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उत्तरजीविता के लिए बने मस्तिष्क और थक चुके दिल: चिकित्सा चमत्कारों के युग में युवा मृत्यु दर का संकट

क्यों जल रहे हैं युवा? संभावनाओं के युग में बर्नआउट

आज की दुनिया एक अजीब विरोधाभास के बीच खड़ी है। हमने वह सब कुछ हासिल कर लिया है जो हमारे पूर्वजों के लिए केवल कल्पना थी। चिकित्सा विज्ञान ने कैंसर जैसी बीमारियों को चुनौती दी है, तकनीक ने दुनिया को हमारी मुट्ठी में कर दिया है, और औसत जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy) अपने उच्चतम स्तर पर है। लेकिन इस “मेडिकल मिरेकल” के सुनहरे दौर में एक कड़वी सच्चाई भी पनप रही है: दुनिया भर में युवा अब अपनी उम्र से पहले दम तोड़ रहे हैं।

यह मौतें किसी महामारी या अकाल से नहीं हो रही हैं, बल्कि यह “निराशा” और “अलगाव” की परिणति हैं। लैंसेट ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज (2023) के हालिया विश्लेषण एक चौंकाने वाले तथ्य की पुष्टि करते हैं। जहाँ दुनिया के अधिकांश आयु समूहों में मृत्यु दर में गिरावट आई है, वहीं 15 से 39 वर्ष के आयु वर्ग के लोगों के बीच मृत्यु दर फिर से बढ़ने लगी है। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों में भी यह रुझान देखा जा रहा है। यह चिंताजनक है क्योंकि यह पीढ़ी वह है जिसे सबसे सुरक्षित और सबसे उन्नत युग में जीना चाहिए था। हम संक्रमणों से तो जीत गए, लेकिन हम उस अदृश्य शत्रु से हार रहे हैं जो हमारे युवाओं के भीतर पनप रहा है।

हमारा मस्तिष्क जैविक रूप से ‘उत्तरजीविता’ (Survival) के लिए बना है, लेकिन आज की दुनिया की मांगें हमारे जैविक विकास से कहीं आगे निकल गई हैं। आज के युवाओं के पास असीमित विकल्प हैं, लेकिन यह “असीमित संभावनाएं” ही उनके लिए तनाव का सबसे बड़ा कारण बन गई हैं। हर समय ‘बेस्ट’ होने का दबाव उन्हें मानसिक रूप से थका रहा है। सोशल मीडिया ने एक ऐसी दुनिया बना दी है जहाँ हर कोई खुश दिखने का नाटक कर रहा है। जब युवा अपनी सामान्य जिंदगी की तुलना इंटरनेट पर मौजूद “परफेक्ट लाइफ” से करते हैं, तो वे एक गहरे आत्म-विद्वेष और अकेलेपन में चले जाते हैं। उनके दिल अब नाटक करते-करते थक चुके हैं।

अतीत में, युवा मृत्यु दर का मुख्य कारण संक्रमण या भुखमरी थी। आज, इसकी जगह “डेथ्स ऑफ डिस्पेयर” (Despair) ने ले ली है। बढ़ती बेरोजगारी, जलवायु परिवर्तन की चिंता और भविष्य के प्रति अनिश्चितता युवाओं को नशे और आत्महत्या की ओर धकेल रही है। हम डिजिटल रूप से तो जुड़े हैं, लेकिन मानवीय संवेदनाओं के स्तर पर सबसे ज्यादा अकेले हैं। 2000 दोस्तों की लिस्ट होने के बावजूद, आधी रात को फोन करने के लिए एक भी सच्चा कंधा न मिलना इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी है।लगातार तनाव में रहने के कारण युवाओं का ‘प्री-फ्रंटल कॉर्टेक्स’ (दिमाग का वह हिस्सा जो निर्णय लेता है) प्रभावित होता है, जिससे वे जल्दबाजी में गलत और आत्मघाती निर्णय ले बैठते हैं।

इस संकट को केवल दवाइयों या अस्पतालों से नहीं सुलझाया जा सकता। इसके लिए एक सामाजिक क्रांति की जरूरत है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि ‘मन का बीमार होना’ भी उतना ही सामान्य है जितना ‘शरीर का बीमार होना’। स्कूलों और कार्यस्थलों में सहानुभूति (Empathy) को प्राथमिकता देनी होगी। हमें युवाओं को यह सिखाना होगा कि सफलता का मतलब केवल पैसा या प्रसिद्धि नहीं है। मानसिक शांति और मानवीय संबंध असली संपत्ति हैं।तकनीक का उपयोग कम कर के प्रकृति और वास्तविक इंसानों के साथ समय बिताने की संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा। सरकारों को केवल जीडीपी (GDP) पर ध्यान देने के बजाय “सकल राष्ट्रीय प्रसन्नता” (Gross National Happiness) पर भी विचार करना चाहिए। युवाओं के लिए रोजगार सुरक्षा, किफायती स्वास्थ्य सेवा और सामुदायिक केंद्रों का निर्माण अनिवार्य होना चाहिए।

युवाओं का समय से पहले जाना केवल एक परिवार की क्षति नहीं है, बल्कि यह पूरी मानवता की सामूहिक विफलता है। यदि हम चिकित्सा चमत्कारों के बावजूद अपने बच्चों को खुश और सुरक्षित महसूस नहीं करा पा रहे, तो हमारे विकास का कोई अर्थ नहीं है। अब समय आ गया है कि हम युवाओं को “मशीन” समझना बंद करें और उनके “थके हुए दिलों” की आवाज सुनें। हमें एक ऐसी दुनिया बनानी होगी जहाँ संभावनाओं का बोझ किसी की जान न ले, बल्कि उन्हें जीवन जीने की प्रेरणा दे।

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