चेन्नई में H5N1 का तांडव: कौवों की सामूहिक मृत्यु और शहरी स्वास्थ्य की चुनौती
मानव स्वास्थ्य जोखिम: क्या यह अगला महामारी (Pandemic) है?

चेन्नई के आसमान में उड़ने वाले और शहरी जीवन का अभिन्न हिस्सा माने जाने वाले सैकड़ों कौवों की सामूहिक मृत्यु ने तमिलनाडु की राजधानी में एक गंभीर पारिस्थितिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल की स्थिति पैदा कर दी है। शुक्रवार को चेन्नई के अड्यार, मइलापुर और अन्ना नगर जैसे प्रमुख क्षेत्रों में मृत पक्षियों के मिलने से जो दहशत शुरू हुई, वह प्रयोगशाला जांच में H5N1 एवियन इन्फ्लूएंजा (बर्ड फ्लू) की पुष्टि के बाद अब एक बड़े संकट में तब्दील हो गई है।
चेन्नई की घनी आबादी वाले इलाकों में कौवों की मौत केवल पक्षियों की हानि नहीं है, बल्कि यह एक “प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली” (Early Warning System) है। कौवे, जिन्हें अक्सर ‘प्रकृति के सफाईकर्मी’ कहा जाता है, मानव बस्तियों के सबसे करीब रहने वाले पक्षी हैं। उनका H5N1 की चपेट में आना यह दर्शाता है कि वायरस अब हमारे घरों की बालकनियों और आंगन तक पहुँच चुका है।
H5N1 ‘इन्फ्लूएंजा ए’ परिवार का एक अत्यधिक रोगजनक (Highly Pathogenic) स्ट्रेन है। यह वायरस विशेष रूप से पक्षियों के श्वसन और तंत्रिका तंत्र पर हमला करता है। H5N1 की सबसे बड़ी चिंता इसकी तेजी से बदलने (Mutate) की क्षमता है। यह पक्षियों से स्तनधारियों और अंततः मनुष्यों में फैलने की क्षमता रखता है। कौवों में यह वायरस न केवल फेफड़ों को नुकसान पहुँचाता है, बल्कि उनके मस्तिष्क पर भी हमला करता है, जिससे वे उड़ने में असमर्थ हो जाते हैं, उन्हें दौरे पड़ते हैं और अंत उनकी मृत्यु हो जाती है।
शुक्रवार की सुबह चेन्नई के नागरिकों के लिए भयावह थी। पार्कों, सड़कों और आवासीय परिसरों में पक्षी मृत पाए गए। चेन्नई के पल्लिकरणई मार्श और वेदानथंगल पक्षी अभयारण्य प्रवासी पक्षियों के केंद्र हैं। संभव है कि विदेशी पक्षियों के माध्यम से यह वायरस स्थानीय कौवों तक पहुँचा हो। कौवे अक्सर मांस की दुकानों और कचरे के ढेरों के आसपास भोजन तलाशते हैं। संक्रमित अवशेषों के संपर्क में आने से यह वायरस तेजी से फैला। नगर निगम ने उन क्षेत्रों के 1-3 किमी के दायरे को ‘सेंसिटिव ज़ोन’ घोषित किया है जहाँ मृत पक्षी मिले हैं। यहाँ पोल्ट्री उत्पादों की बिक्री पर अस्थायी प्रतिबंध और निरंतर निगरानी रखी जा रही है।
बर्ड फ्लू के संदर्भ में सबसे बड़ा डर ‘ज़ूनोटिक ट्रांसमिशन’ (Zoonotic Transmission) यानी पक्षियों से इंसानों में फैलने का है। वे लोग जो पक्षियों के सीधे संपर्क में आते हैं, जैसे पोल्ट्री कर्मचारी, नगर निगम के सफाईकर्मी और पक्षी प्रेमी, सबसे अधिक जोखिम में हैं। मनुष्यों में H5N1 के लक्षण सामान्य फ्लू से शुरू होते हैं तेज़ बुखार, गले में खराश, सांस लेने में तकलीफ और निमोनिया। इसकी मृत्यु दर (Mortality Rate) पक्षियों में बहुत अधिक है, और इंसानों में भी यह जानलेवा हो सकता है।
तमिलनाडु सरकार ने इस स्थिति से निपटने के लिए एक ‘वार रूम’ स्थापित किया है। मृत कौवों के विसरा और स्वाब के नमूने भोपाल के ‘राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशुरोग संस्थान’ (NIHSAD) भेजे गए हैं। प्रभावित इलाकों में सोडियम हाइपोक्लोराइट का छिड़काव किया जा रहा है ताकि सतहों पर मौजूद वायरस को नष्ट किया जा सके। विभाग अब मुर्गियों और बत्तखों के फार्मों की रैंडम सैंपलिंग कर रहा है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वायरस खाद्य श्रृंखला (Food Chain) में प्रवेश नहीं कर पाया है।
पारिस्थितिकी तंत्र में कौवों की एक महत्वपूर्ण भूमिका है। वे मरे हुए जानवरों और जैविक कचरे को साफ करने में मदद करते हैं। यदि कौवों की संख्या में भारी गिरावट आती है, तो शहरी कचरा प्रबंधन की समस्या बढ़ सकती है, जिससे अन्य बीमारियां (जैसे चूहे और मक्खियों से फैलने वाले रोग) पनप सकते हैं। कौवों की मृत्यु शहरी खाद्य श्रृंखला में एक बड़ा शून्य पैदा कर देगी, जिसका प्रभाव अन्य छोटे पक्षियों और कीड़ों की आबादी पर पड़ेगा।
इस समय घबराने के बजाय वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है:
| क्या करें (Do’s) | क्या न करें (Don’ts) |
| मृत पक्षी दिखने पर तुरंत हेल्पलाइन नंबर पर फोन करें। | मृत पक्षियों को नंगे हाथों से न छुएं और न ही उन्हें दफनाएं। |
| पोल्ट्री उत्पादों (चिकन, अंडा) को 70°C से ऊपर अच्छी तरह पकाकर खाएं। | अधपका मांस या कच्चा अंडा खाने से बचें। |
| पक्षियों को दाना डालने वाली जगहों से दूर रहें। | खुले बाजारों में जीवित पक्षियों के करीब न जाएं। |
| घर के आसपास स्वच्छता बनाए रखें और हाथ बार-बार धोएं। | मृत पक्षियों की तस्वीर लेने या उनके करीब जाने की कोशिश न करें। |
चेन्नई की यह घटना हमें याद दिलाती है कि मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य और पर्यावरण एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। हमें केवल आपदा के समय नहीं, बल्कि नियमित रूप से जंगली पक्षियों की निगरानी करनी चाहिए। खुले में मांस के अवशेष और जैविक कचरा फेंकने पर सख्त पाबंदी होनी चाहिए। पोल्ट्री क्षेत्र के लिए प्रभावी टीकों और मानव संक्रमण के लिए एंटी-वायरल दवाओं (जैसे ओसेल्टामिविर) का पर्याप्त स्टॉक होना चाहिए।
चेन्नई में सैकड़ों कौवों की मौत एक गंभीर चेतावनी है। H5N1 वायरस की मौजूदगी यह बताती है कि प्रकृति हमें सचेत कर रही है। हालांकि अभी तक मानव संक्रमण का कोई मामला सामने नहीं आया है, लेकिन लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं है। प्रशासन की त्वरित कार्रवाई और जनता का संयमित व्यवहार ही इस ‘एवियन संकट’ को टाल सकता है। हमें यह समझना होगा कि पक्षियों की सुरक्षा में ही हमारी सुरक्षा निहित है।



