राष्ट्रीयस्वास्थ्य
त्योहारी सीजन में दिल्ली-एनसीआर में जहर घोलने की बड़ी साजिश नाकाम
हरियाणा के नूंह में खाद्य सुरक्षा विभाग का महा-अभियान, रसायनों से तैयार 13 हजार किलो मिलावटी पनीर गड्ढों में दबाकर नष्ट, 21 नमूने प्रयोगशाला भेजे, 48 घंटे में कठोर कानूनी कार्रवाई का अल्टीमेटम

धनतेरस, दीपावली और भैयादूज के आगामी त्योहारों के मद्देनजर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और आसपास के इलाकों में मिलावटी और जहरीले खाद्य पदार्थों की आपूर्ति करने वाले अंतरराज्यीय माफिया के खिलाफ हरियाणा के नूंह जिले में अब तक की सबसे बड़ी और निर्णायक प्रशासनिक कार्रवाई की गई है। खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन, मुख्यमंत्री उड़नदस्ते और जिला पुलिस के संयुक्त कार्यबल ने मेवात क्षेत्र के विभिन्न हिस्सों में संचालित अवैध डेयरी इकाइयों और भूमिगत कारखानों पर एक साथ छापा मारकर लगभग तेरह हजार किलोग्राम यानी तेरह टन रासायनिक और सिंथेटिक मिलावटी पनीर जब्त किया। मानव स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक, संक्रामक और अस्वास्थ्यकर वातावरण में तैयार किए जा रहे इस विशाल स्टॉक को जब्त करने के तुरंत बाद अधिकारियों ने जनहित में जेसीबी की मदद से गहरे गड्ढे खुदवाए और फिनाइल व कीटनाशक डालकर इसे मिट्टी में पूरी तरह दफन कर दिया ताकि यह किसी भी रूप में दोबारा बाजार तक न पहुंच सके।
इस व्यापक धरपकड़ के दौरान जांच दलों ने पनीर, मावा, खोया और पारंपरिक मिठाइयों के इक्कीस संदिग्ध नमूने कानूनी प्रक्रिया के तहत विधिवत सील किए हैं, जिन्हें त्वरित जांच के लिए राज्य खाद्य परीक्षण प्रयोगशाला भेजा गया है। जिला प्रशासन और खाद्य सुरक्षा विभाग ने अवैध कारोबारियों को सख्त चेतावनी जारी करते हुए घोषणा की है कि प्रयोगशाला से जांच रिपोर्ट प्राप्त होते ही यदि कोई भी नमूना असुरक्षित अथवा स्वास्थ्य के लिए घातक पाया गया, तो संबंधित डेयरी संचालकों और सप्लायरों के खिलाफ अगले अड़तालीस घंटे के भीतर भारतीय न्याय संहिता और खाद्य सुरक्षा अधिनियम की अत्यंत कठोर व गैर-जमानती धाराओं के तहत आपराधिक मुकदमे दर्ज कर उन्हें जेल भेजा जाएगा।
दीपावली के आगमन के साथ ही उत्तर भारत के बाजारों में दूध, पनीर, मावा और अन्य दुग्ध उत्पादों की मांग अपनी सामान्य खपत की तुलना में तीन से चार गुना तक बढ़ जाती है। दिल्ली, गुरुग्राम, फरीदाबाद, नोएडा और गाजियाबाद जैसे विशाल महानगरीय केंद्रों में मिठाइयों की दुकानों, होटलों, रेस्तरांओं, ढाबों और कैटरिंग कारोबारियों के पास अचानक पनीर के भारी ऑर्डर आने लगते हैं। बाजार में प्राकृतिक दूध की सीमित उपलब्धता और इस अप्रत्याशित मांग के बीच जो भारी अंतर पैदा होता है, उसी का नाजायज फायदा उठाने के लिए मिलावटखोरों का एक सुसंगठित सिंडिकेट सक्रिय हो जाता है। नूंह और मेवात की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यह इलाका दिल्ली-एनसीआर के अत्यंत निकट है और इसके ग्रामीण अंचलों में सघन आबादी से दूर एकांत खेतों में बड़े पैमाने पर अवैध निर्माण करना आसान होता है। मिलावटखोर इसी रणनीतिक लाभ का फायदा उठाकर नकली और रासायनिक पनीर के बड़े कारखाने स्थापित कर लेते हैं, जहां से रात के अंधेरे में छोटी पिकअप गाड़ियों के माध्यम से दिल्ली और एनसीआर के खुदरा बाजारों में जहरीली खेप पहुंचा दी जाती है।
जिला प्रशासन को पिछले कई दिनों से खुफिया सूचनाएं मिल रही थीं कि तावडू, फिरोजपुर झिरका, नगीना और पुन्हाना के ग्रामीण इलाकों में बड़े पैमाने पर सिंथेटिक दूध और रासायनिक अवयवों के जरिए पनीर तैयार किया जा रहा है। इन सूचनाओं को गंभीरता से लेते हुए उपायुक्त और पुलिस अधीक्षक के निर्देश पर एक विशेष संयुक्त टास्क फोर्स का गठन किया गया, जिसमें खाद्य सुरक्षा अधिकारियों, राजस्व अधिकारियों, उपमंडल मजिस्ट्रेटों और पुलिस बल को शामिल किया गया। योजनाबद्ध रणनीति के तहत शुक्रवार की देर रात और शनिवार तड़के विभिन्न चिन्हित स्थानों पर एक साथ सुनियोजित छापेमारी की गई। जब जांच दल इन कथित डेरियों और कारखानों के परिसर में दाखिल हुए, तो वहां का भयावह और घिनौना दृश्य देखकर अनुभवी अधिकारी भी दंग रह गए।
कारखानों के भीतर साफ-सफाई के बुनियादी मानकों की धज्जियां उड़ाई जा रही थीं। पनीर बनाने का यह पूरा खेल खुले बाड़ों, सड़ी हुई नालियों और पशुओं के मलमूत्र के पास चल रहा था। हवा में सड़े हुए दूध और तीखे रसायनों की असहनीय दुर्गंध फैली हुई थी। जहां पनीर को जमाया जा रहा था, वहां चारों तरफ मक्खियां और कीड़े-मकोड़े भिनभिना रहे थे। काम करने वाले मजदूरों ने न तो कोई सुरक्षात्मक पोशाक पहन रखी थी और न ही उनके हाथों में दस्ताने या सिर पर टोपियां थीं। कई स्थानों पर जंग लगे लोहे के ड्रमों, गंदे प्लास्टिक के टबों और रासायनिक भंडारण के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले पुराने कंटेनरों में दूध को फाड़ने और पनीर बनाने की प्रक्रिया चल रही थी। भूमिगत बोरवेल से निकाले जा रहे अत्यधिक दूषित और अनुपचारित पानी का इस्तेमाल सीधे तौर पर पनीर धोने और उसके वजन को बढ़ाने के लिए किया जा रहा था।
जांच अधिकारियों द्वारा मौके पर की गई प्रारंभिक पड़ताल में यह सनसनीखेज खुलासा हुआ कि इस तेरह हजार किलो पनीर को बनाने के लिए शुद्ध दूध की एक भी बूंद का इस्तेमाल नहीं किया गया था। यह पूरा उत्पाद शुद्ध रूप से एक घातक रासायनिक मिश्रण था, जिसे अत्यंत वैज्ञानिक और शातिर तरीके से असली पनीर जैसा रूप दिया गया था। मिलावटखोर सबसे पहले घटिया दर्जे के पाम ऑयल, वनस्पति घी और निम्न-गुणवत्ता वाले स्किम्ड मिल्क पाउडर को हल्के गर्म पानी में मिलाते थे। इसके बाद इस घोल में गाढ़ापन और झाग पैदा करने के लिए कपड़े धोने वाले डिटर्जेंट पाउडर, यूरिया और तरल साबुन की कुछ मात्रा डाली जाती थी। जब यह सफेद तरल तैयार हो जाता था, तो इसे तुरंत फाड़ने के लिए पारंपरिक नींबू के रस या सिरके के स्थान पर बेहद सस्ते और औद्योगिक ग्रेड के सल्फ्यूरिक एसिड और एसिटिक एसिड का इस्तेमाल किया जाता था।
एसिड के संपर्क में आते ही यह रासायनिक घोल तेजी से फटकर गाढ़े थक्के के रूप में जम जाता था। इसके बाद इस थक्के को गंदे सूती कपड़ों में बांधकर भारी पत्थरों या लोहे के बाटों के नीचे दबा दिया जाता था ताकि उसका पानी निकल जाए और वह ठोस ब्लॉक का रूप ले ले। पनीर को आकर्षक और चमकदार सफेद रंग देने के लिए उसमें हाइड्रोजन पेरोक्साइड और हानिकारक व्हाइटनिंग एजेंट्स का मिश्रण किया जाता था। अधिकारियों ने बताया कि इस कृत्रिम पनीर की लागत असली पनीर की तुलना में एक-चौथाई भी नहीं आती थी, जिसके चलते मिलावटखोर इसे थोक मंडियों में मात्र एक सौ बीस से एक सौ पचास रुपये प्रति किलो के भाव पर बेचते थे, जिसे आगे चलकर खुदरा दुकानदार और ढाबा संचालक तीन सौ पचास से चार सौ रुपये प्रति किलो तक के भाव में ग्राहकों को परोसते थे।
छापेमारी के दौरान मौके से बरामद तेरह टन पनीर की विशाल मात्रा को देखकर अधिकारियों को तुरंत समझ आ गया कि इसे सामान्य मालखानों में सुरक्षित रखना संभव नहीं है और यदि इसे ऐसे ही छोड़ दिया गया तो वातावरण में भयंकर सड़न और संक्रामक बीमारियां फैल सकती हैं। इसके अलावा इस बात का भी अंदेशा था कि भ्रष्ट तत्वों द्वारा इसे किसी अन्य रास्ते से बाजार में दोबारा खपा दिया जाए। इसलिए वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों की उपस्थिति में इस पूरे दूषित स्टॉक को नष्ट करने का तात्कालिक फैसला लिया गया। नगर पालिका के बड़े डंपरों और ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में इस मिलावटी पनीर को लादकर शहर से बाहर एक सुरक्षित और बंजर सरकारी जमीन पर ले जाया गया। वहां बड़ी-बड़ी जेसीबी मशीनों की मदद से आठ से दस फीट गहरे खड्डे खोदे गए। पनीर के पूरे ढेर को उन गड्ढों में डालने के बाद उस पर सैकड़ों लीटर सांद्रित फिनाइल, तेजाब और चूना डाला गया ताकि यह पूरी तरह विघटित हो जाए और कोई आवारा पशु भी इसे खाकर बीमार न पड़े। इसके पश्चात खड्डों को भारी मिट्टी और पत्थरों से पाट दिया गया।
नष्टीकरण की इस बड़ी प्रक्रिया से पहले खाद्य सुरक्षा अधिकारियों ने विधि-सम्मत साक्ष्य जुटाने के लिए बेहद सावधानीपूर्वक इक्कीस अलग-अलग नमूने एकत्र किए। इनमें विभिन्न डेरियों से लिए गए पनीर के नमूनों के अलावा वहां तैयार किया जा रहा खोया, मावा, रसगुल्ले और अन्य पारंपरिक मिठाइयों के नमूने शामिल हैं। सभी नमूनों को अधिकृत कांच की बोतलों में भरकर, सील-मोहर लगाकर और गवाहों के हस्ताक्षर करवाकर सुरक्षित किया गया। इन सभी नमूनों को हरियाणा की राज्य खाद्य प्रयोगशाला करनाल में विशेष दूत के माध्यम से प्राथमिकता के आधार पर परीक्षण के लिए भेजा गया है। प्रयोगशाला के विशेषज्ञों को निर्देश दिए गए हैं कि त्योहारी संवेदनशीलता को देखते हुए इन नमूनों की रासायनिक और सूक्ष्मजीवविज्ञानी जांच रिपोर्ट अगले अड़तालीस घंटे के भीतर विभाग को उपलब्ध कराई जाए।
खाद्य सुरक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने कड़े शब्दों में स्पष्ट किया है कि नमूनों की जांच रिपोर्ट आते ही दोषियों के खिलाफ विधिक शिकंजा कस दिया जाएगा। यदि जांच में रासायनिक संदूषण, भारी धातुओं या डिटर्जेंट की मौजूदगी साबित होती है, तो इसे केवल खाद्य अपमिश्रण का सामान्य मामला नहीं माना जाएगा, बल्कि इसे जनता के जीवन के साथ खिलवाड़ करने और गैर-इरादतन मानव वध के प्रयास जैसी गंभीर आपराधिक धाराओं के तहत देखा जाएगा। विभाग ने न केवल संबंधित कारखानों के लाइसेंस और पंजीकरण रद्द करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है, बल्कि उन जमीनों और परिसरों को भी सील करने का नोटिस जारी किया है जहां यह काला कारोबार संचालित हो रहा था। जिला प्रशासन ने अवैध संपत्ति के खिलाफ ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की चेतावनी भी दी है।
चिकित्सा विशेषज्ञों और वरिष्ठ चिकित्सकों ने इस प्रकार के रासायनिक और मिलावटी पनीर के मानव शरीर पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों के प्रति अत्यंत गंभीर चिंता व्यक्त की है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार डिटर्जेंट, यूरिया, पाम ऑयल और सल्फ्यूरिक एसिड से तैयार पनीर का सेवन करना सीधे तौर पर धीमा जहर खाने जैसा है। जब कोई व्यक्ति इसका सेवन करता है, तो सबसे पहले उसकी आंतों की आंतरिक झिल्ली और आमाशय को भारी नुकसान पहुंचता है। इसके कारण पेट में असहनीय दर्द, खूनी दस्त, उल्टी, गंभीर गैस्ट्रोएंटेराइटिस और तीव्र विषाक्तता हो सकती है। जो लोग नियमित रूप से बाहर का खाना खाते हैं और अनजाने में इस सिंथेटिक पनीर का उपभोग करते हैं, उनके लिवर और किडनी पर इसका अपरिवर्तनीय और स्थाई प्रभाव पड़ता है। समय बीतने के साथ यह रसायन शरीर में जमा होकर लिवर सिरोसिस, किडनी फेलियर और पेट के कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों का प्राथमिक कारण बन जाते हैं। गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों के लिए यह विषाक्त पदार्थ और भी अधिक घातक साबित हो सकता है।
जांच में यह भी सामने आया है कि इस अवैध नेटवर्क की जड़ें केवल नूंह जिले तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि इसका एक गहरा अंतरराज्यीय तंत्र फैला हुआ है। प्राथमिक पूछताछ में पता चला है कि इन इकाइयों को घटिया और एक्सपायर हो चुका स्किम्ड मिल्क पाउडर और पाम ऑयल पड़ोसी राज्यों राजस्थान और उत्तर प्रदेश के थोक डीलरों द्वारा अनाधिकृत चैनलों से आपूर्ति किया जाता था। वहीं दूसरी ओर तैयार माल को खपाने के लिए दिल्ली के आजादपुर, गाजीपुर, ओखला तथा गुरुग्राम की खांडसा मंडी और फरीदाबाद के बल्लभगढ़ की मंडियों में स्थित कुछ बिचौलियों के साथ दैनिक आधार पर अनुबंध किए गए थे। यह गिरोह दिन के समय कोई गतिविधि नहीं करता था और पूरी विनिर्माण प्रक्रिया रात दस बजे से सुबह चार बजे के बीच पूरी की जाती थी। इसके बाद सुबह का उजाला होने से पहले ही पिकअप गाड़ियां राजमार्गों से बचते हुए ग्रामीण संपर्क मार्गों से दिल्ली और एनसीआर की सीमाओं में प्रवेश कर जाती थीं।
इस पूरे अंतरराज्यीय नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए नूंह पुलिस और आबकारी व कराधान विभाग ने मिलकर एक सघन नाकाबंदी योजना तैयार की है। जिले से बाहर जाने वाले सभी प्रमुख मार्गों, विशेष रूप से कुंडली-मानेसर-पलवल एक्सप्रेसवे, दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे के लिंक मार्गों और सोहना-गुरुग्राम हाईवे पर चौबीसों घंटे चलने वाले विशेष सचल निगरानी दल तैनात कर दिए गए हैं। इन चौकियों पर रात के समय गुजरने वाले हर एक कमर्शियल लोडर, पिकअप और वैन की सघन तलाशी ली जा रही है। खाद्य सुरक्षा अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे संदेह होने पर मौके पर ही रैपिड टेस्टिंग किट के माध्यम से दूध और पनीर की प्राथमिक जांच करें और यदि उत्पाद संदिग्ध पाया जाए तो गाड़ी को तुरंत जब्त कर लिया जाए। इसके अतिरिक्त जिला स्तर पर एक संयुक्त नियंत्रण कक्ष भी स्थापित किया गया है जहां आम नागरिक मिलावटखोरी की गुप्त सूचना दर्ज करा सकते हैं।
खाद्य सुरक्षा विभाग ने इस व्यापक धरपकड़ के साथ-साथ आम जनता से भी अपील की है कि वे त्योहारी खरीदारी के दौरान अत्यधिक सतर्कता और जागरूकता बरतें। अधिकारियों ने बताया कि उपभोक्ता अपने घर की रसोई में ही कुछ बेहद आसान और घरेलू परीक्षणों के माध्यम से असली और नकली पनीर के बीच के अंतर को पहचान सकते हैं। इसके लिए पनीर के एक छोटे से टुकड़े को थोड़े से पानी में उबालकर ठंडा कर लेना चाहिए और फिर उस पर मेडिकल स्टोर से मिलने वाले टिंचर आयोडीन की दो या तीन बूंदें डालनी चाहिए। यदि आयोडीन डालते ही पनीर का रंग नीला या गहरा जामुनी हो जाए, तो इसका सीधा अर्थ है कि उसमें स्टार्च, उबले हुए आलू या डिटर्जेंट की मिलावट की गई है, क्योंकि शुद्ध दूध से बना पनीर कभी भी आयोडीन के साथ नीला रंग नहीं देता।



