
मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे पर खंडाला घाट के दुर्गम पहाड़ी खंड में एक गैस टैंकर का पलटना केवल एक यातायात संबंधी समस्या नहीं है, बल्कि यह भारत के सबसे उन्नत बुनियादी ढांचे की “आपातकालीन प्रतिक्रिया क्षमता” (Emergency Response Capability) पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। पिछले 24 घंटों से जारी यह संकट, जिसमें 22 किलोमीटर लंबा जाम लगा और हजारों लोग फंसे रहे, शहरी नियोजन और आपदा प्रबंधन के बीच के अंतराल को स्पष्ट रूप से उजागर करता है।
जब देश की आर्थिक राजधानी मुंबई और सांस्कृतिक व आईटी केंद्र पुणे के बीच की जीवनरेखा थमती है, तो इसका असर केवल यात्रियों पर नहीं, बल्कि राज्य की पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। खंडाला घाट में हुआ यह हादसा उस समय हुआ जब यातायात का दबाव पहले से ही अधिक था। एक गैस टैंकर का पलटना किसी भी हाईवे के लिए ‘रेड अलर्ट’ जैसी स्थिति होती है, क्योंकि यहाँ मामला केवल रास्ता साफ करने का नहीं, बल्कि संभावित विस्फोट को रोकने का होता है।
खंडाला घाट का खंड अपनी घुमावदार सड़कों, तीखी ढलानों और अक्सर धुंध भरे मौसम के लिए जाना जाता है। एक्सप्रेसवे का निर्माण आधुनिक मानकों पर हुआ है, लेकिन घाट के कुछ मोड़ आज भी भारी और ऊंचे वाहनों (जैसे गैस टैंकर) के लिए खतरनाक साबित होते हैं। तरल या गैस से भरे टैंकर जब ढलान पर मुड़ते हैं, तो उनका गुरुत्वाकर्षण केंद्र असंतुलित हो जाता है। यदि गति थोड़ी भी अधिक हो या चालक का ध्यान भटके, तो टैंकर का पलटना लगभग तय होता है।
एक्सप्रेसवे पर लगे इस ऐतिहासिक जाम ने हजारों लोगों को ऐसी स्थिति में डाल दिया जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। जाम में फंसी कारों में बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग शामिल थे। खंडाला घाट के बीचों-बीच जहाँ कोई होटल या सुविधाएं नहीं हैं, वहां लोग भूख, प्यास और शौचालय जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए तरस गए। एम्बुलेंस के लिए रास्ता बनाना असंभव हो गया था। ‘गोल्डन आवर’ (हादसे के बाद का पहला घंटा) में अस्पताल पहुँचने की उम्मीद रखने वाले मरीजों के लिए यह जाम जानलेवा साबित हो सकता था। मुंबई बंदरगाह (JNPT) से पुणे के ऑटोमोबाइल हब और आईटी पार्कों की ओर जाने वाला कच्चा माल अटक गया। 22 किलोमीटर के जाम में फंसे हजारों ट्रकों का मतलब है करोड़ों रुपये का व्यापारिक नुकसान।
प्रशासन की आलोचना करना आसान है, लेकिन गैस टैंकर से निपटने की प्रक्रिया अत्यंत तकनीकी और धीमी होती है। टैंकर के पलटने के तुरंत बाद, दमकल विभाग को यह सुनिश्चित करना होता है कि कोई रिसाव (Leakage) न हो। यदि रिसाव होता है, तो पूरा इलाका ‘नो-गो ज़ोन’ बन जाता है। अक्सर पलटे हुए टैंकर को सीधे उठाना खतरनाक होता है। गैस को दूसरे खाली टैंकर में स्थानांतरित करना पड़ता है, जिसमें घंटों का समय लगता है। घाट के संकरे रास्तों पर 100 टन की क्रेन को पहुँचाना और उसे स्थिर करना एक इंजीनियरिंग चुनौती है।
इस संकट के दौरान सबसे बड़ी कमी ‘रियल-टाइम कम्युनिकेशन’ की देखी गई। एक्सप्रेसवे पर चढ़ने वाले हजारों चालकों को टोल प्लाजा पर यह नहीं बताया गया कि आगे 22 किमी लंबा जाम है। यदि लोनावला या खालापुर टोल पर ही वाहनों को रोका जाता, तो लोग पुराने हाईवे का उपयोग करते या यात्रा टाल देते। जैसे ही डाइवर्जन शुरू हुआ, पुराना हाईवे भी ठप हो गया। दो वैकल्पिक मार्ग होने के बावजूद, समन्वय की कमी ने दोनों को पंगु बना दिया।
हमें “रिएक्टिव” (हादसे के बाद जागना) के बजाय “प्रोएक्टिव” (हादसे को रोकने वाली) रणनीति अपनानी होगी। एक्सप्रेसवे के हर 5 किमी पर डिजिटल सूचना बोर्ड होने चाहिए जो जाम की स्थिति में तुरंत ‘एग्जिट’ लेने का निर्देश दें। खंडाला और लोनावला के पास स्थायी रूप से भारी क्रेन, गैस रिकवरी वैन और चिकित्सा दल का एक हब होना चाहिए। घाट सेक्शन में भारी वाहनों के लिए सबसे बाईं लेन अनिवार्य होनी चाहिए और उनकी गति सीमा को रडार के माध्यम से कड़ाई से नियंत्रित किया जाना चाहिए।’मिसिंग लिंक’ प्रोजेक्ट (जो घाट सेक्शन को बायपास करेगा) का काम तेज करना अनिवार्य है ताकि इस खतरनाक खंड पर निर्भरता कम हो सके।
मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे पर बिताए गए वे 24 घंटे हजारों लोगों के लिए किसी डरावने सपने से कम नहीं थे। यह घटना हमें याद दिलाती है कि उच्च गति वाले रास्तों के साथ-साथ हमारे पास “उच्च गति वाली प्रतिक्रिया प्रणाली” भी होनी चाहिए। प्रशासन को यह समझना होगा कि आधुनिक हाईवे केवल डामर और कंक्रीट की परतें नहीं हैं, बल्कि वे एक ऐसी सेवा हैं जिसकी जिम्मेदारी सुरक्षा और निरंतरता सुनिश्चित करना है। जब तक हम ‘इमरजेंसी रिस्पांस’ को तकनीक और प्रशिक्षण के साथ नहीं जोड़ेंगे, खंडाला घाट जैसे मोड़ हमारे विकास की गति को बार-बार ऐसे ही बाधित करते रहेंगे।



