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SHANTI विधेयक: परमाणु सुधार या सुरक्षा से समझौता?

परमाणु द्वार पर निजी आहट

भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में दशकों से चली आ रही ‘सरकारी एकाधिकार’ की दीवारें अब ढहने वाली हैं। प्रस्तावित SHANTI (Strategic Harnessing of Atomic energy for National Transformation and Innovation) विधेयक के माध्यम से सरकार देश के सबसे संवेदनशील और रणनीतिक क्षेत्र को निजी खिलाड़ियों और विदेशी निवेश के लिए खोलने जा रही है।

आज़ादी के बाद से, परमाणु ऊर्जा पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण (NPCIL के माध्यम से) में रही है। लेकिन 2047 तक ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों ने सरकार को अपनी ऊर्जा नीति पर फिर से विचार करने को मजबूर किया है। सवाल यह है: क्या यह सुधार भारत को ऊर्जा संपन्न बनाने की दिशा में एक ‘शांतिपूर्ण’ और दूरदर्शी कदम है, या यह परमाणु सुरक्षा और जवाबदेही के साथ एक ‘असहज समझौता’ है?

परमाणु क्षेत्र को निजी क्षेत्र के लिए खोलना एक साहसिक कदम है, लेकिन यह कई गहरे प्रश्न खड़े करता है, विशेष रूप से जवाबदेही और दायित्व के मुद्दे पर। अब तक, यदि कोई परमाणु दुर्घटना होती, तो उसकी पूरी जिम्मेदारी भारत सरकार की होती थी। लेकिन निजी कंपनियों के आने से यह रेखा धुंधली हो सकती है। ‘सिविल लायबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज एक्ट’ (CLND) में संभावित संशोधनों को लेकर चिंताएँ हैं। यदि निजी ऑपरेटरों के लिए दायित्व की सीमा कम की जाती है, तो क्या यह बड़ी कंपनियों को लाभ पहुँचाने के लिए आम नागरिकों की सुरक्षा को दाँव पर लगाने जैसा नहीं होगा?

निजी क्षेत्र का प्राथमिक उद्देश्य ‘मुनाफ़ा’ होता है, जबकि परमाणु ऊर्जा के प्रबंधन में ‘सुरक्षा’ (Safety First) का सिद्धांत सर्वोपरि होना चाहिए। परमाणु संयंत्रों का रखरखाव अत्यंत महंगा और तकनीकी रूप से जटिल होता है। क्या निजी कंपनियाँ लागत कम करने के चक्कर में सुरक्षा मानकों में ढील दे सकती हैं?

परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) को अब और अधिक शक्तिशाली और स्वतंत्र होना होगा। यदि नियामक संस्था सरकार के प्रभाव में रहती है और निजी दिग्गजों के साथ ‘साँठगाँठ’ करती है, तो भारत को भविष्य में किसी बड़ी दुर्घटना का सामना करना पड़ सकता है। SHANTI विधेयक को यह सुनिश्चित करना होगा कि सुरक्षा ऑडिट केवल कागज़ी कार्यवाही न बनकर रह जाए।

भारत ने 2047 तक परमाणु ऊर्जा से 100 गीगावाट (GW) बिजली पैदा करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। वर्तमान में हम 8 GW से भी कम पर हैं। इस विशाल खाई को पाटने के लिए निजी भागीदारी को एक ‘गेम-चेंजर’ माना जा रहा है। परमाणु संयंत्र बनाने में भारी पूंजी (अरबों डॉलर) लगती है और इन्हें पूरा होने में दशकों लग जाते हैं। सरकारी बजट की अपनी सीमाएँ हैं। निजी क्षेत्र जैसे कि टाटा, रिलायंस या अडानी के पास बड़ी पूंजी और परियोजनाओं को समय पर पूरा करने का अनुभव है। निजी भागीदारी से धन की कमी दूर होगी और परियोजनाओं की गति बढ़ेगी।

परमाणु भविष्य अब केवल विशाल संयंत्रों का नहीं, बल्कि स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMRs) का है। ये छोटे, सुरक्षित और कारखानों में निर्मित होने वाले रिएक्टर हैं। निजी कंपनियाँ इन तकनीकों के विकास में अधिक चपलता दिखा सकती हैं, जो विशेष रूप से औद्योगिक क्षेत्रों की ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा कर सकती हैं।

जब निजी क्षेत्र परमाणु क्षेत्र में उतरेगा, तो वह अपने साथ एक पूरा ‘सप्लाई चेन’ लाएगा। घरेलू कंपनियाँ उच्च-गुणवत्ता वाले परमाणु उपकरणों का निर्माण करना शुरू करेंगी, जिससे न केवल ऊर्जा मिलेगी बल्कि ‘मेक इन इंडिया’ के तहत रोज़गार के लाखों अवसर भी पैदा होंगे।

SHANTI विधेयक में 49% तक विदेशी निवेश (FDI) की अनुमति देने का प्रस्ताव है। यह परमाणु ऊर्जा के इतिहास में एक क्रांतिकारी बदलाव है, लेकिन यह रणनीतिक स्वायत्तता और प्रौद्योगिकी संप्रभुता पर सवाल खड़ा करता है। भारत को अत्याधुनिक परमाणु तकनीक (जैसे कि संवर्धित रिएक्टर और परमाणु ईंधन चक्र) की ज़रूरत है। 49% विदेशी निवेश का उद्देश्य वैश्विक दिग्गज कंपनियों (जैसे वेस्टिंगहाउस या ईडीएफ) को भारत में लाना है। लेकिन क्या विदेशी कंपनियों का नियंत्रण भारतीय ऊर्जा नीति को उनके देशों के हितों की ओर नहीं मोड़ देगा?

भारत ने हमेशा ‘स्वदेशी’ तकनीक (जैसे भारी जल रिएक्टर) पर गर्व किया है। विदेशी कंपनियों के प्रवेश से डर है कि हम फिर से विदेशी ‘प्रौद्योगिकी निर्भरता’ के दौर में न लौट जाएँ। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि विदेशी निवेश के साथ ‘प्रौद्योगिकी हस्तांतरण’ की कड़ी शर्तें जुड़ी हों, ताकि भविष्य में हम आत्मनिर्भर बने रहें।

परमाणु संयंत्रों का डेटा और उनकी रणनीतिक स्थिति देश की सुरक्षा का हिस्सा होती है। विदेशी कंपनियों और उनके कर्मचारियों की संयंत्रों तक पहुँच संवेदनशील जानकारी के रिसाव का जोखिम पैदा करती है। SHANTI विधेयक को ‘रणनीतिक वीटो’ जैसे प्रावधान रखने होंगे, जहाँ अंतिम नियंत्रण भारतीय हाथों में ही रहे।

परमाणु ऊर्जा के विस्तार का सबसे बड़ा मानवीय पक्ष भूमि अधिग्रहण और स्थानीय समुदायों का डर है। निजी कंपनियाँ जब परमाणु पार्क बनाएंगी, तो बड़े पैमाने पर ज़मीन की ज़रूरत होगी। क्या निजी क्षेत्र किसानों और आदिवासियों को वह सम्मान और मुआवजा दे पाएगा जिसकी वे अपेक्षा करते हैं? जैतापुर और कुडनकुलम जैसे विरोध प्रदर्शनों ने दिखाया है कि परमाणु ऊर्जा को लेकर जनता के मन में ‘डर’ और ‘अविश्वास’ है। रेडियोधर्मी कचरे का निपटान हज़ारों सालों तक एक समस्या बनी रहती है। क्या निजी कंपनियाँ इस दीर्घकालिक पर्यावरणीय जिम्मेदारी को ईमानदारी से निभाएंगी, या मुनाफा कमाने के बाद इस समस्या को भविष्य की पीढ़ियों के लिए छोड़ देंगी?

SHANTI विधेयक को एक सफल सुधार बनाने के लिए सरकार को ‘हड़बड़ी’ के बजाय ‘सतर्कता’ के साथ आगे बढ़ना होगा। परमाणु नियामक को पूरी तरह से स्वायत्त बनाया जाए, जिसका बजट और नियुक्तियाँ सीधे संसद या किसी स्वतंत्र बोर्ड के अधीन हों। दायित्व के प्रावधानों में कोई ढील नहीं दी जानी चाहिए। ऑपरेटर और सप्लायर दोनों को किसी भी दुर्घटना के लिए जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।

परमाणु ऊर्जा के लाभों (जैसे सस्ती बिजली और रोज़गार) में स्थानीय समुदाय का हिस्सा सुनिश्चित किया जाए, ताकि सामाजिक स्वीकार्यता बढ़े। विदेशी निवेश की अनुमति देते समय यह सुनिश्चित किया जाए कि मुख्य नियंत्रण और रणनीतिक डेटा केवल भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के पास रहे।

SHANTI विधेयक भारत की ऊर्जा भूख को शांत करने के लिए एक आवश्यक ‘साहसी कदम’ हो सकता है। निजी भागीदारी और विदेशी निवेश के बिना 100 GW का लक्ष्य महज़ एक सपना ही रहेगा। लेकिन, परमाणु ऊर्जा कोई सामान्य व्यापार नहीं है; इसमें हुई एक छोटी सी चूक भी सदियों तक घाव दे सकती है।

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