
मेघालय के पूर्वी जयंतिया हिल्स जिले के ताशखाई (Thangskai) क्षेत्र में हुआ कोयला खदान विस्फोट भारतीय खनन इतिहास की एक और काली और भयावह त्रासदी के रूप में दर्ज हो गया है। 5 फरवरी 2026 की सुबह जब पूरा देश अपने दैनिक कार्यों में व्यस्त था, मेघालय की एक खदान के भीतर हुए भीषण धमाके ने 10 से अधिक श्रमिकों (प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार) की जान ले ली और कई अन्य को मलबे के नीचे दफन कर दिया। यह घटना केवल एक दुर्घटना नहीं है; यह उस अवैध ‘रैट-होल’ माइनिंग (Rat-hole Mining) संस्कृति का परिणाम है जिसे सर्वोच्च न्यायालय और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के प्रतिबंधों के बावजूद जड़ से खत्म नहीं किया जा सका है।
मेघालय की सुरम्य पहाड़ियों के नीचे छिपा ‘काला सोना’ यानी कोयला, एक बार फिर लाल हो गया है। ताशखाई में हुआ विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि उसकी गूँज कई किलोमीटर तक सुनी गई। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, विस्फोट के बाद खदान के मुहाने से काला धुआं और पत्थर के टुकड़े ऐसे निकले जैसे कोई ज्वालामुखी फटा हो।
प्रारंभिक जांच और मेघालय पुलिस के बयानों से संकेत मिलता है कि यह विस्फोट खदान के भीतर अवैध रूप से रखे गए जिलेटिन स्टिक्स या डायनामाइट के फटने से हुआ। रैट-होल माइनिंग में, खदान मालिक कोयले की परतों को तेजी से तोड़ने के लिए अक्सर भारी विस्फोटकों का उपयोग करते हैं। चूँकि ये खदानें वैज्ञानिक मानकों पर आधारित नहीं होतीं, इसलिए विस्फोटकों का रखरखाव और उपयोग बेहद असुरक्षित तरीके से किया जाता है। खदानों के भीतर अक्सर ‘मिथेन’ जैसी ज्वलनशील गैसें जमा हो जाती हैं। एक छोटा सा स्पार्क या अनियंत्रित विस्फोट पूरी खदान को ‘गैस चैंबर’ में तब्दील कर देता है।
इस हादसे में जान गंवाने वाले अधिकांश श्रमिक पड़ोसी राज्य असम के थे। यह एक कड़वी सच्चाई है कि मेघालय की खदानों में होने वाला जोखिम भरा काम अक्सर असम के गरीब इलाकों से आए प्रवासी मजदूर करते हैं। मृतकों में से एक श्रमिक असम के कटिगोड़ा (कछार जिला) के बिहारा गाँव का निवासी था। गाँव में खबर पहुँचते ही चीख-पुकार मच गई। ये श्रमिक अक्सर अपने परिवारों के लिए दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करने के लिए इन मौत की सुरंगों में उतरते हैं। अवैध खदानों में काम करने के कारण, इन श्रमिकों का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं होता। दुर्घटना की स्थिति में, इनके परिवारों के लिए न्याय पाना और मुआवजा हासिल करना एक लंबी और थकाऊ कानूनी लड़ाई बन जाता है।
मेघालय में कोयला खनन के लिए ‘रैट-होल’ पद्धति का उपयोग किया जाता है। इसमें पहाड़ों में 3 से 4 फीट चौड़े संकरे छेद किए जाते हैं, जिनमें श्रमिक रेंगते हुए अंदर जाते हैं और कोयला निकालते हैं। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने 2014 में इस पद्धति पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था क्योंकि यह न केवल श्रमिकों के लिए जानलेवा है, बल्कि इससे पर्यावरण (विशेषकर नदियों) को भारी नुकसान पहुँचता है। 2018 का कसान हादसा (जहाँ 15 मजदूर खदान में पानी भरने से मारे गए थे) और अब ताशखाई विस्फोट, यह स्पष्ट करते हैं कि प्रतिबंध केवल कागजों तक सीमित है। स्थानीय राजनीतिक और प्रशासनिक मिलीभगत से यह अवैध कारोबार धड़ल्ले से जारी है।
विस्फोट के तुरंत बाद मेघालय पुलिस और स्थानीय स्वयंसेवकों ने बचाव कार्य शुरू किया। बाद में NDRF और SDRF की टीमों को बुलाया गया। ताशखाई का इलाका ऊबड़-खाबड़ और दुर्गम है। भारी मशीनरी को खदान के मुहाने तक पहुँचाना ही एक बड़ी चुनौती थी। विस्फोट के बाद खदान का ढांचा अस्थिर हो गया था। मलबे को हटाने के दौरान बचाव दल को खुद के ऊपर पत्थर गिरने का डर बना रहा। साथ ही, जहरीली गैसों के स्तर की जांच करना भी अनिवार्य था।
मुख्यमंत्री और राज्य प्रशासन ने दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का वादा किया है। लेकिन क्या यह पर्याप्त है? इतनी बड़ी मात्रा में विस्फोटक खदान तक कैसे पहुँचे? बिना स्थानीय पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की जानकारी के यह संभव नहीं है। सरकार ने वैज्ञानिक तरीके से खनन शुरू करने की बात कही थी, लेकिन इसकी प्रक्रिया इतनी धीमी है कि अवैध खनन ही एकमात्र विकल्प बना हुआ है। मृतकों के परिवारों को मिलने वाली आर्थिक मदद उनकी स्थायी क्षति की भरपाई नहीं कर सकती। सरकार को ‘कोयला सिंडिकेट’ पर प्रहार करना होगा।
ताशखाई विस्फोट केवल एक दुखद समाचार नहीं है, बल्कि यह हमारे सिस्टम की सामूहिक विफलता का स्मारक है। कोयले की इस भूख ने अब तक न जाने कितने घरों के चिराग बुझा दिए हैं। जब तक राज्य सरकार और केंद्र मिलकर अवैध खनन के पीछे के ‘नेक्सस’ को नहीं तोड़ेंगे, तब तक गरीब मजदूर मौत की इन अंधेरी सुरंगों में अपनी जान गँवाते रहेंगे। असम के उस बिहारा गाँव के घर में जलता हुआ चूल्हा अब बुझ गया है, और पीछे छूट गए हैं केवल सवाल क्या अगली बार भी हम केवल एक नई दुर्घटना और नए मुआवजे का इंतजार करेंगे?



