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जंतर-मंतर अब नहीं रहा विरोध प्रदर्शनों का आधिकारिक मंच: दिल्ली पुलिस ने जारी किया ऐतिहासिक स्टैंडिंग ऑर्डर
पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार ने किया डिनोटिफाई; रामलीला मैदान, बुराड़ी और सीबीडी ग्राउंड बने राष्ट्रीय राजधानी के 3 नए धरना स्थल

भारत के लोकतांत्रिक इतिहास, जन-आंदोलनों और नागरिक विमर्श में पिछले तीन दशकों से असहमति व प्रतिरोध की राष्ट्रीय पहचान रहे जंतर-मंतर (Jantar Mantar) को लेकर दिल्ली पुलिस ने एक युगांतरकारी और प्रशासनिक रूप से दूरगामी निर्णय लिया है।
दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार (Anurag Kumar) द्वारा 11 अक्टूबर 2026 को हस्ताक्षरित एक औपचारिक स्टैंडिंग ऑर्डर (Standing Order) के अनुसार, लुटियंस दिल्ली स्थित जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शनों, धरनों, अनशनों और जनसभाओं के लिए ‘नामित स्थल’ (Designated Venue) की आधिकारिक सूची से तत्काल प्रभाव से डिनोटिफाई (Denotified) कर दिया गया है।
जारी किए गए नए स्टैंडिंग ऑर्डर के तहत अब राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCT) में किसी भी प्रकार के राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों, किसान-मजदूर यूनियनों और नागरिक समूहों के शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के लिए तीन नए वैकल्पिक स्थल (Alternative Designated Venues) निर्धारित किए गए हैं रामलीला मैदान (Ramlila Ground, मध्य दिल्ली / अजमेरी गेट – तुर्कमान गेट); बुराड़ी ग्राउंड (Burari Ground / निरंकारी समागम मैदान, उत्तर दिल्ली); सीबीडी ग्राउंड (CBD Ground – Central Business District Ground, पूर्वी दिल्ली / कड़कड़डूमा-शाहदरा)
यह नया आदेश 28 अप्रैल 2022 को जारी किए गए पूर्ववर्ती स्टैंडिंग ऑर्डर को संशोधित (Modify) करते हुए लागू किया गया है। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि इन तीनों नए वैकल्पिक स्थलों पर प्रदर्शन आयोजित करने, अनुमति प्राप्त करने, भीड़ प्रबंधन, लाउडस्पीकर के प्रयोग और समय-सीमा को लेकर विस्तृत संशोधित मानक संचालन प्रक्रिया (Revised Standard Operating Procedures – SOPs) दिल्ली पुलिस मुख्यालय द्वारा अलग से जारी की जाएगी। दिल्ली पुलिस के इस फैसले को राष्ट्रीय राजधानी के अति-संवेदनशील प्रशासनिक कोर (Lutyens’ Core Zone) की सुरक्षा सुदृढ़ करने और हाल के दिनों में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के आंदोलन सहित कई प्रदर्शनों के कारण संसद मार्ग, निर्वाचन आयोग (ECI) और कनॉट प्लेस के आसपास उत्पन्न हुए गंभीर कानून-व्यवस्था संकट के स्थायी समाधान के रूप में देखा जा रहा है।
1993 से पहले भारत की संसद के बिल्कुल सामने स्थित ‘बोट क्लब’ (राजपथ/कर्तव्य पथ के लॉन) विरोध प्रदर्शनों का मुख्य केंद्र हुआ करता था। अक्टूबर 1988 में जब भारतीय किसान यूनियन (BKU) के नेता चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में लगभग 5 लाख किसानों ने बोट क्लब पर अनिश्चितकालीन डेरा डाल दिया था, तो पूरी केंद्र सरकार का कामकाज ठप हो गया था। इसके बाद 1993 में बोट क्लब को सभी प्रकार के राजनीतिक प्रदर्शनों के लिए स्थायी रूप से बंद कर दिया गया और प्रदर्शनकारियों को संसद मार्ग से सटी एक संकरी सड़क ‘जंतर-मंतर’ पर स्थानांतरित कर दिया गया।
अक्टूबर 2017 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने स्थानीय निवासियों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए जंतर-मंतर पर ध्वनि प्रदूषण और अस्वच्छता का हवाला देकर सभी प्रदर्शनों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था और प्रदर्शनकारियों को रामलीला मैदान भेजने का आदेश दिया था। हालांकि, जुलाई 2018 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने ‘मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) बनाम भारत संघ’ मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए एनजीटी के पूर्ण प्रतिबंध को खारिज कर दिया था।
शीर्ष अदालत ने कहा था कि शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) और 19(1)(बी) के तहत एक मौलिक अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया था कि वह जंतर-मंतर और रामलीला मैदान दोनों जगह प्रदर्शनों के नियमन के लिए एक संतुलित गाइडलाइन बनाए।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में दिल्ली पुलिस ने 28 अप्रैल 2022 को एक स्टैंडिंग ऑर्डर जारी किया था, जिसमें जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों की अधिकतम संख्या 1,000 तक सीमित की गई थी और रात के समय ठहरने पर पाबंदी लगाई गई थी। अब 11 अक्टूबर 2026 को उसी 2022 के आदेश को संशोधित करते हुए जंतर-मंतर को पूरी तरह डिनोटिफाई कर दिया गया है।
जंतर-मंतर की भौगोलिक अवस्थिति ऐसी है कि यह भारत के सबसे संवेदनशील सत्ता प्रतिष्ठानों के केंद्र में है। संसद भवन परिसर यहां से मात्र 500 से 700 मीटर दूर है। इसके ठीक पीछे आकाशवाणी भवन, पटेल चौक मेट्रो स्टेशन, भारत निर्वाचन आयोग (ECI) का मुख्यालय (निर्वाचन सदन), नीति आयोग और रक्षा भवन स्थित हैं। किसी भी अनियंत्रित भीड़ के लिए इन संवैधानिक भवनों की ओर कूच करना या सुरक्षा बैरिकेड्स तोड़ना अत्यंत आसान हो जाता था, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर गंभीर संकट पैदा होने का जोखिम हमेशा बना रहता था।
जंतर-मंतर कोई विशाल खुला मैदान नहीं है, बल्कि यह एक संकरी सड़क है जो संसद मार्ग और टॉलस्टॉय मार्ग को जोड़ती है। जब भी यहां 2,000 से अधिक प्रदर्शनकारी एकत्र होते थे, तो सुरक्षा कारणों से पुलिस को जनपथ, अशोका रोड, केजी मार्ग और कनॉट प्लेस आउटर सर्कल को बैरिकेड लगाकर बंद करना पड़ता था। इसके चलते प्रतिदिन लाखों वाहन चालकों, कामकाजी लोगों और व्यापारियों को घंटों तक भीषण ट्रैफिक जाम का सामना करना पड़ता था।
अक्टूबर 2026 के पहले सप्ताह में कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर किए गए ‘चप्पल सत्याग्रह’ और संसद मार्च के आह्वान ने पुलिस प्रशासन की आंखें खोल दीं। 2 अक्टूबर और फिर 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर जुटने वाले प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए दिल्ली पुलिस को 20,000 से अधिक सुरक्षाकर्मी, सीएपीएफ की 70 कंपनियां, 300 ऑडियो-विजुअल सीसीटीवी, 150 बॉडीकैम और 12 अस्थायी डिटेंशन सेंटर तैनात करने पड़े। 10 अक्टूबर को आईजीआई एयरपोर्ट पर विमान के भीतर से सीजेपी नेताओं की गिरफ्तारी और गुरुग्राम से यूट्यूबर ध्रुव राठी की हिरासत जैसे असाधारण कदमों ने यह स्पष्ट कर दिया कि लुटियंस दिल्ली के भीतर इस प्रकार के टकराव को बार-बार झेलना संभव नहीं है।
यह भारत के इतिहास का सबसे प्रसिद्ध राजनीतिक और जन-आंदोलन स्थल है। 1975 के जेपी आंदोलन से लेकर 2011 के अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन तक, देश के बड़े बदलावों की नींव इसी मैदान पर पड़ी है। रामलीला मैदान चारों तरफ से ऊंची चारदीवारी से घिरा हुआ है और इसमें केवल सीमित प्रवेश व निकास द्वार हैं। सड़क पर होने वाले प्रदर्शन (जैसे जंतर-मंतर) की तुलना में चारदीवारी वाले मैदान में भीड़ को नियंत्रित करना, मेटल डिटेक्टर लगाना और कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस के लिए कहीं अधिक सुगम होता है। यह नई दिल्ली रेलवे स्टेशन, पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन और दिल्ली गेट व नई दिल्ली मेट्रो स्टेशनों से पैदल दूरी पर है, जिससे प्रदर्शनकारियों को आवागमन में कोई असुविधा नहीं होगी।
उत्तरी दिल्ली के आउटर रिंग रोड पर स्थित यह मैदान लाखों लोगों की क्षमता वाला एक विशाल खुला भूभाग है। 2020-21 के किसान आंदोलन के दौरान भी सरकार ने प्रदर्शनकारियों को बुराड़ी मैदान जाने की पेशकश की थी। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आने वाले बड़े किसान या मजदूर मोर्चों के लिए यह स्थान सबसे उपयुक्त है क्योंकि यह शहर के भीतर प्रवेश किए बिना ही राजमार्गों से सीधे जुड़ा है। इससे राजधानी के अंदरूनी हिस्सों का जनजीवन पूरी तरह अप्रभावित रहेगा।
पूर्वी दिल्ली के कड़कड़डूमा में दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) का सेंट्रल बिजनेस डिस्ट्रिक्ट (CBD) ग्राउंड एक चौड़ा और खुला स्थान है। यह कड़कड़डूमा कोर्ट परिसर और दिल्ली मेट्रो की ब्लू व पिंक लाइन इंटरचेंज के बिल्कुल पास है। उत्तर प्रदेश (गाजियाबाद, मेरठ, हापुड़) की ओर से आने वाले छोटे और मध्यम स्तर के सामाजिक या कर्मचारी संगठनों के प्रदर्शनों के लिए यह एक सुगम और सुरक्षित मंच प्रदान करता है। डिनोटिफिकेशन के बाद अब जंतर-मंतर पर तख्तियां लेकर खड़े होना, नारे लगाना या 5 से अधिक लोगों का एकत्र होना सीधे तौर पर बीएनएसएस की धारा 163 (पूर्ववर्ती धारा 144) का उल्लंघन माना जाएगा। पुलिस को ऐसे व्यक्तियों को बिना किसी पूर्व चेतावनी के हिरासत में लेने का पूर्ण अधिकार होगा।
विभिन्न नागरिक अधिकार संगठनों और विपक्षी दलों (कांग्रेस, आप, वामपंथी दलों) ने आरोप लगाया है कि जंतर-मंतर का प्रतीकात्मक महत्व इसलिए था क्योंकि वह सत्ता के गलियारों (संसद और मंत्रालयों) के पास था। आंदोलनकारियों को बुराड़ी या कड़कड़डूमा जैसे दूरदराज के इलाकों में भेजना वास्तव में असहमति को “नजरों से ओझल” करने का प्रयास है ताकि सरकार तक जनता का रोष न पहुंच सके। कई मानवाधिकार वकीलों ने संकेत दिया है कि वे 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए इस स्टैंडिंग ऑर्डर को दिल्ली उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय में चुनौती देंगे।
पूर्व पुलिस अधिकारियों और सुरक्षा विश्लेषकों ने इस कदम का जोरदार स्वागत किया है। उनका तर्क है कि दुनिया की किसी भी प्रमुख राजधानी (जैसे वाशिंगटन में कैपिटल हिल या लंदन में व्हाइटहॉल) के प्रशासनिक कोर में अनियंत्रित और अनिश्चितकालीन धरनों की अनुमति नहीं होती। कनॉट प्लेस के व्यापारी संघ (NDTA) ने इस निर्णय पर खुशी जताते हुए कहा कि जंतर-मंतर पर आए दिन होने वाले प्रदर्शनों और पुलिस बैरिकेडिंग के कारण उनका व्यापार 40% तक गिर जाता था। अब ग्राहकों को बिना किसी भय और जाम के खरीदारी करने की सुविधा मिलेगी।
11 अक्टूबर 2026 को दिल्ली पुलिस द्वारा जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शनों की सूची से डिनोटिफाई करना केवल एक प्रशासनिक पते का बदलाव नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र भारत के जन-आंदोलनों के इतिहास में एक बड़े अध्याय का पटाक्षेप है। 1993 में बोट क्लब बंद होने के बाद जिस जंतर-मंतर ने पिछले 33 वर्षों में देश के अनगिनत संघर्षों, आंसुओं, नारों, उम्मीदों और ऐतिहासिक जीतों को देखा था चाहे वह लोकपाल के लिए जनता का आक्रोश हो, वन रैंक-वन पेंशन (OROP) के लिए पूर्व सैनिकों का धरना हो, या खिलाड़ियों का सम्मान आंदोलन वह अब इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुका है।
रामलीला मैदान, बुराड़ी और सीबीडी ग्राउंड को नए मंच के रूप में स्थापित कर प्रशासन ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों के विरोध करने के अधिकार का सम्मान सुरक्षित परिसरों में ही संभव है, जहां राष्ट्रीय सुरक्षा और आम जनता की दैनिक स्वतंत्रता बाधित न हो। आने वाले दिनों में यह देखना अत्यंत महत्वपूर्ण होगा कि क्या भारत के राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन इन नए मैदानों को अपने आंदोलन का नया तीर्थ बनाते हैं, या फिर जंतर-मंतर को दोबारा पाने के लिए यह लड़ाई देश की सर्वोच्च अदालत की दहलीज तक पहुंचती है।



