
भारतीय गणराज्य के संवैधानिक और विधायी इतिहास में 2 अक्टूबर 2026 की तारीख एक युगांतरकारी मोड़ के रूप में दर्ज हो गई है। देवभूमि उत्तराखंड के बाद अब गुजरात देश का ऐसा दूसरा राज्य बन गया है, जिसने समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code – UCC) को लागू करने के लिए अंतिम संवैधानिक मुहर प्राप्त कर ली है। भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने गुजरात विधानसभा द्वारा पारित ‘गुजरात समान नागरिक संहिता विधेयक, 2026’ (Gujarat Act No. 15 of 2026) को अपनी औपचारिक स्वीकृति (Presidential Assent) प्रदान कर दी है।
राष्ट्रपति भवन से स्वीकृति की मुहर लगने के बाद गुजरात सरकार के विधि एवं विधायी कार्य विभाग ने इसे असाधारण राजपत्र (Gazette Extraordinary) में प्रकाशित कर दिया है। गुजरात सरकार अब आधिकारिक नियम नियमावली (Rules and Regulations) अधिसूचित करेगी, जिसके बाद यह कानून पूरे गुजरात राज्य में विधिवत प्रभावी हो जाएगा।
यह कानून राज्य के प्रत्येक नागरिक पर चाहे वह किसी भी धर्म, संप्रदाय, जाति या पंथ से ताल्लुक रखता हो विवाह (Marriage), तलाक (Divorce), विरासत व संपत्ति में उत्तराधिकार (Inheritance and Succession), और लिव-इन संबंधों (Live-in Relationships) के मामलों में एक समान कानूनी ढांचा लागू करेगा।
हालांकि, संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची के तहत संरक्षित अनुसूचित जनजातियों (ST) को इस कानून की परिधि से पूर्णतः बाहर रखा गया है। गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने राष्ट्रपति की स्वीकृति का स्वागत करते हुए इसे “समानता, नारी गरिमा और विकसित भारत 2047 की दिशा में ऐतिहासिक छलांग” करार दिया है। वहीं दूसरी ओर, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस और कई नागरिक संगठनों ने इस कदम को “विभाजनकारी, चुनावी स्टंट और अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर हमला” बताते हुए इसका तीखा विरोध किया है।
गुजरात सरकार ने अक्टूबर 2022 में सर्वोच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय विशेषज्ञ समिति गठित की थी। समिति ने पूरे गुजरात में व्यापक जनसंवाद आयोजित किए, 2.5 लाख से अधिक लिखित अभ्यावेदन प्राप्त किए और विभिन्न धार्मिक समुदायों के धर्मगुरुओं से परामर्श किया। समिति द्वारा सौंपी गई अंतिम रिपोर्ट के आधार पर इस व्यापक विधेयक का मसौदा तैयार किया गया।
सदन में बहस के दौरान गृह राज्य मंत्री और मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों (DPSP) के तहत देश भर में एक समान नागरिक संहिता लागू करने का संवैधानिक संकल्प लिया गया था। 75 साल बीत जाने के बाद भी तुष्टिकरण की राजनीति के कारण महिलाओं को उनके बुनियादी अधिकारों से वंचित रखा गया।
सदन में कांग्रेस विधायक दल के नेता अमित चावड़ा और अन्य विपक्षी नेताओं ने विधेयक को जल्दबाजी में लाया गया कानून बताया। उन्होंने मांग रखी कि चूंकि इस कानून का सीधा असर करोड़ों नागरिकों के पारिवारिक और धार्मिक जीवन पर पड़ेगा, इसलिए इसे विधानसभा की एक प्रवर समिति (Select Committee) को भेजा जाए। अध्यक्ष द्वारा जब इस मांग को अस्वीकार कर दिया गया, तो कांग्रेस के सभी सदस्यों ने सरकार विरोधी नारे लगाते हुए सदन से वॉकआउट कर दिया। इसके बाद ध्वनि मत से विधेयक को पारित कर दिया गया।
किसी भी समुदाय, मजहब या परंपरा में विश्वास रखने वाले व्यक्ति के लिए अब यह अनिवार्य होगा कि वह केवल एक जीवित जीवनसाथी के रहते हुए दूसरा विवाह नहीं कर सकता। यदि कोई व्यक्ति दूसरा निकाह या शादी करता है, तो दूसरा विवाह स्वतः ही शून्य (Void) माना जाएगा और उस पर द्विविवाह का आपराधिक मुकदमा चलेगा। शादी संपन्न होने की तिथि से 60 दिनों के भीतर उसका ऑनलाइन पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा। बिना पंजीकरण के शादीशुदा जोड़ों को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं, संयुक्त बैंक खातों और पासपोर्ट जैसी सेवाओं में कानूनी अड़चनों का सामना करना पड़ेगा। किसी भी युवती का धर्म छिपाकर, झूठे वादे करके या जबरन विवाह कराने पर अधिकतम 7 वर्ष तक के कठोर कारावास और भारी जुर्माने की सजा होगी।
गांधीनगर में मीडिया को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने कहा:
“यह विधेयक गुजरात की करोड़ों माताओं, बहनों और बेटियों के अधिकारों और स्वाभिमान की सुरक्षा के लिए लाया गया है। हमारा देश 2047 तक ‘विकसित भारत’ बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है, और समान नागरिक संहिता उस लक्ष्य की ओर बढ़ाया गया एक ऐतिहासिक कदम है। यह कानून किसी भी समुदाय के साथ भेदभाव नहीं करता, न ही यह किसी की धार्मिक आस्था या व्यक्तिगत आजादी पर कोई पाबंदी लगाता है। इसका एकमात्र उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि गुजरात की हर बेटी को चाहे वह किसी भी धर्म में जन्मी हो, उसे न्याय, सम्मान और संपत्ति में उसका पूरा अधिकार मिले।”
विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल के नेता अमित चावड़ा ने कड़ा पलटवार करते हुए कहा:
“यह कानून गुजरात की जनता या किसी भी परिवार की भलाई के लिए नहीं लाया गया है। आगामी स्थानीय निकाय और नगर निगम चुनावों को देखते हुए भाजपा सरकार अपनी चौतरफा विफलताओं, बेरोजगारी और गिरती अर्थव्यवस्था से जनता का ध्यान भटकाना चाहती है। यह शुद्ध रूप से राजनीतिक ध्रुवीकरण और समाज को बांटने का औजार है। सरकार असल मुद्दों से भाग रही है और एक विशेष वर्ग को निशाना बनाकर चुनावी रोटियां सेंकना चाहती है।”
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) और अन्य याचिकाकर्ताओं द्वारा सर्वोच्च न्यायालय का रुख करने की तैयारी की जा रही है। उनका तर्क है कि अनुच्छेद 25 के तहत धर्म को मानने और उसका आचरण करने की स्वतंत्रता में शरीयत और पर्सनल लॉ भी शामिल हैं। दूसरी ओर, सरकार का तर्क है कि अनुच्छेद 25(2) के तहत सामाजिक सुधार और महिलाओं के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए कानून बनाना राज्य का संवैधानिक दायित्व है।
संविधान की सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची की प्रविष्टि 5 में ‘विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और वसीयत’ का विषय दर्ज है। चूंकि इस पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं, इसलिए राज्य विधानसभा द्वारा पारित कानून को संविधान के अनुच्छेद 254(2) के तहत राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद वह संबंधित राज्य में प्रभावी और वैध हो जाता है। गुजरात को यह मंजूरी मिल चुकी है। 2017 के प्रसिद्ध जस्टिस के.एस. पुट्टास्वामी फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने निजता (Privacy) को मौलिक अधिकार माना था। लिव-इन संबंधों का अनिवार्य पंजीकरण और माता-पिता को सूचना देने का प्रावधान क्या युवाओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अनुचित पहरा है? यह सवाल निश्चित रूप से संवैधानिक पीठ के समक्ष उठेगा।
राज्य विधि विभाग की एक विशेष टीम वर्तमान में नियमों का मसौदा तैयार कर रही है। इसमें आवेदन शुल्क, पंजीकरण का प्रारूप, अपील की प्रक्रिया और भरण-पोषण तय करने की गणना का फॉर्मूला निर्धारित किया जा रहा है। प्रत्येक जिले और तालुका स्तर पर सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट (SDM) और तहसीलदार रैंक के अधिकारियों को ‘विवाह एवं संबंध रजिस्ट्रार’ के रूप में नामित किया जा रहा है। राज्य भर में महिलाओं और छात्रों के बीच कानून के प्रावधानों, विशेषकर संपत्ति में अधिकार और विवाह पंजीकरण के लाभों को समझाने के लिए सूचना एवं जनसंपर्क विभाग द्वारा अभियान चलाया जाएगा।
गुजरात द्वारा समान नागरिक संहिता को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलना केवल एक कानून का पारित होना नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र भारत के सामाजिक सुधार आंदोलनों का एक ऐतिहासिक पड़ाव है। बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान सभा में जिस समान नागरिक संहिता का सपना देखा था, वह दशकों तक राजनीतिक विवादों और वोट-बैंक की राजनीति के फेर में फंसा रहा।
उत्तराखंड के बाद गुजरात द्वारा उठाया गया यह साहसिक कदम यह संदेश देता है कि 21वीं सदी के आत्मनिर्भर और विकसित भारत में नागरिक अधिकार धर्म या लिंग के मोहताज नहीं हो सकते। विवाह में समानता, बहुविवाह और हलाला जैसी कुरीतियों का खात्मा, संपत्ति में बेटियों को बराबर का हक और लिव-इन संबंधों में जन्मे मासूम बच्चों को कानूनी वैधता प्रदान करना किसी एक वर्ग की विजय नहीं, बल्कि समूची मानवता और नारी गरिमा की विजय है।
यद्यपि राजनीतिक मतभेद और कानूनी बहसें जारी रहेंगी, लेकिन गुजरात सरकार के सामने अब सबसे बड़ा कर्तव्य यह सुनिश्चित करना है कि यह कानून बिना किसी पूर्वाग्रह, उत्पीड़न या दुर्भावना के पूरी संवेदनशीलता और पारदर्शिता के साथ लागू हो। यदि गुजरात इसे जमीन पर सफलतापूर्वक क्रियान्वित करता है, तो यह आने वाले वर्षों में पूरे देश के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू करने का सबसे सशक्त और अनुकरणीय मॉडल साबित होगा।



