राष्ट्रीयशिक्षा

चिकित्सा सुशासन का पतन, व्यवस्थागत विफलता और जन-स्वास्थ्य पर गंभीर संकट

राजस्थान में FMGE फेल एमबीबीएस स्नातकों के फर्जी पंजीकरण घोटाले, SOG की दंडात्मक कार्रवाई

10 June 2026 को राजस्थान के स्वास्थ्य क्षेत्र, प्रशासनिक सुशासन (Administrative Governance) और विधिक न्याय प्रणाली को झकझोर देने वाला एक अत्यंत गंभीर, अभूतपूर्व और भयावह आपराधिक नेटवर्क सामने आया है। राज्य की कानून-व्यवस्था, नैतिक मूल्यों और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा (Public Health Security) को ताक पर रखकर पिछले कई वर्षों से संचालित हो रहे एक विशाल चिकित्सा पंजीकरण रैकेट (Medical Registration Racket) का भंडाफोड़ हुआ है। राजस्थान पुलिस के विशेष अभियान दल (Special Operations Group – SOG) ने त्वरित, आक्रामक और कड़े विधिक कदम उठाते हुए इस घोटाले के मुख्य मास्टरमाइंडों, दलालों और राजस्थान मेडिकल काउंसिल के पूर्व अधिकारियों सहित 28 मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है।

यह घोटाला सीधे तौर पर उन विदेशी-शिक्षित एमबीबीएस (MBBS) स्नातकों से जुड़ा है, जो विदेशों (जैसे रूस, चीन, यूक्रेन, और किर्गिस्तान) से चिकित्सा की डिग्री लेकर भारत लौटे थे, लेकिन भारत में वैध रूप से चिकित्सा अभ्यास (Medical Practice) करने के लिए राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड (NBE) द्वारा आयोजित की जाने वाली अनिवार्य ‘विदेशी चिकित्सा स्नातक परीक्षा’ (Foreign Medical Graduate Examination – FMGE) को पास करने में पूरी तरह विफल रहे थे। इसके बावजूद, जाली दस्तावेजों और भारी रिश्वत के दम पर उन्हें राजस्थान के विभिन्न जिलों में वैध डॉक्टर बनाकर तैनात कर दिया गया, जहाँ वे वर्षों से अनजाने मरीजों का इलाज कर रहे थे।

SOG की शुरुआती जांच और फॉरेंसिक विश्लेषण में इस घोटाले के पीछे एक बेहद सुनियोजित, संस्थागत और कड़े आपराधिक गठजोड़ का खुलासा हुआ है, जिसमें राजस्थान मेडिकल काउंसिल (RMC) के पूर्व शीर्ष विधिक और प्रशासनिक अधिकारियों की सीधी संलिप्तता सामने आई है विदेशों से लाखों रुपये खर्च करके एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करने के बाद भी लगभग 80% से 85% छात्र भारत की कठिन FMGE परीक्षा को पास नहीं कर पाते। यह रैकेट ऐसे ही असफल, निराश और आर्थिक रूप से संपन्न उम्मीदवारों को अपना निशाना बनाता था।

प्रति उम्मीदवार ₹20,00,000 से लेकर ₹30,00,000 तक की भारी-भरकम रिश्वत राशि ली जाती थी। इस राशि का एक बड़ा हिस्सा राजस्थान मेडिकल काउंसिल के भीतर बैठे भ्रष्ट लोक सेवकों, बाहरी दलालों और जाली दस्तावेज बनाने वाले तकनीकी विशेषज्ञों के बीच कड़ाई से विभाजित किया जाता था।

एनबीई (NBE) के पासिंग सर्टिफिकेट के स्थान पर हूबहू दिखने वाले जाली और कूट रचित (Forged) प्रमाण पत्र तैयार किए जाते थे। इसके साथ ही, राज्य के विभिन्न मेडिकल कॉलेजों और जिला अस्पतालों के नाम पर फर्जी ‘अनिवार्य रोटेटरी मेडिकल इंटर्नशिप’ (CRMI) के प्रमाण पत्र भी फाइल में लगा दिए जाते थे। आरएमसी के भ्रष्ट अधिकारी बिना किसी केंद्रीय वेरिफिकेशन या भौतिक सत्यापन के, इन जाली दस्तावेजों को विधिक रूप से मंजूरी दे देते थे और उम्मीदवारों को एक वैध ‘स्थायी पंजीकरण संख्या’ (Permanent Registration Number) आवंटित कर दी जाती थी, जिससे वे कानूनन डॉक्टर के रूप में अभ्यास करने के पात्र दिखें।

इस अभूतपूर्व चिकित्सा धोखाधड़ी के उजागर होने के बाद, राजस्थान के मुख्यमंत्री और गृह मंत्रालय के कड़े निर्देश पर SOG ने राज्यव्यापी स्तर पर एक व्यापक सर्च और सीज़र ऑपरेशन (Search Operation) चलाया है SOG द्वारा अब तक गिरफ्तार किए गए 28 आरोपियों में इस पूरे नेटवर्क के मुख्य सूत्रधार, जाली कागजात बनाने वाले कंप्यूटर ऑपरेटर, बिचौलिए और राजस्थान मेडिकल काउंसिल के कुछ पूर्व नोडल विधिक अधिकारी शामिल हैं। इन अधिकारियों पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कड़े धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।

SOG के वरिष्ठ महानिदेशक के अनुसार, वर्तमान में 100 से अधिक ऐसे संदिग्ध ‘डॉक्टर’ और प्रशासनिक कर्मचारी जांच के कड़े दायरे में हैं, जिन्होंने इस रैकेट का लाभ उठाया था। राज्य के सभी चिकित्सा संस्थानों से इन संदिग्धों की फाइलों को ज़ब्त कर लिया गया है। इस घोटाले की जड़ें किसी एक जिले तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसका जाल जयपुर, जोधपुर, कोटा, उदयपुर, बीकानेर और सीकर सहित राजस्थान के कई प्रमुख जिलों के सरकारी व निजी अस्पतालों, नर्सिंग होमों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक फैला हुआ है।

यह चिकित्सा धोखाधड़ी केवल वित्तीय भ्रष्टाचार या कागजी हेरफेर का साधारण मामला नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर ‘दोषपूर्ण मानव वध’ (Culpable Homicide) और मानव जीवन के साथ किया गया एक अक्षम्य और कड़ा अपराध है। चिकित्सा एक ऐसा संवेदनशील पेशा है जहाँ एक डॉक्टर की मामूली सी चूक या गलत दवा मरीज के प्राण ले सकती है। जो छात्र भारत की न्यूनतम पात्रता परीक्षा (FMGE) भी पास नहीं कर सके, वे गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीजों का इलाज कर रहे थे, आईसीयू (ICU) में ड्यूटियां संभाल रहे थे, और जटिल सर्जिकल प्रक्रियाओं में शामिल थे। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा पर अब तक का सबसे बड़ा आंतरिक आघात है।

जांच में यह भयावह तथ्य सामने आया है कि इनमें से कई फर्जी डॉक्टर पिछले 3 से 4 वर्षों से विभिन्न क्लीनिकों और अस्पतालों में बेखौफ होकर मरीजों का इलाज कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने न जाने कितने हजार निर्दोष नागरिकों के स्वास्थ्य को स्थाई रूप से बिगाड़ा होगा या उनकी असामयिक मृत्यु का कारण बने होंगे, जिसका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।

जून 2026 का यह सप्ताह जहां एक तरफ भारत के आर्थिक और अवसंरचनात्मक सुशासन (जैसे राष्ट्रीय स्तर पर 7.7% की मजबूत वार्षिक जीडीपी वृद्धि दर, पश्चिमी हिमालय में जोजिला सुरंग का निर्माण, और तमिलनाडु में लता रजनीकांत द्वारा ‘मक्कल मेदै’ जैसी नागरिक-संचालित पहलों का उभार) को दर्शा रहा है, वहीं दूसरी तरफ चिकित्सा जैसे जीवन-रक्षक क्षेत्र में इस स्तर का संस्थागत भ्रष्टाचार यह कड़ा और कड़वा पाठ सिखाता है कि जब तक हमारे विधिक नियामक निकाय (Regulatory Bodies) पारदर्शी नहीं होंगे, तब तक देश का कोई भी विकास नागरिक सुरक्षा के बिना अधूरा रहेगा।

सुशासन का असली पैमाना केवल जीडीपी के आंकड़े नहीं हैं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि जब कोई नागरिक किसी अस्पताल में जाए, तो उसे यह पूरा विश्वास हो कि उसका इलाज करने वाला व्यक्ति वास्तव में एक योग्य डॉक्टर है, न कि कोई जाली कागजात के दम पर बैठा अपराधी।

राजस्थान में उजागर हुआ यह व्यापक मेडिकल पंजीकरण घोटाला देश की संपूर्ण चिकित्सा शिक्षा, प्रशासनिक सुरक्षा प्रणालियों और विधिक सुधरा ढांचे के लिए एक गंभीर और अंतिम अलार्म (Wake-up Call) है। SOG द्वारा 28 आरोपियों की त्वरित और कड़ी गिरफ्तारी एक अत्यंत सराहनीय और स्वागत योग्य प्रशासनिक कदम है, लेकिन इस संकट का स्थाई और कूटनीतिक समाधान केवल कुछ गिरफ्तारियों तक सीमित नहीं हो सकता।

भविष्य का रोडमैप यह मांग करता है कि सरकार तत्काल राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) और राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड (NBE) के केंद्रीय डिजिटल डेटाबेस को सीधे सभी राज्यों की मेडिकल काउंसिलों (SMCs) के साथ एक केंद्रीकृत ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से लिंक करे। इसके तहत, जैसे ही कोई छात्र FMGE परीक्षा पास करे, उसका डेटा स्वचालित रूप से राज्य कौंसिलों में परिलक्षित होना चाहिए, जिससे कागजी दस्तावेजों को जमा करने और उनमें जालसाजी करने की गुंजाइश ही पूरी तरह समाप्त (Human-free) हो जाए।

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