
देश की आर्थिक राजधानी के सबसे प्रतिष्ठित और पॉश रिहायशी इलाके मालाबार हिल (Malabar Hill) में स्थित बारहवीं शताब्दी के ऐतिहासिक, धार्मिक और पुरातात्विक महत्व वाले बाणगंगा टैंक (Banganga Tank) में एक भीषण पर्यावरणीय एवं पारिस्थितिकीय आपदा सामने आई है। वार्षिक पितृपक्ष (Pitru Paksha) के दौरान बड़े पैमाने पर किए गए धार्मिक अनुष्ठानों, तर्पण और पिंडदान के चलते इस प्राचीन जल कुंड में पानी की गुणवत्ता इस कदर विषाक्त हो गई कि पिछले 48 घंटों के भीतर हजारों की संख्या में मछलियां तड़पकर मर गईं।
मृत मछलियों के विशाल सफेद अंबार पानी की सतह पर तैरने के कारण पूरे वालकेश्वर और मालाबार हिल क्षेत्र में असहनीय सड़ांध और तीखी दुर्गंध फैल गई है। स्थानीय नागरिकों, पर्यावरणविदों और विरासत प्रेमियों में इस ग्रेड-1 हेरिटेज जल निकाय (Grade-I Heritage Water Body) की दुर्दशा और प्रशासनिक अनदेखी को लेकर भारी आक्रोश फैल गया है। स्थानीय निवासियों, पुजारियों और जीव विज्ञानियों के अनुसार, पितृपक्ष पखवाड़ा 26 सितंबर 2026 से आरंभ हुआ था।
पूर्ववर्ती वर्षों में भी पितृपक्ष के 15-दिवसीय पखवाड़े के अंतिम दिनों विशेषकर ‘सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या’ के आसपास पानी में कुछ मछलियों के मरने की घटनाएं देखी जाती रही थीं। किंतु इस वर्ष यह त्रासदी अभूतपूर्व रूप से भयावह है; अनुष्ठान शुरू होने के मात्र 10 दिनों के भीतर ही टैंक का संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र (Aquatic Ecosystem) पूरी तरह ध्वस्त हो गया है।
बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) के डी-वार्ड, महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPCB) और इस ऐतिहासिक स्थल का प्रबंधन देखने वाले गौड़ सारस्वत ब्राह्मण (GSB) टेम्पल ट्रस्ट के बीच समन्वय की कमी ने इस धरोहर कुंड को ‘गैस चैंबर’ और ‘मत्स्य श्मशान’ में तब्दील कर दिया है।
बाणगंगा टैंक अरब सागर के बैकबे (Backbay) से बमुश्किल 100 मीटर की दूरी पर स्थित है। समुद्र के इतने करीब होने के बावजूद इसका जल पूरी तरह मीठा और पीने योग्य प्राकृतिक स्रोत से आता है। भूवैज्ञानिक दृष्टि से, मालाबार हिल की बेसाल्ट चट्टानों के नीचे मौजूद भूमिगत जलभृत (Aquifer) से मीठे पानी का एक सतत झरना इस कुंड के तल से फूटता है। टैंक के चारों ओर काले पत्थरों से बनी 47 सीढ़ियां, पौराणिक दीपस्तंभ (Deepstambhas) और प्राचीन मंदिर इसे भारत के सबसे मनमोहक जल-वास्तु नमूनों में से एक बनाते हैं।
हिंदू धर्मशास्त्रों में बाणगंगा को काशी और गया के समान ही पवित्र माना गया है। मान्यता है कि यहां तर्पण और पिंडदान करने से पूर्वजों (पितरों) की आत्मा को सीधे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी अटूट श्रद्धा के चलते प्रत्येक वर्ष भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर अश्विन अमावस्या तक चलने वाले पितृपक्ष में मुंबई, ठाणे, नवी मुंबई और पूरे महाराष्ट्र से प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु अपने पूर्वजों के उद्धार की कामना लेकर यहां पहुंचते हैं।
पिंडदान के पारंपरिक विधान में पके हुए चावल के बड़े-बड़े गोले (पिंड), जौ और उड़द का आटा, गाय का कच्चा दूध, तिल और शुद्ध देसी घी का उपयोग किया जाता है। जब प्रतिदिन सैकड़ों श्रद्धालु यह सामग्री कुंड के सीमित जल में प्रवाहित करते हैं, तो पानी में ऑर्गेनिक कार्बन लोड लाखों गुना बढ़ जाता है। पानी में मौजूद सूक्ष्मजीव (एरोबिक बैक्टीरिया) इस वसा और प्रोटीन को गलाने के लिए पानी में घुली हुई ऑक्सीजन का अंधाधुंध उपयोग करने लगते हैं।
परिणामस्वरूप, पानी का बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (BOD) सामान्य स्तर (3 mg/L) से उछलकर 60 mg/L से ऊपर चला गया, जबकि मछलियों के जीवित रहने के लिए आवश्यक न्यूनतम घुलित ऑक्सीजन (DO), जो कम से कम 4 से 5 mg/L होनी चाहिए, वह गिरकर 0.8 mg/L पर आ गई। ऑक्सीजन की इस भयानक कमी (हाइपोक्सिया) से मछलियों के गलफड़े (Gills) चोक हो गए और उनका दम घुट गया।
सितंबर के अंत में मानसून की विदाई के तुरंत बाद मुंबई में ‘अक्टूबर हीट’ (तेज गर्मी और तीखी धूप) का प्रकोप शुरू हो गया। पानी का तापमान बढ़ने से उसमें प्राकृतिक रूप से ऑक्सीजन सोखने की क्षमता कम हो गई और जैविक कचरे के सड़ने की रासायनिक दर दोगुनी हो गई। बाणगंगा के भूमिगत झरनों में गाद (Silt) और हाल ही में सीढ़ियों की मरम्मत के दौरान सीमेंट-रेत के मलबे से नीचे के प्राकृतिक रिसाव छिद्र आंशिक रूप से बंद हो गए थे, जिससे ताजा पानी पर्याप्त मात्रा में कुंड में प्रवेश नहीं कर सका। इस वर्ष पितृपक्ष के प्रारंभिक दिनों में ही छुट्टियों के चलते श्रद्धालुओं की संख्या पूर्व के वर्षों की तुलना में 40% अधिक दर्ज की गई।
बाणगंगा लेन और वालकेश्वर रोड की संकरी गलियों में रहने वाले परिवारों के लिए पिछले 48 घंटे किसी दुःस्वप्न जैसे रहे हैं। स्थानीय निवासी आनंद पेंडसे ने बताया:
“सड़ी हुई मछलियों की गंध इतनी तीव्र और विषाक्त है कि घर के भीतर एयर कंडीशनर चलाने या पंखे चलाने पर भी बदबू से सांस लेना असंभव हो गया है। हमारे घरों में छोटे बच्चे और बुजुर्ग लगातार उल्टियां कर रहे हैं। यह केवल बदबू नहीं है, यह हवा में फैल रहा संक्रमण है। हर साल प्रशासन को मालूम होता है कि पितृपक्ष में यही होगा, फिर भी कोई स्थायी कदम क्यों नहीं उठाया जाता?”
टैंक की सीढ़ियों पर बैठकर पिंडदान कराने वाले वयोवृद्ध पुरोहितों का कहना है कि वे स्वयं इस स्थिति से अत्यंत दुखी हैं। एक स्थानीय तीर्थ पुरोहित ने कहा कि जब श्रद्धालु अपने पूर्वजों की शांति के लिए पिंडदान करते हैं, और उनके सामने ही हजारों मूक जीवों की हत्या हो रही हो, तो यह कैसा धर्म है? उन्होंने कहा कि पुरोहित संघ ने कई बार प्रशासन से मांग की कि मुख्य कुंड में सीधे पिंड डालने पर रोक लगाई जाए और सीढ़ियों पर कृत्रिम धातु के टब रखे जाएं, लेकिन ट्रस्ट और बीएमसी ने समय रहते कोई ठोस व्यवस्था नहीं की।
हर साल पितृपक्ष से पूर्व एक संयुक्त आपदा प्रबंधन बैठक होनी चाहिए थी, जिसमें पानी में ऑक्सीजन बनाए रखने के लिए स्थायी पंप, फ्लोटिंग एरेटर और विसर्जन के लिए अलग कुंड की योजना बनाई जानी चाहिए थी। लेकिन इस वर्ष 26 सितंबर को अनुष्ठान शुरू होने तक टैंक के किनारे एक भी सूचना पट्ट (Signboard) या जागरूकता बोर्ड नहीं लगाया गया था। जब 3 अक्टूबर से मछलियां सतह पर आकर दम तोड़ने लगीं, तब स्थानीय लोगों द्वारा बार-बार शिकायत करने के बावजूद बीएमसी की सफाई नौकाएं 4 अक्टूबर की शाम को पहुंचीं। तब तक लाखों लीटर पानी जहरीले सूप में बदल चुका था।
बीएमसी के डी-वार्ड के 40 से अधिक सफाई कर्मचारियों ने बड़ी नायलॉन जालों की मदद से पानी की सतह से मृत मछलियों को निकालना शुरू किया है। सोमवार दोपहर तक लगभग 3.5 से 4 टन मृत मछलियों को बाहर निकाला जा चुका था, जिन्हें बंद कचरा वाहनों में भरकर देवनार डंपिंग ग्राउंड में वैज्ञानिक भस्मीकरण (Incineration) और गहरे दफन के लिए भेजा गया ताकि महामारी न फैले।
पानी में तत्काल ऑक्सीजन का स्तर बढ़ाने के लिए मुंबई फायर ब्रिगेड की गाड़ियों ने समुद्र किनारे से नहीं, बल्कि मीठे पानी के टैंकरों से पानी लेकर फव्वारों के रूप में हवा में उड़ाना शुरू किया है ताकि वायुमंडलीय ऑक्सीजन पानी में घुल सके। इसके अतिरिक्त, पानी की सतह को मथने के लिए 6 पोर्टेबल एरेटर मशीनें लगाई गई हैं। पानी की विषाक्तता कम करने के लिए विशेषज्ञ पर्यावरणविदों की देखरेख में पोटाशियम परमैंगनेट (लाल दवा) का हल्का घोल डाला जा रहा है।
जिस प्रकार गणेश विसर्जन के दौरान बीएमसी मुंबई भर में सैकड़ों कृत्रिम विसर्जन तालाब (Artificial Ponds) बनाती है, ठीक उसी तर्ज पर बाणगंगा की मुख्य सीढ़ियों के शीर्ष पर 20 बड़े कृत्रिम पोर्टेबल कुंड स्थापित किए जाने चाहिए। श्रद्धालुओं को संकल्प और पिंडदान कराने के बाद पिंड विसर्जन केवल उन्हीं कृत्रिम कुंडों में करने की अनुमति हो। मुख्य टैंक में किसी भी प्रकार का आटा, दूध, तेल या फूल डालना दंडात्मक अपराध घोषित किया जाए।
टैंक के चारों कोनों में हेरिटेज डिजाइन के अनुरूप सोलर संचालित फव्वारे और सब-मर्सिबल एरेटर्स स्थायी रूप से लगाए जाएं, जो वर्ष के 365 दिन पानी में ऑक्सीजन के स्तर को 6 mg/L से ऊपर बनाए रखें। राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (NIO) या आईआईटी बॉम्बे के विशेषज्ञों की देखरेख में टैंक की तलहटी से दशकों से जमी सड़ी हुई जैविक गाद को बिना पत्थरों को नुकसान पहुंचाए वैक्यूम सक्शन पंपों के जरिए बाहर निकाला जाए, ताकि प्राकृतिक मीठे पानी के झरने पूरी क्षमता से पुनर्जीवित हो सकें। स्थानीय निवासियों, हेरिटेज कार्यकर्ताओं, पुरोहितों और बीएमसी अधिकारियों की एक संयुक्त ‘बाणगंगा संरक्षण समिति’ का गठन हो, जिसके पास निगरानी और त्वरित निर्णय लेने के कानूनी अधिकार हों।
बाणगंगा की सीढ़ियों पर तैरती हजारों बेजान मछलियां केवल एक पर्यावरणीय दुर्घटना का शिकार नहीं हुई हैं, बल्कि वे हमारी उस संवेदनहीनता की बलि चढ़ी हैं जो धर्म के मूल मर्म को भुलाकर अंधानुकरण में बदल जाती है। सनातन संस्कृति में तो चींटी को आटा और मछली को दाना खिलाना पुण्य का कार्य माना गया है। ऋग्वेद और उपनिषदों में जल स्रोतों को ‘देवता’ मानकर उन्हें दूषित न करने की कठोर आज्ञा दी गई है।
लेकिन यह कैसी विडंबना है कि अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और तृप्ति की प्रार्थना करते हुए हमने उसी पावन कुंड में रहने वाले हजारों निर्दोष जलचरों का दम घोंट दिया? यदि भगवान श्री राम के बाण से प्रस्फुटित इस पावन बाणगंगा को हमें अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए बचाना है, तो हमें यह समझना होगा कि परंपरा और पारिस्थितिकी (Tradition and Ecology) एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। आस्था की सार्थकता जीवन का पोषण करने में है, जीवन छीनने में नहीं।
अब समय आ गया है कि शासन, प्रशासन, धार्मिक ट्रस्ट और प्रबुद्ध नागरिक जागें और बाणगंगा के ऐतिहासिक जल को प्रदूषण के इस नरक से निकालकर उसके उस प्राचीन, निर्मल और दिव्य स्वरूप को लौटाएं, जिसका गवाह सदियों से यह सह्याद्रि का तट और अरब सागर रहा है।



