ओपिनियनपर्यावरणराष्ट्रीय

वायु प्रदूषण का वार्षिक चक्र: हर सर्दी में प्रदूषण क्यों लौटता है और समाधान क्यों नहीं?

राज्यों का संघर्ष और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप

नवंबर आते ही, उत्तर भारत, विशेषकर दिल्ली-एनसीआर, एक जानी-पहचानी और डरावनी सच्चाई का सामना करने लगता है प्रदूषण की दम घोंटने वाली चादर। यह केवल धुंध नहीं है; यह लाखों टन ज़हरीली गैसों और सूक्ष्म कणों का कॉकटेल है, जो हमारे फेफड़ों में घुसकर जीवन प्रत्याशा को कम कर रहा है।

यह वार्षिक संकट केवल एक पर्यावरणीय समस्या नहीं है, बल्कि यह हमारी राजनीतिक दृढ़ता, प्रशासनिक क्षमता और वैज्ञानिक समझ की सामूहिक विफलता का प्रतीक बन चुका है। हर साल, हम कारण जानते हैं, हम उपाय सुझाते हैं, हम करोड़ों खर्च करते हैं, और फिर भी, समाधान कभी नहीं लौटते। जैसे ही मौसम साफ होता है, राजनेता और अधिकारी राहत की साँस लेते हैं और अगले साल के संकट का इंतज़ार करने लगते हैं।

वायु प्रदूषण का संकट अब कोई अप्रत्याशित घटना नहीं है। यह एक वार्षिक कैलेंडर की तरह है, जिसके हर चरण को हम पहले से जानते हैं, लेकिन कार्रवाई करने से चूक जाते हैं। सर्दियों में प्रदूषण बढ़ने का तात्कालिक कारण मौसम है। तापमान गिरते ही, हवा की गति धीमी हो जाती है। यह “वायुमंडलीय व्युत्क्रमण” नामक एक घटना पैदा करता है, जहाँ ज़मीन के करीब की ठंडी हवा प्रदूषकों को ऊपर उठने नहीं देती। प्रदूषण की यह चादर एक कटोरे की तरह ज़मीन पर ही अटक जाती है, जिससे हवा की गुणवत्ता गिरकर “गंभीर” श्रेणी में पहुँच जाती है।

हमारा प्रतिक्रिया तंत्र हमेशा एकल-केंद्रित रहा है। जैसे ही संकट गहराता है, हम तुरंत पराली को दोष देते हैं। हाँ, पराली एक बड़ा योगदानकर्ता है, लेकिन यह केवल 20-30% प्रदूषण के लिए ज़िम्मेदार है। बाकी 70-80% प्रदूषण पूरे साल स्थानीय स्रोतों से आता है। वाहन उत्सर्जन, धूल और निर्माण कार्य, उद्योग और बिजली संयंत्र, बायोमास जलाना (गरीबों द्वारा ईंधन के रूप में) हमारी विफलता यह है कि हम पूरे साल 70% प्रदूषण पैदा करने वाले स्रोतों पर कार्रवाई नहीं करते, और जब संकट आता है, तो हम सिर्फ़ 30% वाले स्रोत (पराली) पर शोर मचाते हैं।

समाधानों की विफलता का सबसे बड़ा कारण राज्यों और केंद्र के बीच समन्वय की कमी और राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव है। वायु प्रदूषण एक “अंतर-राज्यीय” समस्या है। दिल्ली की हवा को पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान की औद्योगिक और कृषि गतिविधियाँ प्रभावित करती हैं। समस्या को हल करने के बजाय, हर साल दिल्ली सरकार पंजाब/हरियाणा को, और केंद्र सरकार सभी राज्यों को दोष देती है।

यह राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का खेल प्रदूषण को एक “राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल” के बजाय एक “राजनीतिक मुद्दा” बना देता है।एक केंद्रीय, अधिकार संपन्न प्राधिकरण की आवश्यकता है जो राज्यों की सीमाओं से ऊपर उठकर, पूरे एनसीआर क्षेत्र के लिए एक समान और बाध्यकारी नीति लागू कर सके, और उल्लंघन करने पर राज्यों और निगमों पर भारी जुर्माना लगा सके।

हमारे समाधान हमेशा अस्थायी और प्रतिक्रियात्मक होते हैं, न कि संरचनात्मक और निवारक। ऑड-ईवन योजना, पानी का छिड़काव, निर्माण पर अस्थायी रोक ये संकट को टालने के लिए ज़रूरी हो सकते हैं, लेकिन ये प्रदूषण को जड़ से खत्म नहीं कर सकते। हमने कभी भी सार्वजनिक परिवहन के बुनियादी ढाँचे में पर्याप्त निवेश नहीं किया, पुराने डीज़ल वाहनों को सड़क से हटाने के लिए कोई कठोर नीति नहीं बनाई, और औद्योगिक उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिए तकनीकी उन्नयन में सब्सिडी नहीं दी। जब तक हम संरचनात्मक परिवर्तन को प्राथमिकता नहीं देते, तब तक हर सर्दी में हमें अल्पकालिक समाधानों पर निर्भर रहना पड़ेगा।

स्थायी समाधानों को लागू करने में विफलता के लिए चार प्रमुख क्षेत्रों में हमारी नीतिगत ढिलाई जिम्मेदार है पराली जलाना किसानों की मजबूरी है, न कि शौक। गेहूँ की अगली फसल बोने के लिए उनके पास समय और पैसे दोनों की कमी होती है। हैप्पी सीडर जैसी मशीनें पराली को मिट्टी में मिला सकती हैं, लेकिन वे महंगी हैं और छोटे किसानों की पहुँच से बाहर हैं। सब्सिडी या तो पर्याप्त नहीं है, या नौकरशाही के कारण समय पर नहीं मिलती।

सरकार पराली को बायोमास प्लांट, पैकेजिंग उद्योग या पशु चारे के लिए एक आर्थिक संपत्ति बनाने में विफल रही है। जब तक किसान को पराली जलाने से ज़्यादा लाभ उसे बेचकर नहीं होगा, तब तक वह पराली जलाता रहेगा। समाधान पराली को अपराध बनाने में नहीं, बल्कि उसे आय का स्रोत बनाने में है।

वायु प्रदूषण में सबसे बड़ा स्थानीय योगदान वाहन उत्सर्जन का है, खासकर 10 साल पुराने डीज़ल और 15 साल पुराने पेट्रोल वाहनों का। पुराने वाहन नए वाहनों की तुलना में कई गुना अधिक प्रदूषित करते हैं। लेकिन लाखों वाहनों को एक झटके में सड़क से हटाना राजनीतिक रूप से फैसला होता है। ‘स्क्रैपेज पॉलिसी’ या तो धीमी है या उसमें पर्याप्त वित्तीय प्रोत्साहन नहीं है। सार्वजनिक परिवहन की खराब गुणवत्ता लोगों को निजी वाहनों, विशेषकर दोपहिया वाहनों, पर निर्भर रहने के लिए मजबूर करती है। जब तक हर नागरिक को सुरक्षित, आरामदायक और सस्ते मेट्रो/बस विकल्प नहीं मिलते, तब तक निजी वाहनों की संख्या कम नहीं होगी।

पूरे साल होने वाला निर्माण कार्य और सड़कों पर उड़ती धूल प्रदूषण का एक बड़ा हिस्सा है। निर्माण स्थल पर धूल नियंत्रण (जैसे जाली लगाना, पानी का छिड़काव) के सख्त नियम हैं, लेकिन उनका कार्यान्वयन नगण्य है। नगर निगम और स्थानीय निकाय इन उल्लंघनों पर आँखें मूंद लेते हैं। सड़कों का अधूरा निर्माण, खराब रखरखाव और खुले में कचरा जलाना धूल के मुख्य स्रोत हैं, जिन पर स्थानीय निकाय अपनी प्रशासनिक विफलता के कारण ध्यान नहीं देते।

एनसीआर के आसपास के औद्योगिक क्लस्टर और थर्मल पावर प्लांट प्रदूषण के निरंतर स्रोत हैं। कई उद्योगों को उत्सर्जन नियंत्रण प्रौद्योगिकियाँ अपनाने की आवश्यकता है। इन तकनीकों को अपनाने की लागत इतनी अधिक होती है कि कई इकाइयाँ नियम तोड़ने या अस्थायी रूप से बंद होने का विकल्प चुनती हैं। बिजली उत्पादन के लिए कोयले पर हमारी निर्भरता अभी भी बहुत अधिक है। स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों पर पर्याप्त रूप से तेजी से स्विच न करने की नीतिगत विफलता पूरे क्षेत्र में प्रदूषण को बढ़ाती है।

समाधानों की विफलता की कीमत कोई और नहीं, बल्कि देश का आम नागरिक चुका रहा है और यह कीमत बहुत भारी है। प्रदूषण सीधे तौर पर बच्चों, बुजुर्गों और अस्थमा रोगियों के जीवन को खतरे में डालता है। दिल्ली में रहने वाले हर निवासी के फेफड़ों को भारी क्षति पहुँच रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मानकों से 10 गुना अधिक प्रदूषित हवा में साँस लेना हमारी सबसे बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है। जो लोग मज़दूरी करते हैं, रिक्शा चलाते हैं या सड़कों पर काम करते हैं, वे सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। उनके पास एयर प्यूरीफायर या मास्क खरीदने का विकल्प नहीं है। उनके लिए “साँस लेना भी एक लग्ज़री बन जाता है।”

प्रदूषण के कारण स्कूलों, कार्यालयों और निर्माण स्थलों को बंद करना पड़ता है। इससे करोड़ों रुपये का आर्थिक नुकसान होता है। स्वास्थ्य खर्च में वृद्धि, उत्पादकता में कमी और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर “सबसे प्रदूषित शहर” की छवि देश की निवेश क्षमता और पर्यटन को बुरी तरह प्रभावित करती है।

इस संकट से निकलने के लिए हमें तात्कालिक प्रतिक्रियाओं को छोड़कर, पाँच-सूत्रीय संरचनात्मक समाधान अपनाना होगा वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए अंतर-राज्यीय सहयोग के साथ एक कानूनी रूप से सशक्त और बाध्यकारी ‘एनसीआर वायु गुणवत्ता प्रबंधन प्राधिकरण’ की आवश्यकता है। इस प्राधिकरण को राज्यों पर नियम लागू करने, समय-सीमा निर्धारित करने और जुर्माना लगाने की पूरी शक्ति होनी चाहिए। बसों, मेट्रो और उपनगरीय रेल नेटवर्क का विस्तार किया जाए, जो कि निजी वाहनों से तेज़, सस्ता और अधिक आरामदायक हो। सख्त स्क्रैपेज नीति लागू की जाए जिसमें पुराने डीज़ल वाहनों को हटाने के लिए आकर्षक वित्तीय पैकेज दिए जाएँ।

निजी उद्यमियों को पराली खरीदने और उसका उपयोग करने के लिए टैक्स में छूट और सब्सिडी दी जाए, ताकि किसान को पराली जलाने के बजाय बेचने में फायदा हो। पराली प्रबंधन मशीनों की खरीद के लिए किसानों को अग्रिम नकद प्रोत्साहन दिया जाए। निर्माण स्थलों पर प्रदूषण नियंत्रण के नियमों का उल्लंघन करने वालों पर तुरंत और भारी जुर्माना लगाया जाए। नगर निगमों को सड़कों की सफाई के लिए आधुनिक मशीनों का उपयोग करना अनिवार्य किया जाए और खुले में कूड़ा जलाने पर सख्त दंडात्मक कार्रवाई की जाए।

हर साल सर्दी में प्रदूषण वापस आता है, क्योंकि हर साल समाधानों को टाल दिया जाता है। यह संकट अब विज्ञान, तकनीक या पैसे की कमी के कारण नहीं है यह राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण है। जब देश के नेता चुनाव प्रचार के लिए समय और संसाधन जुटा सकते हैं, तो वे अपने नागरिकों को शुद्ध हवा देने के लिए भी समन्वय और दृढ़ता दिखा सकते हैं। अब समय आ गया है कि हमारी सरकारों को यह समझना होगा कि साँस लेने का अधिकार कोई विकल्प नहीं है, यह एक मौलिक अधिकार है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button