
आमतौर पर जब सुरक्षाबलों या पुलिस की टीमें बम, हथगोले या अन्य विस्फोटकों को ज़ब्त करती हैं, तो उद्देश्य यही होता है आम लोगों की सुरक्षा को सुनिश्चित किया जाए। लेकिन जब यही ज़ब्त की गई सामग्री लापरवाही या कमजोर प्रोटोकॉल के कारण खुद हमारे सुरक्षा अधिकारियों के लिए खतरा बन जाए, तो यह पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर देता है। हाल ही में जम्मू-कश्मीर के नाउगाम पुलिस स्टेशन में घटित विस्फोट एक दर्दनाक उदाहरण है, जिसने सभी को चौंका दिया और यह सोचने पर मजबूर किया क्या हमारा सिस्टम सचमुच ऐसे जोखिमों के लिए तैयार है?
नाउगाम थाने में रखा तगड़ा विस्फोटक स्टॉक, जो मूल आतंकवादियों से ज़ब्त किया गया था, एक जांच प्रक्रिया के दौरान अचानक फट गया। इसमें कई पुलिसकर्मी और फॉरेंसिक विशेषज्ञ मारे गए। सालों से जमा की गई ये आतंक विरोधी जब्ती अचानक अभिशाप बन गई। इस हादसे की वजह तलाशते वक्त सबसे बड़ा सवाल यही बनता है क्या पुलिस स्टेशन वाकई इतने संवेदनशील, अस्थिर विस्फोटकों को रखने की सही जगह था?
ज्यादातर लोगों को सुन कर हैरानी होगी कि इतने संवेदनशील और अस्थिर विस्फोटक जिन्हें डीजीपी ने खुद “अनस्टेबल और सेंसिटिव” करार दिया पुलिस स्टेशन के खुले क्षेत्र में रखे गए थे। क्या ऐसा किया जाना चाहिए था? पुलिस स्टेशन, जो सामान्य लोगों की आवाजाही, गिरफ्तारियों, दस्तावेजी कार्य और शिकायतों का स्थान होता है, वहां इतने बड़े स्तर की संवेदनशील सामग्रियों को रखना सचमुच समझदारी थी? ऐसे मामलों में जोखिम मूल्यांकन ज़रूरी होता है। क्या स्थानीय पुलिस नेतृत्व ने खतरे का सही आकलन किया था? इस हादसे ने साबित कर दिया कि हमारे पास ठोस, स्पष्ट सुरक्षा प्रोटोकॉल का अभाव है।
घटना के बाद जो बातें सामने आईं, उनसे स्पष्ट होता है कि प्रमुख स्तर पर लापरवाही हुई आमतौर पर फ़ॉरेंसिक एक्सपर्ट्स यह फैसला लेते हैं कि कौन-से नमूने कहां, कैसे, और किन शर्तों में रखे जाएं। क्या उन्होंने सही तरीके से खतरे का अनुमान लगाया? विस्फोटक सामग्री के सैंपलिंग, हैंडलिंग के लिए अक्सर पूरी प्रक्रिया का दस्तावेज़ीकरण, आइसोलेशन और विशेषज्ञों की निगरानी आवश्यक है। यहाँ किसने किस जिम्मेदारी से चूक की? हादसे के बाद पुलिस, फॉरेंसिक, स्थानीय मजिस्ट्रेट सभी पर सवाल उठे हैं।
जब “संवेदनशील विस्फोटक” खुले क्षेत्र में रखे जाते हैं और हादसा होता है, तो सवाल उठता है जिम्मेवार कौन है? स्टॉक की सुरक्षा, रिस्क का आकलन, स्थान चयन इनमें अगर कोई चूक हुई है तो पुलिस प्रशासन पर जवाबदेही बनती है। सैंपलिंग, परीक्षण, निष्क्रिय करने की प्रक्रिया, डॉटिंग से हादसे तक कोई भी लापरवाही उनके दायरे में आती है। कुछ मामलों में ज्यूडिशियल ऑर्डर के तहत सबूत मालखाने की देखरेख भी होती है। क्या विभागों के बीच संवाद और SOP पर्याप्त सख्त हैं?
दुनिया भर में विस्फोटकों की सैंपलिंग, संग्रहण के लिए सख्त नियम होते हैं। ऐसे अस्थिर विस्फोटकों को जन-संपर्क क्षेत्र (पुलिस स्टेशन) में ना रखकर किसी दूरस्थ, सुरक्षित आइसोलेटेड स्थान पर रखना चाहिए। कितने समय बाद, किन स्थितियों में मालखाने (एविडेंस स्टोर) की सामग्री की दोबारा जांच होती है? क्या यहां नियमों का पालन हुआ? फॉरेंसिक टीमों को खतरनाक सामग्रियों को टेस्ट करने के दौरान पर्याप्त प्रशिक्षण, उपकरण और प्रोटोकॉल होने चाहिए।
जम्मू-कश्मीर के डीजीपी ने खुद कहा “ये विस्फोटक अस्थिर और काफी संवेदनशील थे”। उन्होंने पुलिस वालों को तुरंत राहत कार्य करने से रोका था, लेकिन हादसा फिर भी हो गया। सवाल उठता है क्या डीजीपी की चेतावनी पर्याप्त थी, या व्यवस्था शुरू से ही त्रुटिपूर्ण थी?
हर पुलिस स्टेशन, फॉरेंसिक लैब, ज्यूडिशियल अधिकारी के लिए SOP बननी चाहिए बड़े स्तर के विस्फोटक केवल प्रमाणित स्टोरेज फैसिलिटी में रखे जाएं। पुलिस स्टेशन के खुले या सामान्य क्षेत्र में किसी विस्फोटक का संग्रहण प्रतिबंधित हो। हर स्टॉक के लिए बार-कोड, ट्रैकिंग सिस्टम हो। हर विस्फोटक की ‘रिस्क लेबलिंग’ हो, ताकि नया स्टाफ भी उसका खतरा जान सके।
फॉरेंसिक सैंपलिंग के लिए पूर्ण-सेफ्टी गियर का इस्तेमाल अनिवार्य हो। टीम की ट्रेनिंग पर विशेष जोर हो खासकर आतंक-विरोधी सुरक्षा कार्यों के लिए। सैंपल भेजते वक्त डबल पैकिंग, इंसुलेशन हो। जवानों के लिए एक्स्ट्रा ट्रेनिंग प्रोटोकॉल, इमरजेंसी रिस्पांस और इवैक्युएशन पर। विस्फोटक रखने के स्थानों का समय-समाप्ति ऑडिट हो कब, कितने समय के लिए रखा गया।
कोर्ट के आदेश के बाद मानसिक रूप से ध्यान दें कि क्या रखी गई सामग्री सुरक्षित है। कोर्ट के आदेश, जांच प्रक्रिया के दौरान विशेषज्ञों की राय अनिवार्य की जाए। जनता एवं आसपास रह रहे स्थानीय नागरिकों को अनौपचारिक जानकारी दी जाए, कि उनके क्षेत्र में विस्फोटक रखा गया है। मीडियाकर्मियों के लिए सूचना तंत्र पारदर्शी हो।
सुरक्षा के नाम पर ज़ब्त किया गया सामान जब खुद लापरवाही का शिकार होकर लोगों की जान ले लेता है, तो यह तकनीकी गलती नहीं, बल्कि सामाजिक त्रासदी बन जाती है। नाउगाम पुलिस स्टेशन विस्फोट का दर्द परिवारों की बर्बादी, विभाग की स्वाभिमान पर चोट और व्यवस्था की विफलता यह सब एक लंबे समय तक समाज में याद रहेगा।
इस विषय की गंभीरता को समझते हुए, अब समय आ गया है कि पुलिस, फॉरेंसिक, मजिस्ट्रेट सब अपनी जिम्मेदारी नए सिरे से तय करें। सुरक्षा एवं सबूत संग्रहण की प्रक्रिया पूर्णत: वैज्ञानिक, तकनीकी और मानवीय बनें। नये SOP, ट्रेनिंग, और रियल-टाइम मॉनिटरिंग अपनाई जाए। अगर सिस्टम यह सोचता रहे कि ‘हादसा तो हो ही सकता था’, तो असल बदलाव नहीं आएगा जब तक प्रत्येक जिम्मेदार अधिकारी खुद की भूमिका को गंभीरता से ना समझे।
नाउगाम हादसा एक चेतावनी है जब सुरक्षातंत्र, सीमित संसाधन, और लापरवाही मिल जाएं तो आफत कभी भी आ सकती है। इस घटना ने प्रशासन, वैज्ञानिक विशेषज्ञों, पुलिस नेतृत्व और सामाजिक व्यवस्था सबको एक बड़ा सबक दिया है। आगे अगर हम सचमुच देश की सुरक्षा मजबूत करना चाहते हैं, तो न केवल आतंकियों से जब्त सामग्री पर, बल्कि हमारी अपने सिस्टम की कमजोरियों पर भी हथौड़ा चलाना ज़रूरी होगा।



