। यह असम में अवैध प्रवासन (Illegal Migration), जनसांख्यिकीय असंतुलन और बाल विवाह (Child Marriage) जैसी गंभीर आंतरिक चुनौतियों से निपटने के हिमंत बिस्वा सरमा सरकार के संकल्प की दिशा में सबसे बड़ा विधायी प्रहार माना जा रहा है।
असम विधानसभा द्वारा पारित इस विधेयक में कुछ ऐसे कड़े प्रावधान शामिल किए गए हैं जो समाज में दीर्घकालिक सुधार लाने के उद्देश्य से प्रेरित हैं असम सरकार पिछले दो वर्षों से बाल विवाह और बहुविवाह के खिलाफ एक बड़ा अभियान चला रही है। इस नए यूसीसी कानून ने इसे एक स्थाई कानूनी स्वरूप दे दिया है। विधेयक के अनुसार, असम के भीतर किसी भी नागरिक को (चाहे वह किसी भी धर्म, संप्रदाय या पंथ का हो) पहली पत्नी/पति के जीवित रहते हुए दूसरा विवाह (Bigamy or Polygamy) करने की अनुमति नहीं होगी। इस नियम का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को सात वर्ष के सश्रम कारावास (Seven Years Imprisonment) और भारी वित्तीय जुर्माने से दंडित किया जाएगा। यह प्रावधान सीधे तौर पर महिलाओं के वैवाहिक अधिकारों की रक्षा करता है और उन्हें लैंगिक न्याय (Gender Justice) प्रदान करता है।
उत्तराखंड मॉडल की तर्ज पर असम ने भी लिव-इन पार्टनरशिप को विनियमित (Regulate) करने के लिए कड़े कदम उठाए हैं, ताकि इसके आड़ में होने वाले अपराधों और महिलाओं के शोषण को रोका जा सके। असम में रह रहे किसी भी लिव-इन जोड़े के लिए एक निश्चित समय सीमा के भीतर स्थानीय रजिस्ट्रार के पास अपने रिश्ते का पंजीकरण कराना वैधानिक रूप से अनिवार्य होगा। यदि कोई जोड़ा ऐसा करने में विफल रहता है, तो उन्हें तीन महीने की जेल (Three Months Imprisonment), जुर्माना या दोनों भुगतने पड़ सकते हैं। इस पंजीकरण का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि लिव-इन रिलेशनशिप से उत्पन्न होने वाले बच्चों को वैध दर्जा मिले और अलग होने की स्थिति में महिला को भरण-पोषण (Maintenance) का कानूनी अधिकार प्राप्त हो सके।
असम यूसीसी विधेयक की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण विशेषता इसकी जनजातीय छूट (ST Exemption) नीति है। पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में जनजातीय संस्कृतियों, उनके पारंपरिक कानूनों (Customary Laws) और जीवन शैली की रक्षा करना एक अत्यंत संवेदनशील और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा विषय है। असम के भीतर बोडो, कार्बी, डिमासा और कई अन्य जनजातीय समुदाय निवास करते हैं, जिनके अपने पारंपरिक विवाह और संपत्ति कानून हैं। भारतीय संविधान की छठी अनुसूची (Sixth Schedule) इन क्षेत्रों को स्वायत्तता प्रदान करती है।
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने स्पष्ट किया कि यूसीसी का उद्देश्य किसी की प्राचीन संस्कृति को नष्ट करना नहीं है। अनुसूचित जनजातियों को इस कानून के दायरे से शत-प्रतिशत बाहर रखकर सरकार ने पूर्वोत्तर के जनजातीय संगठनों के भीतर उठने वाले विरोध के सुरों को पूरी तरह शांत कर दिया है। यह नीति यह दर्शाती है कि यूसीसी को बिना किसी सांस्कृतिक टकराव के भी विविधतापूर्ण राज्यों में सफलतापूर्वक लागू किया जा सकता है।
असम विधानसभा में इस विधेयक के पारित होने के दौरान सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच तीखी वैचारिक बहस भी देखने को मिली। कांग्रेस, एआईयूडीएफ (AIUDF) और अन्य क्षेत्रीय विपक्षी दलों का तर्क है कि इस विधेयक को लागू करने की जल्दबाजी राजनीतिक लाभ और जनसांख्यिकीय ध्रुवीकरण (Demographic Polarization) को बढ़ावा देने के लिए की गई है। कुछ मुस्लिम संगठनों और नेताओं का कहना है कि यह कानून उनके पर्सनल लॉ (Personal Law) और धार्मिक रीति-रिवाजों में सीधा सरकारी हस्तक्षेप है।
विपक्ष के हमलों का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री ने विधानसभा के पटल पर स्पष्ट किया कि यह कानून किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह “महिला सशक्तिकरण और सामाजिक न्याय” का सबसे बड़ा अस्त्र है। सरमा ने कहा कि असम की धरती पर अब किसी भी वर्ग की बेटी या बहन को बहुविवाह जैसी कुप्रथाओं का शिकार नहीं होने दिया जाएगा। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आधुनिक सुशासन (Modern Good Governance) का अर्थ यह है कि राज्य के सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक और उत्तराधिकार के बुनियादी नियम एक समान और प्रगतिशील होने चाहिए।
असम द्वारा इस विधेयक को पारित किए जाने के बाद भारत के विधायी और न्यायिक परिदृश्य पर इसके कई दीर्घकालिक प्रभाव पड़ना तय माना जा रहा है उत्तराखंड, गुजरात और अब असम के सफल विधायी प्रयोगों के बाद, एनडीए (NDA) शासित अन्य राज्य (जैसे मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान) भी अपने यहाँ यूसीसी विधेयकों को पारित करने की प्रक्रिया को तेज कर सकते हैं।
केंद्र सरकार के लिए इन तीन अलग-अलग राज्यों के मॉडलों (विशेषकर असम के जनजातीय छूट वाले मॉडल) का अध्ययन करके एक व्यापक राष्ट्रीय समान नागरिक संहिता (National UCC) का मसौदा तैयार करना काफी आसान हो जाएगा, जिसे संसद के दोनों सदनों में पेश किया जा सके। यद्यपि इस कानून को विभिन्न धार्मिक और सामाजिक संगठनों द्वारा भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) में चुनौती दी जा सकती है, लेकिन चूंकि यह राज्य सूची और समवर्ती सूची के अधिकारों के तहत पारित किया गया है और इसमें जनजातियों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की गई है, इसलिए इसकी वैधानिक वैधता अत्यंत मजबूत दिखाई देती है।
27 मई, 2026 को असम विधानसभा द्वारा समान नागरिक संहिता विधेयक को पारित किया जाना केवल एक विधिक बदलाव नहीं है, बल्कि यह असमिया समाज को आधुनिकता, सुरक्षा और लैंगिक समानता की ओर ले जाने वाला एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है। जब वैश्विक डिजिटल पटल पर गूगल का जेनेरेटिव यूआई इंटरनेट के ढांचे को बदल रहा है और देश के अन्य हिस्सों में कूटनीतिक व आर्थिक सुधार हो रहे हैं, तब असम ने सामाजिक सुशासन के मोर्चे पर एक बड़ी लकीर खींची है।
अनुसूचित जनजातियों को पूर्ण संरक्षण देकर उनकी सांस्कृतिक संप्रभुता का सम्मान करना और साथ ही बहुविवाह जैसी विसंगतियों पर 7 वर्ष की जेल का कड़ा प्रहार करना यह सिद्ध करता है कि हिमंत बिस्वा सरमा की सरकार परंपरा और आधुनिक प्रगति के बीच एक आदर्श सामंजस्य स्थापित करने में सफल रही है।


