
भारत का राजनीतिक परिदृश्य अक्सर ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ जैसे बुनियादी मुद्दों से भटककर भावनात्मक और पहचान-आधारित बहस की ओर मुड़ जाता है। हिजाब या धार्मिक पहनावे पर सार्वजनिक बहस ऐसी ही एक तपिश पैदा करने वाली चिंगारी है। हाल ही में, बिहार जैसे सामाजिक रूप से जटिल और राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्य में, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार या किसी प्रमुख नेता का धार्मिक पहनावे को लेकर दिया गया कोई भी बयान चाहे वह समर्थन में हो या विरोध में तुरंत राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन जाता है।
यदि यह बयान किसी भी तरह से सार्वजनिक स्थानों, जैसे स्कूल या कॉलेज, में धार्मिक प्रतीक की उपस्थिति को संबोधित करता है, तो यह केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं रह जाता। यह तुरंत दो गहरे और पुराने संवैधानिक प्रश्नों को उठाता है पहला, धार्मिक स्वतंत्रता (Article 25) की सीमा क्या है? और दूसरा, संवेदनशील सांस्कृतिक मुद्दों पर राजनीतिक नेताओं के भाषण की जिम्मेदारी और सीमाएँ क्या हैं?
हिजाब पर उठा हर विवाद सीधे भारतीय संविधान के हृदय को चुनौती देता है, जहाँ कई मौलिक अधिकार एक दूसरे से टकराते दिखते हैं। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 सभी नागरिकों को अपनी पसंद के धर्म का पालन करने, अभ्यास करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। यह धार्मिक पहनावे और प्रतीकवाद को भी कवर करता है।
हिजाब पहनने वाली महिलाएँ इसे अपनी धार्मिक आस्था का एक अनिवार्य हिस्सा मानती हैं यह अनुच्छेद 25 के तहत उनका मौलिक अधिकार है। राज्य या शैक्षणिक संस्थान अक्सर तर्क देते हैं कि सार्वजनिक व्यवस्था, समानता, और धर्मनिरपेक्षता को बनाए रखने के लिए, सभी को एक समान ड्रेस कोड का पालन करना ज़रूरी है। उनका तर्क है कि एकरूपता से समानता का माहौल बनता है, और धार्मिक प्रतीकवाद को सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए सीमित किया जा सकता है।
न्यायपालिका ने वर्षों से यह तय करने के लिए आवश्यक धार्मिक प्रथा के सिद्धांत का उपयोग किया है कि धर्म का कौन सा हिस्सा मौलिक अधिकार के रूप में संरक्षित होने लायक है। यह सिद्धांत ही विवाद की जड़ है। क्या हिजाब इस्लाम की एक आवश्यक प्रथा है? विभिन्न उच्च न्यायालयों और यहाँ तक कि सर्वोच्च न्यायालय के भीतर भी इस पर अलग-अलग राय रही है। कुछ मानते हैं कि यह आस्था का विषय है, तो कुछ इसे केवल एक “सुविधाजनक” धार्मिक निर्देश मानते हैं। जब तक ERP पर न्यायिक स्पष्टता नहीं आती, तब तक राज्य या राजनेताओं द्वारा दिए गए हर बयान से अनिश्चितता और भ्रम फैलता रहेगा, और शैक्षणिक संस्थानों को यह तय करने में मुश्किल होगी कि किस नियम का पालन किया जाए।
समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14) भी यहाँ महत्वपूर्ण है। कुछ तर्क देते हैं कि धार्मिक प्रतीक की अनुमति देने से धर्मनिरपेक्षता कमजोर होती है, जबकि दूसरे तर्क देते हैं कि किसी महिला को केवल उसके धार्मिक पहनावे के कारण शिक्षा या सार्वजनिक जीवन से बाहर करना समानता के अधिकार का उल्लंघन है। राज्य की नीति ऐसी होनी चाहिए जो विविधता को स्वीकार करे और समावेशी हो, न कि वह जो धार्मिक पहचान को सार्वजनिक स्थान से पूरी तरह से मिटाने का प्रयास करे।
हिजाब जैसे संवेदनशील मुद्दों पर नेताओं के बयान या तो राजनीतिक अनजानेपन का नतीजा होते हैं या, अधिक संभावना है, चुनावी रणनीति का एक सोची-समझी चाल। पहचान आधारित विवादों को उठाने का प्राथमिक उद्देश्य चुनावी ध्रुवीकरण (Polarization) होता है। धार्मिक प्रतीकों पर बहस को हवा देकर, राजनेता आसानी से मतदाताओं को ‘हम’ बनाम ‘वे’ की बाइनरी (Binary) में बाँट सकते हैं। यह रणनीति लोगों का ध्यान बेरोज़गारी, स्वास्थ्य सेवा की कमी, या खराब बुनियादी ढांचे जैसे वास्तविक शासन के मुद्दों से भटकाती है।
बिहार जैसे राज्यों में, जहाँ रोज़गार सृजन, बाढ़ नियंत्रण और शिक्षा में सुधार की सख्त ज़रूरत है, राजनीतिक विमर्श को जानबूझकर संवैधानिक सिद्धांतों और धार्मिक अधिकारों की जटिल, लेकिन भावनात्मक रूप से आवेशित बहस की ओर मोड़ दिया जाता है। मतदाता को यह विश्वास दिलाया जाता है कि उनकी धार्मिक पहचान खतरे में है, जिससे वे भावनात्मक सुरक्षा के लिए वोट देते हैं, बजाय इसके कि वे सरकार के प्रदर्शन का मूल्यांकन करें।
जब केंद्र या किसी एक राज्य का नेता दूसरे राज्यों में चल रहे धार्मिक विवादों पर टिप्पणी करता है, तो यह देश के संघीय ढाँचे और सामाजिक सद्भाव पर चोट करता है। यह एक क्षेत्रीय मुद्दे को राष्ट्रीय मुद्दा बनाता है, जिससे राज्यों के बीच दूरियाँ बढ़ती हैं। यह धर्मनिरपेक्षता के उस मौलिक सिद्धांत को कमज़ोर करता है जो विविधता को स्वीकार करता है।
नीतीश कुमार जैसे अनुभवी और अक्सर खुद को ‘सामाजिक सद्भाव’ का संरक्षक बताने वाले नेता के किसी भी बयान का सार्वजनिक प्रभाव बहुत अधिक होता है। उनका बयान, भले ही व्यक्तिगत राय हो, तुरंत सार्वजनिक नीति के दायरे में आ जाता है। एक राजनेता का पद उसके निजी विश्वास से ऊपर होता है। जब एक मुख्यमंत्री या गठबंधन का नेता किसी धार्मिक या सांस्कृतिक प्रथा पर टिप्पणी करता है, तो वह केवल एक नागरिक के रूप में नहीं बोल रहा होता; वह राज्य की नीतियों और प्रशासनिक दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित कर रहा होता है।
नेताओं को अत्यंत सावधानी बरतनी चाहिए। उनका कर्तव्य है कि वे संविधान के प्रति अपनी निष्ठा को स्पष्ट करें, न कि किसी एक समूह की पहचान को निशाना बनाएँ या उसे बढ़ावा दें। उनका भाषण समावेशी, सुलहकारी और एकता को बढ़ावा देने वाला होना चाहिए। संवेदनशील पहचान के मुद्दों पर विवादास्पद बयान देना समाज में ‘फायर अलार्म’ बजाने जैसा है। यह तुरंत तनाव पैदा करता है, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देता है और नागरिक समाज के भीतर विश्वास को भंग करता है।
एक सच्चे नेता की नैतिकता यह माँग करती है कि वह समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संतुलन बनाए रखे, खासकर अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सुरक्षित करने में। नीतीश कुमार जैसे नेताओं से यह उम्मीद की जाती है कि वे राजनीतिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता के संरक्षण के लिए बात करें।
राजनीतिक भाषण की सीमा वहाँ समाप्त हो जाती है जहाँ वह सार्वजनिक व्यवस्था को भंग करने, घृणा फैलाने या किसी नागरिक समूह के मौलिक अधिकारों को खतरे में डालने लगता है। यदि किसी नेता का बयान शैक्षणिक संस्थानों में धर्म के नाम पर अलगाव या बहिष्कार को बढ़ावा देता है, तो वह न केवल अनैतिक है, बल्कि प्रशासनिक रूप से भी विभाजनकारी है।
हिजाब जैसे विवादों से समाज को होने वाला नुकसान केवल कानूनी या राजनीतिक नहीं होता; इसकी लागत अदृश्य और दीर्घकालिक होती है। जब शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब विवाद उग्र होता है, तो सबसे अधिक नुकसान छात्रों की शिक्षा का होता है। लड़कियों को कक्षाओं से बाहर कर दिया जाता है, उनके शैक्षणिक वर्ष बर्बाद हो जाते हैं, और उन्हें अपने करियर और धार्मिक आस्था के बीच एक असंभव विकल्प चुनने के लिए मजबूर किया जाता है। शिक्षा का अधिकार, एक मौलिक अधिकार है, और किसी भी राजनीतिक विमर्श को इस अधिकार के आड़े नहीं आना चाहिए।
लगातार पहचान की बहसें सामाजिक सामंजस्य को कमजोर करती हैं। समाज के विभिन्न वर्ग एक-दूसरे को संदेह और अविश्वास की दृष्टि से देखने लगते हैं। सार्वजनिक स्थानों पर धार्मिक प्रतीकों को लेकर तनाव पैदा करना, देश के धर्मनिरपेक्ष और बहुलवादी चरित्र पर हमला है।
भारत खुद को दुनिया के सबसे बड़े और सफल लोकतंत्र के रूप में प्रस्तुत करता है। जब हमारे यहाँ धार्मिक स्वतंत्रता और शिक्षा के बीच संघर्ष होता है, तो अंतर्राष्ट्रीय मंच पर हमारी छवि को नुकसान पहुँचता है। यह दर्शाता है कि हम अभी भी अपनी आंतरिक विविधता को शांतिपूर्वक प्रबंधित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।



