डिजिटल छात्र पहचान पत्र: नवाचार या निजता का संकट?
शिक्षा का डिजिटल चेहरा

कल्पना कीजिए कि एक छात्र की पूरी शैक्षणिक यात्रा उसके नर्सरी के रिपोर्ट कार्ड से लेकर कॉलेज की पीएचडी की डिग्री, खेलकूद के प्रमाणपत्र, स्कॉलरशिप का विवरण और यहाँ तक कि उसका कौशल विकास सब कुछ एक ही डिजिटल आईडी में सुरक्षित है। उसे कागजी दस्तावेज़ों के बोझ को ढोने की ज़रूरत नहीं है, न ही डिग्री खोने का डर है। भारत सरकार की ‘वन नेशन, वन स्टूडेंट आईडी’ या APAAR (Automated Penal Portal for Academic Account Registry) जैसी योजनाएं इसी सपने को हकीकत में बदलने का प्रयास कर रही हैं।
सुनने में यह एक जबरदस्त नवाचार (Innovation) लगता है जो शिक्षा के प्रशासन को आसान बनाएगा। लेकिन, जैसे-जैसे हम शिक्षा का ‘डिजिटलीकरण’ कर रहे हैं, हमें एक गंभीर और असहज सवाल पूछना होगा क्या हम सुविधा की वेदी पर अपने बच्चों की निजता (Privacy) की बलि दे रहे हैं?
सरकार और शिक्षाविदों का तर्क है कि भारत जैसे विशाल देश में, जहाँ करोड़ों छात्र हर साल एक संस्थान से दूसरे संस्थान में जाते हैं, एक एकीकृत डिजिटल पहचान समय की मांग है। अक्सर देखा जाता है कि छात्र जब स्कूल बदलते हैं या उच्च शिक्षा के लिए दूसरे राज्य में जाते हैं, तो उन्हें माइग्रेशन सर्टिफिकेट, मार्कशीट और अन्य दस्तावेज़ों के लिए हफ़्तों भटकना पड़ता है। एक डिजिटल आईडी इन सभी दस्तावेज़ों को ‘डिजी लॉकर’ (DigiLocker) से जोड़ देती है, जिससे वेरिफिकेशन तुरंत और पेपरलेस हो जाता है।
डिजिटल आईडी के माध्यम से सरकार उन छात्रों को ट्रैक कर सकती है जो बीच में पढ़ाई छोड़ देते हैं। यदि कोई छात्र स्कूल से बाहर हो जाता है, तो उसका डेटा अधिकारियों को तुरंत अलर्ट कर सकता है, जिससे समय पर हस्तक्षेप करके उसे वापस स्कूल लाया जा सकता है। यह ‘शिक्षा का अधिकार’ (RTE) को ज़मीनी स्तर पर लागू करने में मदद कर सकता है।
स्कॉलरशिप, मिड-डे मील, और मुफ्त किताबों जैसी योजनाओं का वितरण अक्सर भ्रष्टाचार या गलत डेटा के कारण प्रभावित होता है। डिजिटल आईडी यह सुनिश्चित करती है कि लाभ सीधे असली छात्र तक पहुँचे, जिससे ‘घोस्ट स्टूडेंट्स’ (कागजी छात्र) की समस्या खत्म हो जाती है।
डिजिटल छात्र आईडी का सबसे विवादास्पद पहलू डेटा की सुरक्षा है। जब हम एक छात्र के जीवन का हर छोटा-बड़ा विवरण एक ही जगह जमा कर देते हैं, तो हम एक ऐसा ‘डेटा खजाना’ बना रहे हैं जो हैकर्स और डेटा चोरों के लिए बहुत कीमती है। भारत में सरकारी पोर्टल्स से डेटा लीक होने की खबरें अक्सर आती रहती हैं। बच्चों का डेटा विशेष रूप से संवेदनशील होता है। यदि यह डेटा डार्क वेब पर पहुँच जाए, तो इसका इस्तेमाल पहचान की चोरी (Identity Theft) या साइबर बुलिंग के लिए किया जा सकता है। क्या हमारे पास बच्चों के इस विशाल डेटाबेस को सुरक्षित रखने के लिए ‘वर्ल्ड क्लास’ साइबर सुरक्षा ढांचा मौजूद है?
आज के युग में ‘डेटा ही नया तेल’ है। निजी कंपनियाँ, एड-टेक (Ed-Tech) फर्में और विज्ञापन कंपनियाँ यह जानने के लिए उत्सुक रहती हैं कि छात्र क्या पढ़ रहे हैं, उनकी रुचि किसमें है और उनके परिवार की आर्थिक स्थिति क्या है। बिना कड़े कानूनों के, इस बात की पूरी संभावना है कि छात्रों का डेटा व्यावसायिक लाभ के लिए बेचा या उपयोग किया जा सकता है।
डिजिटल आईडी का सबसे सूक्ष्म और डरावना पहलू है प्रोफाइलिंग (Profiling)। जब कोई सिस्टम किसी बच्चे के व्यवहार, ग्रेड और गतिविधियों को बचपन से ही ट्रैक करता है, तो वह अनजाने में ही उस बच्चे की एक स्थाई छवि बना देता है। मान लीजिए कि एक बच्चा कक्षा 6 में गणित में कमज़ोर था या उसका व्यवहार शरारती था। डिजिटल रिकॉर्ड में यह जानकारी हमेशा के लिए दर्ज हो जाएगी। क्या भविष्य के शिक्षक या कॉलेज प्रशासन उस पुराने डेटा के आधार पर छात्र के प्रति पहले से ही कोई राय (Prejudice) बना लेंगे? शिक्षा का मूल उद्देश्य सुधार है, लेकिन डिजिटल प्रोफाइलिंग एक छात्र को उसके अतीत के पिंजरे में कैद कर सकती है।
जब छात्रों को पता होता है कि उनकी हर गतिविधि ट्रैक की जा रही है, तो उनकी रचनात्मकता और स्वाभाविकता खत्म हो जाती है। स्कूल सीखने की जगह के बजाय एक ‘निगरानी केंद्र’ बन सकते हैं। बचपन गलतियाँ करने और उनसे सीखने के लिए होता है, लेकिन एक ‘परमानेंट डिजिटल रिकॉर्ड’ बच्चों को गलतियाँ करने से डरा सकता है।
लोकतंत्र में किसी भी डेटा संग्रह के लिए ‘सहमति’ अनिवार्य है। लेकिन डिजिटल छात्र आईडी के मामले में सहमति अक्सर केवल एक औपचारिकता बनकर रह गई है।अभिभावकों से सहमति पत्र तो भरवाए जाते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि यदि वे सहमति नहीं देते, तो छात्र को स्कॉलरशिप या प्रवेश मिलने में बाधा आती है। जब कोई सेवा प्राप्त करने के लिए डेटा देना अनिवार्य हो जाए, तो उसे ‘स्वैच्छिक सहमति’ नहीं कहा जा सकता। यह डिजिटल ब्लैकमेलिंग जैसा है।
बच्चों के डेटा के बारे में फैसले अक्सर उनके माता-पिता या सरकार लेते हैं। लेकिन 18 वर्ष का होने के बाद, क्या छात्र के पास यह अधिकार होगा कि वह अपना पिछला डिजिटल डेटा डिलीट करवा सके? हमारे कानूनों में ‘भूल जाने के अधिकार’ (Right to be Forgotten) की स्पष्टता की भारी कमी है।
भारत जैसे देश में, जहाँ एक बड़ी आबादी के पास अभी भी स्मार्टफोन या तेज़ इंटरनेट नहीं है, इस प्रोजेक्ट का कार्यान्वयन एक नई खाई पैदा कर सकता है। ग्रामीण इलाकों के वे छात्र जिनके पास तकनीकी ज्ञान की कमी है, वे इस डिजिटल आईडी के चक्कर में सरकारी सुविधाओं से वंचित हो सकते हैं। भारत का ‘डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम’ (DPDP Act) अभी अपनी शुरुआती अवस्था में है। इसमें बच्चों के डेटा के विशेष संरक्षण के लिए प्रावधान तो हैं, लेकिन उनका क्रियान्वयन अभी परखा नहीं गया है।
डिजिटल छात्र आईडी को पूरी तरह से नकारना संभव नहीं है, लेकिन इसे वर्तमान स्वरूप में स्वीकार करना भी जोखिम भरा है। हमें एक ‘मध्य मार्ग’ की आवश्यकता है सरकार को केवल वही डेटा एकत्र करना चाहिए जो बहुत ज़रूरी हो। हर छोटी गतिविधि को ट्रैक करना बंद करना चाहिए। यदि डेटा लीक होता है, तो संबंधित अधिकारियों और संस्थाओं पर भारी जुर्माना और कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।छात्रों को अपने डेटा पर पूर्ण नियंत्रण दिया जाना चाहिए। एक उम्र के बाद उन्हें यह चुनने का अधिकार मिलना चाहिए कि वे क्या जानकारी साझा करना चाहते हैं और क्या नहीं। नीति बनाने के लिए व्यक्तिगत डेटा के बजाय ‘अनाम सामूहिक डेटा’ का उपयोग किया जाना चाहिए, ताकि किसी व्यक्तिगत छात्र की पहचान उजागर न हो।
डिजिटल छात्र पहचान पत्र प्रोजेक्ट एक दोधारी तलवार है। यदि इसका सही तरीके से उपयोग किया जाए, तो यह शिक्षा की व्यवस्था को पारदर्शी और सुलभ बना सकता है। लेकिन अगर हम सुरक्षा और निजता की अनदेखी करते हैं, तो हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं जो बचपन से ही ‘डिजिटल बेड़ियों’ में जकड़ी होगी।



