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साल में दूसरी बार किराया वृद्धि: रेलवे अपनी तिजोरी भर रहा है या यात्रियों पर बोझ?

बार-बार बढ़ोतरी: स्पष्टीकरण की कमी

भारत जैसे विशाल देश में, जहाँ करोड़ों लोग आज भी अपनी रोज़ी-रोटी के लिए रोज़ाना ट्रेनों का सफर करते हैं, रेलवे महज़ परिवहन का एक साधन नहीं है। यह एक सामाजिक तंतु है जो उत्तर को दक्षिण और पूर्व को पश्चिम से जोड़ता है। लेकिन हाल के दिनों में पटरियों पर दौड़ती ट्रेनों की रफ़्तार के साथ-साथ उनके किरायों की रफ़्तार भी बढ़ गई है।

एक ही साल के भीतर किरायों में दूसरी बार बढ़ोतरी की खबर ने आम आदमी को चौंका दिया है। सरकार का तर्क है कि रेलवे को ‘आत्मनिर्भर’ और ‘आधुनिक’ बनाने के लिए राजस्व की ज़रूरत है। वहीं, यात्रियों का सवाल है कि क्या उनकी जेब काटकर ही विकास की पटरी बिछाई जाएगी?

भारतीय रेलवे हमेशा से एक अजीब कशमकश में रही है। उसे एक ‘व्यापारिक इकाई’ की तरह मुनाफा भी कमाना है और एक ‘कल्याणकारी संस्थान’ की तरह गरीबों को सस्ता सफर भी देना है। रेलवे की वित्तीय सेहत को मापने का सबसे बड़ा पैमाना है ‘ऑपरेटिंग रेशियो’। इसका मतलब है कि 100 रुपये कमाने के लिए रेलवे को कितने रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। पिछले कुछ सालों में यह आंकड़ा 95 से 98 के बीच रहा है, जो बेहद चिंताजनक है। इसका मतलब है कि रेलवे के पास नई परियोजनाओं के लिए अपनी कमाई से बहुत कम पैसा बचता है।

रेलवे की एक पुरानी समस्या ‘क्रॉस-सब्सिडी’ है। मालभाड़े (Freight) से होने वाली कमाई का इस्तेमाल यात्री किराए को कम रखने में किया जाता है। लेकिन अब स्थिति यह है कि मालभाड़ा इतना महंगा हो गया है कि कंपनियाँ रेल के बजाय ट्रकों का सहारा ले रही हैं। ऐसे में रेलवे के पास यात्री किराए बढ़ाने के अलावा कोई आसान रास्ता नहीं दिखता।

आज हम ‘वंदे भारत’, ‘अमृत भारत’ स्टेशनों और बुलेट ट्रेन की बातें कर रहे हैं। निश्चित रूप से, भारतीय रेलवे का आधुनिकीकरण ज़रूरी है, लेकिन सवाल इसकी ‘कीमत’ का है। रेलवे का ध्यान अब प्रीमियम और वातानुकूलित (AC) क्लास पर ज़्यादा है। स्लीपर और जनरल कोचों की संख्या कम की जा रही है। ऐसे में साल में दो बार किराया बढ़ाना उस यात्री के साथ अन्याय है जो महज़ पहुँचने के लिए ट्रेन का सहारा लेता है, विलासिता (Luxury) के लिए नहीं।

कई बार सीधी किराया वृद्धि के बजाय ‘सुपरफास्ट सरचार्ज’, ‘डायनेमिक प्राइसिंग’ या ‘स्पेशल ट्रेन’ के नाम पर पैसे वसूले जाते हैं। जब ये छोटे-छोटे खर्चे मिलते हैं, तो यात्री को पता चलता है कि उसका सफर पिछले साल के मुकाबले 30-40% महंगा हो गया है। एक साल में दो बार किराया बढ़ाना यह दर्शाता है कि रेलवे के पास कोई दीर्घकालिक (Long-term) वित्तीय योजना नहीं है। इसे ‘पॉलिसी बाय इंक्रीमेंट’ (Policy by Increment) कहा जा सकता है, जहाँ अचानक ज़रूरत पड़ने पर किराया बढ़ा दिया जाता है।

रेलवे प्रशासन अक्सर ‘बढ़ती ईंधन लागत’ और ‘सातवें वेतन आयोग’ का हवाला देता है। लेकिन क्या यात्री को यह बताया जाता है कि उसके अतिरिक्त पैसे से वास्तव में सेवा में क्या सुधार हुआ है? क्या ट्रेनें अब समय पर चल रही हैं? क्या जनरल कोचों में भीड़ कम हुई है? क्या टॉयलेट साफ हैं? जब तक सेवा की गुणवत्ता नहीं बढ़ती, बार-बार किराया बढ़ाना अनैतिक लगता है। रेलवे को अपनी अकुशलता (Inefficiency) और फिजूलखर्ची को छिपाने के लिए जनता की जेब का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। क्या रेलवे ने अपने गैर-किराया राजस्व (Non-fare revenue) जैसे विज्ञापनों और खाली ज़मीनों के मुद्रीकरण पर पर्याप्त काम किया है?

रेलवे के आंकड़ों में जिसे ‘पैसेंजर’ कहा जाता है, वह वास्तव में एक मज़दूर है जो काम की तलाश में शहर जा रहा है, एक छात्र है जो परीक्षा देने जा रहा है, या एक मरीज़ है जिसे इलाज के लिए बड़े अस्पताल जाना है। त्योहारों के समय जब लोग घर जाने की सोचते हैं, तो किरायों में यह बढ़ोतरी उनके बजट को बिगाड़ देती है। जब रेल किराया बढ़ता है, तो मालभाड़े पर भी असर पड़ता है (या दबाव बढ़ता है), जिससे बाज़ार में सब्ज़ियों और राशन की कीमतें भी बढ़ सकती हैं। यानी, ट्रेन का सफर महंगा होने का मतलब है थाली की रोटी का महंगा होना।

रेलवे को अपनी वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए ‘इंसानी चेहरा’ नहीं खोना चाहिए। रेलवे को अपने परिचालन खर्चों में तकनीक का इस्तेमाल कर कटौती करनी चाहिए। ‘कवच’ जैसी तकनीकों से न केवल सुरक्षा बढ़ेगी, बल्कि दुर्घटनाओं से होने वाला भारी नुकसान भी बचेगा। अगर रेलवे माल ढुलाई की रफ़्तार बढ़ाए और उसे सस्ता करे, तो यात्री किरायों पर दबाव कम हो सकता है। किराया वृद्धि केवल एसी और प्रीमियम क्लास तक सीमित होनी चाहिए। स्लीपर और जनरल क्लास को ‘पब्लिक सर्विस’ मानकर सुरक्षा दी जानी चाहिए।बिजली क्षेत्र की तरह रेलवे के लिए भी एक स्वतंत्र ‘रेलवे टैरिफ अथॉरिटी’ होनी चाहिए, जो राजनीतिक दबाव के बजाय तर्कसंगत तरीके से किराया तय करे।

रेलवे को सुधारने के नाम पर यात्रियों को सजा नहीं दी जा सकती। अगर भारतीय रेलवे केवल अमीरों और उच्च मध्यम वर्ग की सवारी बनकर रह गई, तो यह अपने बुनियादी उद्देश्य से भटक जाएगी।

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