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शारदा विश्वविद्यालय में मीडिया परिप्रेक्ष्य से जीएसटी सुधारों पर ICSSR प्रायोजित राष्ट्रीय सम्मेलन संपन्न

विकसित भारत 2047, नीति संचार और नागरिक सशक्तिकरण पर हुआ राष्ट्रीय मंथन

भारत के आर्थिक सुधारों, कर संरचना और जनसंचार के अंतर्संबंधों पर केंद्रित एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक विमर्श के अंतर्गत शारदा विश्वविद्यालय के शारदा स्कूल ऑफ मीडिया, फिल्म एंड एंटरटेनमेंट (SSMFE) ने 17 और 18 अगस्त 2026 को दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का सफल आयोजन किया। इस सम्मेलन का मुख्य विषय “मीडिया परिप्रेक्ष्य में जीएसटी सुधार: विकसित भारत के लिए नागरिक सशक्तिकरण एवं जन-जागरूकता का संवर्धन” (GST Reforms in Media Perspective: Enhancing Citizen Empowerment and Public Awareness for Viksit Bharat) रहा।
इस दो दिवसीय प्रतिष्ठित सम्मेलन को भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR), उत्तरी क्षेत्रीय केंद्र, नई दिल्ली द्वारा प्रायोजित किया गया। सम्मेलन में भारत सरकार के वरिष्ठ नीति निर्धारकों, कर अधिकारियों, देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए प्रख्यात शिक्षाविदों, शोधार्थियों तथा राष्ट्रीय मीडिया घरानों के वरिष्ठ पत्रकारों ने प्रतिभाग किया।
सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित भारत सरकार के जीएसटी एवं केंद्रीय उत्पाद शुल्क आयुक्त डॉ. यशोवर्धन पाठक ने वस्तु एवं सेवा कर (GST) के क्रियान्वयन, डिजिटलीकरण और जनसंचार की भूमिका पर प्रकाश डाला डॉ. पाठक ने कहा कि ‘एक राष्ट्र, एक कर’ (One Nation, One Tax) की अवधारणा ने देश के अप्रत्यक्ष कर ढांचे को सरल, पारदर्शी और एकीकृत बनाया है। जीएसटी ने अंतरराज्यीय व्यापार बाधाओं को दूर कर भारत को एक साझा राष्ट्रीय बाजार में बदल दिया है।
उन्होंने रेखांकित किया कि ई-वे बिल (E-Way Bill), ई-इनवॉइसिंग और स्वचालित टैक्स रिटर्न प्रक्रियाओं ने कर चोरी को रोकने और राजस्व संग्रह को स्थिर करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। डॉ. पाठक ने इस बात पर विशेष बल दिया कि कर नियमों की तकनीकी शब्दावली कई बार आम व्यापारियों और उपभोक्ताओं के लिए जटिल हो जाती है। ऐसे में मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह इन सुधारों को सरल, सुगम और तथ्यपरक भाषा में जनता तक पहुँचाए ताकि स्वैच्छिक कर अनुपालन (Voluntary Tax Compliance) को बढ़ावा मिल सके।
इस सत्र में वक्ताओं ने ‘विकसित भारत 2047’ के विज़न के तहत आर्थिक विकास और वित्तीय समावेशन को गति देने में आर्थिक पत्रकारिता के योगदान का विश्लेषण किया। विशेषज्ञों ने कहा कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में आर्थिक नीतियों का पारदर्शी संप्रेषण सबसे बड़ा उत्प्रेरक है।
डिजिटल इंडिया और ई-गवर्नेंस पहलों के माध्यम से कर प्रशासन को कैसे जवाबदेह और नागरिक-केंद्रित बनाया जाए, इस पर विस्तार से चर्चा हुई। छोटे व्यापारियों (MSMEs) और सूक्ष्म उद्यमियों तक अनुपालन प्रक्रियाओं की जानकारी पहुंचाने में स्थानीय और डिजिटल मीडिया की महत्ता को रेखांकित किया गया। इस सत्र में इस बात पर विचार किया गया कि विकास संचार के जरिए समाज के अंतिम पायदान पर खड़े नागरिकों और महिला उद्यमियों को वित्तीय साक्षरता से कैसे जोड़ा जाए ताकि आर्थिक सुधारों का लाभ सभी वर्गों तक समान रूप से पहुंचे।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), बिग डेटा, सोशल मीडिया एल्गोरिदम और डीपफेक के दौर में वित्तीय समाचारों की सत्यता और तथ्य-जांच (Fact-checking) की चुनौतियों पर तकनीकी मंथन हुआ। वक्ताओं ने आर्थिक मामलों में भ्रामक सूचनाओं (Misinformation) से निपटने के लिए मीडिया साक्षरता को अनिवार्य बताया।
प्रो. (डॉ.) दुर्गेश त्रिपाठी, प्रो. दुष्यंत कुमार राय और प्रो. सचिन भारती ने अपने वक्तव्यों में अकादमिक पाठ्यक्रमों में आर्थिक पत्रकारिता और नीति संचार को अधिक व्यावहारिक बनाने की वकालत की। सुश्री शालिनी कपूर तिवारी, सुश्री आयुषी मोदी, श्री अनुज मिश्रा और श्री आनंद तिवारी ने न्यूजरूम के व्यावहारिक अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि कैसे जटिल बजट, टैक्स स्लैब और नीतिगत घोषणाओं को विजुअल स्टोरीटेलिंग, इन्फोग्राफिक्स और पॉडकास्ट के माध्यम से आम दर्शकों के लिए रोचक और समझने योग्य बनाया जा सकता है।
दो दिवसीय गहन विचार-विमर्श के पश्चात सम्मेलन ने नीति संचार और आर्थिक साक्षरता के लिए निम्नलिखित प्रमुख सिफारिशें प्रस्तुत कीं सरकार, अकादमिक जगत और मीडिया संस्थानों के बीच एक नियमित संवाद मंच स्थापित होना चाहिए ताकि नई आर्थिक नीतियों के क्रियान्वयन से पूर्व उनके संचार का प्रभावी रोडमैप तैयार किया जा सके।
वित्तीय मामलों में क्लिकबैट और सनसनीखेज रिपोर्टिंग से बचते हुए डेटा-आधारित और सत्यापित सूचनाओं के प्रसारण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। जीएसटी और वित्तीय नियमों की जानकारी केवल अंग्रेजी या मानक हिंदी तक सीमित न रहकर क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों में भी व्यापक रूप से प्रसारित की जानी चाहिए। वित्तीय जागरूकता अभियानों में लघु वीडियो, पॉडकास्ट और चैटबॉट्स जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर युवा पीढ़ी को कर प्रणाली के प्रति जागरूक बनाया जाए।
शारदा विश्वविद्यालय में आयोजित यह ICSSR प्रायोजित राष्ट्रीय सम्मेलन शैक्षणिक अनुसंधान और लोकनीति के व्यावहारिक क्रियान्वयन के बीच एक सार्थक सेतु साबित हुआ है। इस सम्मेलन ने यह सिद्ध किया है कि भारत को ‘विकसित भारत 2047’ बनाने की यात्रा में केवल आर्थिक सुधार पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि उन सुधारों के प्रति जन-जागरूकता, नागरिक सशक्तिकरण और पारदर्शी मीडिया संचार की समान रूप से अनिवार्य भूमिका है।

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