52वें जी7 शिखर सम्मेलन (G7 Summit) में भारत की रणनीतिक पैठ
फ्रांस के एवियन-लेस-बैंस में पीएम मोदी की वैश्विक कूटनीति, एआई गवर्नेंस और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के साथ होने वाली द्विपक्षीय वार्ता

16 June 2026 को वैश्विक भू-राजनीति (Geopolitics), अंतर्राष्ट्रीय अर्थशास्त्र और कूटनीतिक संप्रभुता के शिखर पटल से एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी सुर्खी सामने आई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फ्रांस के ऐतिहासिक शहर एवियन-लेस-बैंस (Evian-les-Bains) में आयोजित हो रहे 52वें जी7 शिखर सम्मेलन (52nd G7 Summit) में भाग लेने के लिए फ्रांस पहुँच चुके हैं। पीएम मोदी इस प्रतिष्ठित वैश्विक मंच पर फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन (Emmanuel Macron) के विशेष आमंत्रण पर एक प्रमुख ‘आउटरीच पार्टनर’ के रूप में शामिल हो रहे हैं, जो समकालीन विश्व व्यवस्था में भारत की केंद्रीय और कड़े कूटनीतिक प्रभाव को रेखांकित करता है।
एवियन-लेस-बैंस में एकत्रित हुए वैश्विक नेताओं के बीच चर्चा के केंद्र में चार सबसे कड़े और कूटनीतिक विषय शामिल हैं वैश्विक मुद्रास्फीति, आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) के टूटने के खतरों और बदलती वित्तीय नीतियों के बीच वैश्विक आर्थिक स्थिरता को बहाल करना।
यूरोप और मध्य-पूर्व (Middle East) में जारी कड़े संघर्षों के बीच नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था (Rule-based International Order) को अक्षुण्ण रखना। एआई और उन्नत तकनीकों के सुरक्षित, नैतिक, पारदर्शी और मानव-केंद्रित उपयोग के लिए एक वैश्विक विधिक और नियामक ढांचा (Regulatory Framework) तैयार करना। जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई को तेज करना और नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) के क्षेत्र में वैश्विक निवेश को बढ़ाना।
शिखर सम्मेलन के व्यापक वैश्विक एजेंडे के इतर, पूरी दुनिया और अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान बुधवार (17 June) को होने वाली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प (Donald Trump) के बीच निर्धारित उच्च-स्तरीय द्विपक्षीय बैठक (Bilateral Meeting) पर केंद्रित हो गया है। ट्रम्प के दोबारा अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद दोनों नेताओं के बीच होने वाली यह आमने-सामने की मुलाकात रणनीतिक रूप से अत्यधिक कड़क होने वाली है:
दोनों नेता दोनों देशों के बीच व्यापारिक असंतुलन को दूर करने, अमेरिकी उत्पादों पर भारतीय शुल्कों और भारतीय निर्यात पर अमेरिकी कड़े प्रतिबंधों को तार्किक बनाने पर कूटनीतिक चर्चा करेंगे। भारतीय तकनीकी पेशेवरों और छात्रों के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण एच-1बी (H-1B) और अन्य विधिक वीज़ा श्रेणियों की प्रक्रियाओं को सुगम बनाने की मांग भारत द्वारा कड़ाई से उठाई जाएगी।अमेरिका से कच्चे तेल और एलएनजी (LNG) के आयात को बढ़ाने, सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन को अभेद्य बनाने और ‘क्वाड’ (QUAD) फ्रेमवर्क के तहत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा ग्रिड को कड़ा करने पर दोनों देशों के बीच एक महत्वपूर्ण सहमति बनने की उम्मीद है।
जून 2026 का यह सप्ताह जहां एक तरफ भारत के आंतरिक सुशासन और आर्थिक सुदृढ़ता को दर्शा रहा है जैसे सांख्यिकी मंत्रालय (MoSPI) के हालिया आंकड़ों में देश की अर्थव्यवस्था 7.7% की मजबूत और कड़ी वार्षिक जीडीपी विकास दर के साथ आगे बढ़ रही है, तमिलनाडु अपनी वित्तीय स्थिति पर श्वेत पत्र जारी कर राजकोषीय अनुशासन की ओर कदम बढ़ा रहा है, और ऊर्जा के मोर्चे पर 100% इथेनॉल (E100) को विधिक मंजूरी दी गई है वहीं वैश्विक पटल पर प्रधानमंत्री मोदी को हाल ही में मिले स्लोवाकिया के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘ऑर्डर ऑफ द व्हाइट डबल क्रॉस’ के ठीक बाद जी7 में उनकी यह कड़क मौजूदगी यह सिद्ध करती है कि भारत आज दुनिया के लिए एक अपरिहार्य आर्थिक और कूटनीतिक नेविगेटर बन चुका है।
“जी7 जैसे विशिष्ट क्लब में भारत की निरंतर और प्रभावशाली भागीदारी यह साबित करती है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था, तकनीकी नियमन और भू-राजनीतिक स्थिरता से जुड़ा कोई भी बड़ा अंतरराष्ट्रीय फैसला अब नई दिल्ली (भारत) की सहमति और सक्रिय भागीदारी के बिना अधूरा है।”
52वें जी7 शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भागीदारी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के साथ होने वाली यह कूटनीतिक वार्ता भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) की एक त्रुटिहीन प्रस्तुति है। भारत यहाँ केवल एक पर्यवेक्षक के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक चुनौतियों का व्यावहारिक और वैज्ञानिक समाधान देने वाले एक ‘सॉल्यूशन प्रदाता’ (Solution Provider) के रूप में खड़ा है।
चाहे बात एआई के नैतिक नियमन की हो या सतत विकास की, भारत का कड़ा और संतुलित दृष्टिकोण विश्व कल्याण के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। बुधवार को होने वाली मोदी-ट्रम्प वार्ता से निकलने वाले नीतिगत निष्कर्ष न केवल भारत-अमेरिका के रणनीतिक संबंधों का नया भविष्य तय करेंगे, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र और संपूर्ण वैश्विक व्यापारिक व्यवस्था को एक नई, सुरक्षित और कूटनीतिक स्थिरता प्रदान करेंगे।



