
दुनिया की टेक कंपनियों से आ रही छंटनी की खबरें अब रोज़मर्रा की बात बन चुकी हैं। एक साल में 1.1 लाख से ज्यादा नौकरियाँ खत्म हो गईं यह आंकड़ा सिर्फ़ संख्याएँ नहीं, बल्कि हज़ारों परिवारों की उम्मीदें, EMI का बोझ और करियर के सपने हैं। भारत जैसे देश के लिए, जहाँ आईटी जॉब्स मध्यम वर्ग का सबसे बड़ा सहारा रही हैं, यह झटका बहुत गहरा है। लेकिन क्या यह अंत है, या हमें अपनी सोच, स्किल्स और नीतियों को नया आकार देने का मौका?
टेक की दुनिया में छंटनी का सिलसिला महामारी के बाद तेज़ हुआ। बड़ी कंपनियाँ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से लेकर क्लाउड सर्विस और चिप मैन्युफैक्चरर तक ने अपनी टीमों को आधा कर दिया। क्यों? कारण सरल हैं महामारी में हायरिंग इतनी तेज़ हुई कि कई जगह ज़्यादा स्टाफ हो गया। अब मंदी के डर से कटौती हो रही है। एआई और ऑटोमेशन ने रूटीन काम जैसे कोडिंग के छोटे हिस्से, डेटा एंट्री या कस्टमर सपोर्ट खत्म कर दिए। निवेशक अब कंपनियों से मुनाफा मांग रहे हैं, न कि सिर्फ़ यूज़र बढ़ाने का दावा।
भारत पर असर सीधा यहाँ के आईटी प्रोफेशनल्स ग्लोबल क्लाइंट्स पर निर्भर हैं। जब विदेशी कंपनी प्रोजेक्ट काटती है, तो भारतीय सर्विसेज़ प्रभावित होती हैं। ऑन-साइट जॉब्स कम हुए, वीज़ा मुश्किल बने। एक इंजीनियर जो कल तक अमेरिका जाने का सपना देख रहा था, आज घर बैठे लिंक्डइन पर अपडेट कर रहा है।
पिछले 20 सालों में आईटी ने लाखों युवाओं को मध्यम वर्ग की ऊँचाइयों पर पहुँचाया। कैंपस प्लेसमेंट में 20-30 लाख सालाना पैकेज, विदेशी ट्रिप्स, फ्लैट और कार यह सब आम हो गया। लेकिन अब सच्चाई सामने आ रही है पारंपरिक जॉब्स जैसे ऐप डेवलपमेंट या टेस्टिंग में प्रतियोगिता बढ़ी। कंपनियाँ कम लोगों से ज़्यादा काम चाहती हैं एआई टूल्स की मदद से। नए क्षेत्र जैसे डेटा साइंस, क्लाउड आर्किटेक्चर या साइबर सिक्योरिटी में माँग है, लेकिन स्किल गैप बहुत बड़ा। एक युवा इंजीनियर की डायरी पढ़िए: “चार साल पढ़ाई की, जॉब मिली, लेकिन छंटनी हो गई। अब क्या?” यह हज़ारों की कहानी है। बेरोज़गारी दर युवाओं में 20% के ऊपर, और टेक में यह और तीखी।
इंजीनियरिंग कॉलेज के फाइनल ईयर में बैठा छात्र सोचता है: “प्लेसमेंट सेल कह रहा है 60% ही जॉब पाएँगे।” पुराने ग्रेजुएट्स लिंक्डइन पर पोस्ट डालते हैं “3 साल एक्सपीरियंस, लेऑफ़ हो गया।” परिवार का दबाव: “शादी कब करोगे?” यह डर वाजिब है। लेकिन डर से काम नहीं चलेगा। समस्या सिर्फ़ जॉब्स की कमी नहीं, बल्कि स्किल मिसमैच है। पुरानी कोर्स में एआई, मशीन लर्निंग या सॉफ्ट स्किल्स कम। नतीजा डिग्री तो है, लेकिन नियोक्ता को भरोसा नहीं।
सरकार को अब रिएक्टिव नहीं, प्रोएक्टिव होना चाहिए। कुछ सुझाव कॉलेज कुरिकुलम में एआई, क्लाउड, साइबर सिक्योरिटी अनिवार्य करें। री-स्किलिंग के लिए बड़े प्रोग्राम 30-40 साल के प्रोफेशनल्स के लिए भी। स्किल इंडिया को टेक-स्पेसिफिक बनाएँ: फ्री कोर्स, सर्टिफिकेशन और जॉब गारंटी। केवल सर्विसेज़ नहीं, प्रोडक्ट कंपनियों को बढ़ावा दें। टैक्स छूट, फंडिंग और एक्सपोर्ट इंसेंटिव। हेल्थटेक, एग्रीटेक, एडटेक, डीफेंस टेक में निवेश। घरेलू बाज़ार टेक का बड़ा कस्टमर बने। टियर-2 शहरों में टेक हब: चेन्नई, पुणे, हैदराबाद से आगे इंदौर, भोपाल, लखनऊ।
लेऑफ़ के बाद ट्रांज़िशन अलाउंस 6 महीने तक बेसिक सपोर्ट। PF निकासी आसान, जॉब ट्रांज़िशन लोन। मेंटल हेल्थ हेल्पलाइन टेक वर्कर्स के लिए। ये कदम उठाएँ तो छंटनी का झटका कम लगेगा। कंपनियाँ भी सोचें हायरिंग में यथार्थवादी रहें। एआई को दुश्मन न मानें, सहायक बनाएँ। लेऑफ़ में पारदर्शिता: पहले वार्निंग, ट्रेनिंग और आउटप्लेसमेंट। भारत को बैकऑफिस न मानें, इनोवेशन हब बनाएँ। रिसर्च सेंटर खोलें।
कोडिंग के साथ बिज़नेस समझो। प्रोडक्ट मैनेजमेंट, डेटा एनालिसिस सीखो। एआई टूल्स (ChatGPT, GitHub Copilot) इस्तेमाल करो ये मदद करेंगे। सर्टिफिकेशन AWS, Google Cloud, Cybersecurity फ्री कोर्स से शुरू। लिंक्डइन एक्टिव रखो, मीटअप जाओ। मेंटॉर ढूँढो। फ्रीलांसिंग ट्राई करो Upwork, Fiverr पर छोटे प्रोजेक्ट्स।
एक जॉब पर मत अटको। साइड हसल शुरू करो। मेंटल हेल्थ का ध्यान योग, दोस्तों से बात। छोटे शहर शिफ्ट कम खर्च, अच्छी लाइफ।एक दोस्त की कहानी लेऑफ़ के बाद फ्रीलांस किया, अब अपना स्टार्टअप चला रहा। तुम भी कर सकते हो। टियर-2 शहर अब उभर रहे। इंटरनेट तेज़, ज़मीन सस्ती। यहाँ टेक हब बनें तो लाखों जॉब्स। सरकार सब्सिडी दे तो और बेहतर।



