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डर बनाम तथ्य: ईरान को लेकर भारतीय निर्यातकों की घबराहट कितनी सही?

बुनियादी ढांचा और कूटनीति का सुरक्षा चक्र

  • पिछले कुछ दिनों से भारतीय व्यापारिक गलियारों में एक ही चर्चा है—ईरान। अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से ईरान के प्रमुख व्यापारिक भागीदारों पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क (Tariff) लगाने की घोषणा के बाद भारतीय निर्यातकों, विशेषकर चावल व्यापारियों के बीच, ‘पैनिक’ या घबराहट का माहौल बन गया। लेकिन क्या यह डर वास्तव में तथ्यों पर आधारित है? या फिर यह बाज़ार की उस भावना का नतीजा है जो डेटा से तेज़ दौड़ती है?अक्सर हम खबरों की गहराई में जाए बिना केवल हेडलाइंस से डर जाते हैं। भारत सरकार ने अब यह साफ कर दिया है कि अमेरिका के इस कदम का भारत पर असर ‘नाममात्र’ या बहुत कम (Minimal impact) होने की उम्मीद है। केंद्र सरकार का कहना है कि भारत का ईरान के साथ व्यापार बहुत ही सीमित और विविध (Diversified) है, जिससे हम किसी भी बड़े झटके से सुरक्षित हैं।

वास्तव में, भारत की चिंता इसलिए बढ़ गई क्योंकि भावनाएं अक्सर हकीकत से ज्यादा तेजी से काम करती हैं। जब हम ‘प्रतिबंध’ या ‘अतिरिक्त शुल्क’ जैसे शब्द सुनते हैं, तो निर्यातकों को लगता है कि उनके पैसे डूब जाएंगे या ऑर्डर रद्द हो जाएंगे। यदि हम पिछले साल के आंकड़ों पर नजर डालें, तो तस्वीर काफी साफ हो जाती है। पिछले साल ईरान के साथ भारत का कुल व्यापार मात्र $1.6 बिलियन था। अगर हम इसकी तुलना ईरान के कुल आयात बजट से करें, जो 2024 में लगभग $68 बिलियन रहने का अनुमान है, तो भारत की हिस्सेदारी बहुत ही छोटी है।

ईरान के असली बड़े व्यापारिक साझीदार ये हैं:
यूएई (UAE): $21 बिलियन (30 प्रतिशत)
चीन (China): $17 बिलियन (26 प्रतिशत)
तुर्की (Turkiye): $11 बिलियन (16 प्रतिशत)
यूरोपीय संघ (EU): $6 बिलियन (9 प्रतिशत)
इन आंकड़ों को देखकर यह स्पष्ट है कि अमेरिका के निशाने पर वे देश अधिक होंगे जिनका व्यापार ईरान के साथ अरबों डॉलर में है। भारत इस पूरी तस्वीर में एक बहुत ही छोटा खिलाड़ी है।

भारत के लिए ईरान का बाज़ार छोटा हो सकता है, लेकिन एक विशेष वर्ग के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है—चावल निर्यातक। भारत, ईरान को चावल की आपूर्ति करने वाला सबसे बड़ा देश है। ईरान अपनी ज़रूरत का लगभग दो-तिहाई चावल अकेले भारत से आयात करता है।
यही कारण है कि जैसे ही ट्रंप की घोषणा हुई, चावल व्यापारियों में खलबली मच गई। उन्हें लगा कि अगर भुगतान का रास्ता बंद हुआ या कोई नया प्रतिबंध लगा, तो उनका सबसे बड़ा बाज़ार हाथ से निकल जाएगा। लेकिन सरकार ने भरोसा दिलाया है कि भारत के व्यापारिक संबंध इतने विविध हैं कि किसी एक घोषणा से पूरी व्यवस्था ठप नहीं होगी।

अर्थव्यवस्था में ‘सेंटिमेंट’ (Sentiment) यानी भावनाओं का बड़ा हाथ होता है। कभी-कभी डेटा कहता है कि “सब ठीक है,” लेकिन बाज़ार में फैला डर भारी पड़ जाता है। निर्यातकों की चिंता केवल टैरिफ को लेकर नहीं थी, बल्कि इस बात को लेकर भी थी कि भविष्य में अमेरिका और ईरान के संबंध किस ओर मुड़ेंगे। लेकिन एक मैच्योर अर्थव्यवस्था के रूप में, हमें डेटा पर भरोसा करना चाहिए। भारत सरकार ने संकेत दिया है कि हमारे पास व्यापार के अन्य कई रास्ते और मजबूत लिंकेज हैं जो हमें सुरक्षित रखते हैं।

बुनियादी ढांचा और कूटनीति का सुरक्षा चक्र
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी निर्यात नीति को किसी एक देश पर निर्भर नहीं रखा है। हमने अपने व्यापारिक संबंधों का विविधीकरण (Diversification) किया है। ईरान हमारा एक महत्वपूर्ण साझीदार जरूर है, लेकिन वह हमारे विशाल एक्सपोर्ट बास्केट का एक बहुत छोटा हिस्सा है।

डरने की नहीं, समझने की जरूरत है ईरान के मुद्दे पर निर्यातकों की घबराहट एक स्वाभाविक मानवीय प्रतिक्रिया थी, लेकिन तथ्यों के आधार पर यह घबराहट बेवजह नजर आती है। भारत की ईरान के साथ व्यापारिक हिस्सेदारी इतनी कम है कि वैश्विक प्रतिबंधों या टैरिफ का असर हम पर बहुत कम होगा। सरकार का आश्वासन और $1.6 बिलियन का छोटा व्यापारिक आंकड़ा यह साबित करता है कि भारत का निर्यात सुरक्षित है। निर्यातकों को चाहिए कि वे अफवाहों के बजाय आधिकारिक डेटा और सरकार की सलाह पर ध्यान दें। व्यापार में जोखिम हमेशा होता है, लेकिन सही जानकारी ही उस जोखिम से बचने का सबसे बड़ा हथियार है।

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