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करूर भगदड़ हादसा: मद्रास हाईकोर्ट का तमिलनाडु सरकार को ऐतिहासिक झटका; पीड़ितों के परिवारों को अनुकंपा पर सरकारी नौकरी देने का आदेश रद्द

प्रतियोगी परीक्षाओं (TNPSC) की तैयारी कर रहे युवाओं के अधिकार

भारत के संवैधानिक न्यायशास्त्र, लोक नियोजन (Public Employment) में समानता के सिद्धांत और प्रशासनिक अधिकारों की सीमाओं पर एक अत्यंत दूरगामी फैसला सुनाते हुए मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने तमिलनाडु सरकार के उस आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया है, जिसके तहत सितंबर 2025 में हुए करूर भगदड़ हादसे (Karur Stampede) के 41 मृतक पीड़ितों के परिजनों को अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरियां प्रदान की गई थीं।

न्यायमूर्ति सी.वी. कार्तिकेयन और न्यायमूर्ति आर. शक्तिवेल की खंडपीठ ने जनहित याचिकाओं (थिरन थिरुमुरुगन बनाम मुख्य सचिव व अन्य) पर अपना अंतिम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि सार्वजनिक रोजगार (Government Jobs) राज्य सरकार की ओर से दी जाने वाली खैरात या सांत्वना राशि नहीं है। अदालत ने कहा कि यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार) और अनुच्छेद 16 (लोक नियोजन में अवसर की समता) का सीधा उल्लंघन करता है और इससे भविष्य में अनुचित मांगों के “बाढ़ के दरवाजे” (Floodgates) खुल जाएंगे।

यह पूरा मामला 27 सितंबर 2025 को तमिलनाडु के करूर जिले में आयोजित तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) की एक विशाल राजनीतिक रैली से जुड़ा है। पार्टी के प्रमुख और अभिनेता से राजनेता बने सी. जोसेफ विजय की इस जनसभा के दौरान भीषण भगदड़ मच गई थी, जिसमें 41 निर्दोष लोगों की जान चली गई थी और 60 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।

अप्रैल 2026 के विधानसभा चुनावों के बाद सत्ता में आई टीवीके (TVK) नीत सरकार ने पीड़ित परिवारों के पुनर्वास पैकेज के तहत प्रत्येक मृतक के परिवार के एक पात्र सदस्य को सरकारी नौकरी देने की घोषणा की थी। 10 जुलाई 2026 को मुख्यमंत्री विजय ने करूर का दौरा कर 32 पीड़ित परिवारों के सदस्यों को अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति पत्र वितरित किए थे। हालांकि, मद्रास उच्च न्यायालय ने उसी दिन एक अंतरिम व्यवस्था के तहत स्पष्ट कर दिया था कि ये नियुक्तियां पूरी तरह से अस्थायी रहेंगी और न्यायालय के अंतिम फैसले के अधीन होंगी। अदालत ने शर्त रखी थी कि लाभार्थियों को पहला वेतन मिलने से पहले इस विधिक औचित्य पर फैसला सुनाया जाएगा। 27 जुलाई 2026 को दिए गए अंतिम निर्णय में उच्च न्यायालय ने इन नियुक्तियों को असंवैधानिक घोषित कर दिया।

मद्रास उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार द्वारा अपनी कार्यकारी शक्तियों का हवाला देकर दिए गए दलीलों को खारिज करते हुए 6 अत्यंत कड़े विधिक सिद्धांत स्थापित किए उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने सार्वजनिक पदों के महत्व पर बल देते हुए कहा: “पब्लिक एम्प्लॉयमेंट (लोक नियोजन) कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे राज्य अपनी इच्छा से सांत्वना के रूप में फेंक दे। इसे संवैधानिक ढांचे के तहत योग्यता से अर्जित किया जाना चाहिए। इसका मूल्य और गरिमा समझा जाना आवश्यक है।”

अदालत ने राज्य सरकार के इस तर्क को खारिज कर दिया कि ये केवल “साधारण नौकरियां” थीं। पीठ ने स्पष्ट किया कि सरकार में कोई भी पद “साधारण” नहीं होता, क्योंकि प्रत्येक पद परिवार को स्थायी आजीविका और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करता है।

अदालत ने पाया कि तमिलनाडु के लगभग हर सरकारी विभाग में ऐसे हजारों योग्य नागरिक और आश्रित वर्षों से कतार में खड़े हैं, जिनके परिजनों की सरकारी सेवा के दौरान मृत्यु (Service in Harness) हुई थी। पीठ ने कहा कि जब अनुकंपा नियुक्तियों की एक तय कानूनी नियमावली और लंबी प्रतीक्षा सूची पहले से मौजूद है, तो उसे पूरी तरह दरकिनार करके एक आम हादसे के पीड़ितों को नौकरियां देना अनुकंपा प्रतीक्षा सूची में खड़े अन्य नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर कुठाराघात है।

न्यायाधीशों ने सचेत किया कि यदि किसी राजनीतिक दल की रैली में हुई भगदड़ के बाद सरकार इस तरह नौकरियां बांटने लगेगी, तो भविष्य में होने वाली हर अप्रिय घटना के बाद इसी तरह की मांगें उठेंगी। अदालत ने उदाहरण दिया शिवकाशी और राज्य की अन्य पटाखा इकाइयों (Firecracker Factories) में होने वाले लगातार विस्फोट। सरकारी बसों या राज्य परिवहन निगम के हादसों (Road/Bus Accidents) में जान गंवाने वाले यात्री। विभिन्न औद्योगिक त्रासदियां और प्राकृतिक आपदाएं।

अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में राज्य की नाकामी या लापरवाही के बावजूद केवल अनुग्रह राशि (Ex-gratia) दी जाती है, न कि सरकारी नौकरियां। यदि इस मामले में छूट दी गई, तो सरकार को सभी हादसों के पीड़ितों को नौकरियां देनी पड़ेंगी, जिससे पूरी प्रशासनिक व्यवस्था चरमरा जाएगी।

राज्य सरकार के महाधिवक्ता (Advocate General) ने तर्क दिया था कि सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 162 के तहत अपनी विशेष कार्यकारी शक्तियों (Executive Powers) का प्रयोग करते हुए एक सहानुभूतिपूर्ण नीतिगत फैसला (Policy Decision) लिया है।

इस पर अदालत ने ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए कहा:

“यदि राज्य की कार्यकारी कार्रवाई को बिना किसी अंकुश के खुला छोड़ दिया जाए और निरंकुश छूट दे दी जाए, तो कानून के शासन की जगह अराजकता का साम्राज्य स्थापित हो जाएगा।”

अदालत ने दोहराया कि अनुच्छेद 162 के तहत कार्यपालिका का कोई भी विशेषाधिकार संविधान के भाग-3 (मौलिक अधिकार) की सीमाओं का अतिक्रमण नहीं कर सकता।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने पूर्ववर्ती घटनाओं (जैसे तूथुकुडी स्टरलाइट गोलीकांड) का हवाला दिया, जहाँ पीड़ितों के परिजनों को सरकारी नौकरियां दी गई थीं। मद्रास हाईकोर्ट ने इस अंतर को रेखांकित करते हुए कहा कि तूथुकुडी घटना राज्य पुलिस द्वारा की गई अत्यधिक बल प्रयोग (Police Excesses) की श्रेणी में आती थी, जहाँ राज्य तंत्र सीधे तौर पर जिम्मेदार था। इसके विपरीत, राजनीतिक दल की रैली में हुई भीड़ भगदड़ एक अलग कानूनी पायदान पर खड़ी है, जिसे राज्य की दंडात्मक पुलिस हिंसा के बराबर नहीं माना जा सकता।

पीठ ने इस बात का भी संज्ञान लिया कि तमिलनाडु लोक सेवा आयोग (TNPSC) और अन्य राज्य भर्ती बोर्डों के माध्यम से लाखों बेरोजगार युवा वर्षों तक लगन से पढ़ाई करके पारदर्शी परीक्षाओं के माध्यम से सरकारी सेवा में आने का सपना देखते हैं। बिना किसी विज्ञापन, परीक्षा या पारदर्शी चयन प्रक्रिया के सीधे नौकरियां देना उन युवाओं के साथ अन्याय है।

अदालत ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया कि न्यायपालिका पीड़ित परिवारों के प्रति पूरी तरह से संवेदनशील और सहानुभूतिपूर्ण है। न्यायालय ने कहा कि राज्य सरकार इन परिवारों की आर्थिक मदद करने से प्रतिबंधित नहीं है, लेकिन पुनर्वास का तरीका संवैधानिक रूप से सही होना चाहिए।

हाईकोर्ट ने सरकार को निम्नलिखित टिकाऊ और संवैधानिक रूप से वैध उपाय अपनाने का सुझाव दिया सरकार पीड़ित परिवारों के पात्र युवाओं के तकनीकी पाठ्यक्रमों, कौशल विकास (Skill Development) और वोकेशनल ट्रेनिंग का पूरा खर्च स्वयं वहन करे।सरकार परिवारों को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाने के लिए स्वरोजगार योजनाएं और बिना ब्याज के व्यावसायिक ऋण प्रदान करे।

“यदि सरकार कौशल विकास और उद्यमिता को बढ़ावा देती है, तो वह हर परिवार में आत्मनिर्भर लीडर्स और उद्यमी तैयार करेगी, जो भविष्य में दूसरों को रोजगार प्रदान करने में सक्षम होंगे।” — मद्रास हाईकोर्ट

करूर भगदड़ हादसे की आपराधिक जांच वर्तमान में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) द्वारा की जा रही है, जिसकी सीधी निगरानी भारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) कर रहा है। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि जांच लंबित रहने के दौरान राज्य सरकार द्वारा इस प्रकार नौकरियां और वित्तीय अनुग्रह देना मामले के महत्वपूर्ण गवाहों और सबूतों को प्रभावित कर सकता है। उच्च न्यायालय ने कहा कि चूंकि मामले की जांच देश की शीर्ष अदालत की निगरानी में सीबीआई द्वारा की जा रही है, इसलिए हाईकोर्ट इस मामले के आपराधिक गुण-दोषों (Merits of the case) पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहा है। हालांकि, भर्ती प्रक्रिया के संवैधानिक उल्लंघन के कारण इस सरकारी आदेश को रद्द किया जाना अनिवार्य था।

यह फैसला तमिलनाडु के राजनीतिक पटल पर दूरगामी प्रभाव डालेगा मुख्यमंत्री जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली नई सरकार के लिए यह फैसला एक बड़ा झटका माना जा रहा है। 10 जुलाई को करूर में आयोजित भावुक समारोह में मुख्यमंत्री विजय ने स्वयं पीड़ितों को गले लगाकर और सांत्वना देकर नियुक्ति पत्र बांटे थे।

आधिकारिक सूत्रों के संकेत के अनुसार, तमिलनाडु सरकार मद्रास हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ जल्द ही सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर करने पर विचार कर रही है। तमिलनाडु के विभिन्न छात्र संगठनों और टीएनपीएससी (TNPSC) अभ्यर्थियों ने इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे संविधान की जीत और पारदर्शी भर्ती प्रणाली के लिए आवश्यक कदम बताया है।

मद्रास उच्च न्यायालय का यह निर्णय भारत के लोक प्रशासन और संवैधानिक कानून में एक मील का पत्थर है। यह स्पष्ट संदेश देता है कि राज्य सरकार की मानवीय संवेदनाएं, राजनीतिक प्रतिबद्धताएं या तात्कालिक राहत उपाय देश के मौलिक अधिकारों विशेष रूप से अनुच्छेद 14 और 16 को ओवरराइड नहीं कर सकते।

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