
बीस साल पहले कहा जाता था कि “ज्ञान ही शक्ति है।” लेकिन आज के डिजिटल युग में, यह कहावत बदल गई है। आज ‘सही’ ज्ञान ही शक्ति है, क्योंकि गलत जानकारी तो अब एक महामारी की तरह फैल रही है। ‘मिसइन्फॉर्मेशन’ या गलत जानकारी का संकट आज हमारे समय की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन गया है। यह केवल एक तकनीकी समस्या नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक और मानसिक संकट है।
अक्सर लोग ‘मिसइन्फॉर्मेशन’ और ‘डिइन्फॉर्मेशन’ (Disinformation) को एक ही समझ लेते हैं, लेकिन इनमें एक बारीक फर्क है। जब कोई गलत जानकारी बिना किसी बुरे इरादे के साझा की जाती है (जैसे किसी ने अनजाने में व्हाट्सएप पर कोई गलत घरेलू नुस्खा भेज दिया)। जब झूठ को जानबूझकर किसी को नुकसान पहुँचाने या खास एजेंडा चलाने के लिए फैलाया जाता है।
इस संकट के पीछे सबसे बड़ा हाथ एल्गोरिदम (Algorithm) का है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वे हमें वही दिखाते हैं जो हमें पसंद आता है या जो हमें उत्तेजित करता है। हम अक्सर उन खबरों पर तुरंत यकीन कर लेते हैं जो हमारी पुरानी मान्यताओं को सही साबित करती हैं। एक झूठ सच की तुलना में छह गुना तेजी से फैलता है। इसका कारण यह है कि झूठ अक्सर सनसनीखेज और भावनात्मक होता ह।जब चुनाव ‘डेटा’ से लड़े जाते हैं किसी भी लोकतंत्र की नींव इस बात पर टिकी होती है कि नागरिक जागरूक हैं। लेकिन जब मतदाता को गलत आंकड़े, फर्जी वीडियो या डीपफेक (Deepfake) के जरिए भ्रमित किया जाता है, तो चुनाव का पूरा आधार ही हिल जाता है। अब ऐसी तकनीक आ गई है जिससे किसी भी नेता का चेहरा और आवाज हूबहू बनाई जा सकती है। चुनाव के ठीक पहले ऐसे वीडियो जारी करना किसी भी देश की राजनीति को गलत दिशा में मोड़ सकता है। यह ‘डिजिटल प्रोपेगेंडा’ अब युद्ध का नया हथियार बन चुका है।
स्वास्थ्य और समाज पर असर हमने कोरोना काल के दौरान देखा कि कैसे गलत जानकारियों ने लोगों की जान जोखिम में डाली। “वैक्सीन से खतरा है” या “अमुक चीज खाने से कोरोना नहीं होगा” जैसी अफवाहों ने डॉक्टरों के काम को और मुश्किल बना दिया। समाज में नफरत फैलाने के लिए भी मिसइन्फॉर्मेशन का सहारा लिया जाता है। किसी पुरानी घटना का वीडियो आज का बताकर पेश करना या दो समुदायों के बीच मनगढ़ंत कहानियां फैलाना अब आम बात हो गई है। इसका नतीजा होता है—दंगे, मॉब लिंचिंग और समाज में गहराता अविश्वास।
अक्सर कहा जाता है कि “लोहे को लोहा काटता है,” यानी तकनीक की समस्या का समाधान तकनीक से होगा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) अब फर्जी खबरों को पहचानने में मदद कर रही है। लेकिन समस्या यह है कि झूठ बनाने वाली एआई, सच खोजने वाली एआई से एक कदम आगे रहती है। सरकारें अब सख्त कानून बना रही हैं। भारत में भी आईटी नियमों के जरिए सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही तय करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन केवल कानून से काम नहीं चलेगा।
हम क्या कर सकते हैं? (डिजिटल साक्षरता) इस संकट का सबसे बड़ा समाधान ‘कानून’ नहीं, बल्कि ‘जागरूकता’ है। हमें अपनी ‘डिजिटल डाइट’ पर ध्यान देना होगा खबर पढ़ने से पहले देखें कि वह किस वेबसाइट या चैनल से आई है। क्या वह भरोसेमंद है? अक्सर हेडलाइन भड़काऊ होती है, जबकि खबर के अंदर कुछ और ही होता है। यदि कोई खबर पढ़कर आपको बहुत ज्यादा गुस्सा या खुशी हो रही है, तो रुकिए। उसे शेयर करने से पहले ठंडे दिमाग से सोचें। ‘ऑल्ट न्यूज’, ‘बूम लाइव’ या ‘पीआईबी फैक्ट चेक’ जैसी वेबसाइट्स का उपयोग करें।
सूचना के इस महासागर में सच को बचाए रखना केवल सरकार या टेक कंपनियों का काम नहीं है। यह हर उस नागरिक की जिम्मेदारी है जिसके हाथ में स्मार्टफोन है। आपकी एक ‘शेयर’ की गई गलत जानकारी किसी की जान ले सकती है या किसी का घर जला सकती है। हमें एक ऐसा समाज बनना होगा जो सवाल पूछता हो, न कि वह जो हर आती हुई सूचना को ‘फॉरवर्ड’ कर देता हो। याद रखिये, डिजिटल दुनिया में “शेयर करने से पहले सोचना” ही सबसे बड़ी देशभक्ति है।



