
हाल ही में लागू हुआ भारत–EFTA (यूरोपीय फ्री ट्रेड एसोसिएशन) व्यापार और आर्थिक भागीदारी समझौता यानी TEPA, भारतीय आर्थिक नीतियों में परिवर्तन का प्रतीक बन गया है। सरकार इस समझौते को ऐतिहासिक मान रही है लगभग 100 अरब डॉलर विदेशी निवेश और 10 लाख प्रत्यक्ष रोजगार की बाध्यकारी प्रतिबद्धता इसका हिस्सा है। लेकिन इन बड़े वादों के नीचे कई सवाल दफ्न हैं क्या यह समझौता संवेदनशील क्षेत्रों को सुरक्षा दे सकेगा? भारतीय श्रमिकों के हित, श्रम–पर्यावरण मानकों की गारंटी और समावेशी लाभ की राह कितनी आसान है?
EFTA में स्विट्ज़रलैंड, नॉर्वे, आइसलैंड और लिक्टेंस्टीन शामिल हैं, जिनकी अपनी तकनीकी और निवेश सामर्थ्य है। TEPA भारत के लिए पहला ऐसा मुक्त व्यापार समझौता है, जिसमें निवेश और रोजगार सृजन की बाध्यकारी शर्तें हैं। यह न केवल यहाँ के औद्योगिक बुनियाद को मज़बूती देने का दावा करता है बल्कि भारतीय उत्पादों, सेवाओं और कौशलों को वैश्विक मंच देने की संभावना जगाता है।
सरकारी बयान के अनुसार, अगले 15 वर्ष में 100 बिलियन डॉलर का निवेश और लाखों प्रत्यक्ष रोजगार का लक्ष्य रखा गया है। यह उच्च महत्वाकांक्षी लक्ष्य है, लेकिन केवल आंकड़ों के भरोसे बैठना सही नहीं होगा। मुख्य चुनौती इन निवेश और नौकरियों की जमीनी पहुंच है क्या यह केवल मेट्रो शहरों और तकनीकी सेक्टर तक सीमित रह जाएगा? या इसका लाभ समाज के व्यापक तबके और ग्रामीण–शहरी श्रमिकों तक भी पहुँच पाएगा? अक्सर देखा गया है कि ऐसे समझौते बहुराष्ट्रीय कंपनियों को तो पर्याप्त अवसर देते हैं, लेकिन छोटे-शहरी, ग्रामीण श्रमिकों तक लाभ सीमित रह जाता है।
दूध, खेती, वस्त्र, चमड़ा और हस्तशिल्प जैसे क्षेत्र पहले से ही वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दबाव में हैं। TEPA का दावा है कि भारत अपने संवेदनशील सेक्टरों को संरक्षण देता रहेगा, लेकिन इसके लिए एक स्पष्ट रणनीति जरूरी है कृषि उत्पादों पर आयात शुल्क में क्रमिक कटौती, गुणवत्ता सुधार की पहल और घरेलू उद्यमों को प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार किया जाना नितांत आवश्यक है। यदि यह नहीं हुआ, तो आयात में अचानक वृद्धि से लाखों भारतीय किसान और कारीगर संकट से जूझ सकते हैं।
EFTA देशों में श्रमिक अधिकार और उचित वेतन जैसी सामाजिक सुरक्षा पहले से ही मजबूत हैं। भारत में आज भी असंगठित क्षेत्र की विशालता और न्यून वेतन, अनियमित रोजगार सुरक्षा के बड़े मुद्दे कायम हैं। यदि TEPA को सही मायनों में ‘जन–हितकारी’ बनाना है, तो इसके अंतर्गत आने वाली विदेशी कंपनियों का श्रम कानूनों का सम्पूर्ण पालन जरूरी बनाना होगा। समान काम के लिए समान वेतन और सुरक्षित कार्यस्थल सुनिश्चित करना होगा। औद्योगिक और तकनीकी प्रशिक्षण की नई शुरुआत करनी होगी, जिससे भारतीय श्रमिकों को वैश्विक मानक वाली नौकरियां मिल सकें इन सबकी सतत निगरानी और पारदर्शिता के बिना यह समझौता केवल बयानबाजी बन सकता है।
EFTA देश पर्यावरण–संबंधित नियमों में कड़े हैं यह भारत के लिए एक नई चुनौती है। TEPA के तहत टेक्नोलॉजी, अक्षय ऊर्जा, स्वच्छ उत्पादन जैसी धाराओं को मजबूती मिलने की संभावना है। लेकिन उद्योगों की वर्तमान स्थिति देखते हुए यह परिवर्तन रातों-रात सम्भव नहीं। बिना पर्यावरण–अनुकूल निवेश की अनिवार्यता जोड़े हुए, केवल आर्थिक विकास के नाम पर पारिस्थिति की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। समझौते में ‘ग्रीन क्लॉज’ जैसी व्यवस्था इसकी जाँच करती रहे।
TEPA का सीधा लाभ किस तक पहुँचेगा, इसका उत्तर नीतिगत योजनाओं में छुपा है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों को स्थानीय सामग्री, सेवा, तकनीक, श्रमिकों के अधिकतम उपयोग के लिए प्रेरित किया जाए, तभी ग्रामीण–शहरी दोनों स्तरों पर रोजगार और समावेशी आर्थिक सुधार का लक्ष्य साकार होगा। स्किल मिशन का विशेष ध्यान और छोटे उद्यमों के लिए प्रोत्साहन पैकेज की जरूरत होगी ताकि निवेश का लाभ केवल चुनिंदा जगहों तक सीमित न रह जाए।
TEPA भारत को वैश्विक सप्लाई चेन में मजबूती से जोड़ने वाला एक बड़ा मंच है। इस समझौते के वादे तभी फलीभूत होंगे जब निवेश, रोजगार, पर्यावरण और समावेशी विकास की सभी तैयारियों को नीति और व्यवस्था का हिस्सा बनाया जाए। भारतीय श्रमिकों के लिए भी यह मौका है अगर नीतियां संवेदनशील, पारदर्शी और कार्यान्वयन–केंद्रित हों। अन्यथा, यह समझौता भी कई पुराने समझौतों की तरह सिर्फ आंकड़ों तक ही सीमित रह जाएगा।



