राज्यशिक्षा

भोपाल में ‘जेन अल्फा’ का अनोखा सड़क आंदोलन: रीजनल स्कूल के छात्रों ने DMS के KVS में प्रस्तावित विलय का किया तीखा विरोध

शैक्षणिक प्रयोग और नवाचार की स्वायत्तता बचाने की मांग

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में स्कूली शिक्षा और राष्ट्रीय शैक्षणिक नीति के संदर्भ में एक अभूतपूर्व, अनूठा और ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शन देखने को मिला है। भोपाल के श्यामला हिल्स स्थित डेमॉन्स्ट्रेशन मल्टीपर्पज स्कूल (DMS), जिसे स्थानीय स्तर पर रीजनल स्कूल (Regional School) के नाम से जाना जाता है, के सैकड़ों स्कूली छात्रों (Gen Alpha) ने स्कूल परिसर के बाहर उतरकर जोरदार विरोध प्रदर्शन किया।
यह विरोध प्रदर्शन राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) के तहत संचालित चार ऐतिहासिक प्रयोगात्मक स्कूलों (PM SHRI DM Schools) को केंद्रीय विद्यालय संगठन (KVS) के प्रशासनिक नियंत्रण में स्थानांतरित और विलय (Proposed Handover/Merger) करने के सरकारी प्रस्ताव के खिलाफ आयोजित किया गया। हाथों में “Save DMS”, “We Want Justice” और “हमारी पहचान मत छीनो” जैसी तख्तियां लिए कक्षा 6 से 12वीं तक के लगभग 400 से अधिक छात्र-छात्राओं ने नारे लगाते हुए स्पष्ट किया कि इस संभावित विलय से संस्थान की मूल प्रयोगात्मक पहचान, अनूठी शैक्षणिक कार्यप्रणाली और स्वायत्तता पूरी तरह नष्ट हो जाएगी।
दिसंबर 1965 में जब भारत में स्कूली शिक्षा के पुनर्गठन और आधुनिकीकरण के लिए कोठारी आयोग (1964-66) की सिफारिशों पर काम हो रहा था, तब एनसीईआरटी ने देश के चार प्रमुख भौगोलिक क्षेत्रों में प्रयोगात्मक स्कूलों (Experimental Laboratory Schools) की स्थापना की थी 
डीएमएस सामान्य स्कूलों की तरह केवल सिलेबस खत्म कराने और बोर्ड परीक्षा में अंक दिलाने के लिए नहीं बने हैं। जब भी एनसीईआरटी देश के लिए कोई नया पाठ्यक्रम (NCF), पाठ्यपुस्तक या मूल्यांकन पद्धति तैयार करती है, तो उसका सबसे पहला फील्ड-ट्रायल इन्हीं चार डीएमएस स्कूलों में किया जाता है।
रीजनल इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन (RIE) में 4-वर्षीय इंटीग्रेटेड बी.एड और एम.एड कर रहे भावी शिक्षकों को वास्तविक कक्षाओं में अध्यापन का व्यावहारिक प्रशिक्षण (Action Research & Teaching Internship) इन्हीं स्कूलों के माध्यम से मिलता है। 1965 से ही ये स्कूल बहुउद्देशीय (Multipurpose) रहे हैं, जहाँ कला, विज्ञान, वाणिज्य के साथ-साथ व्यावसायिक शिक्षा (Vocational Education), कृषि, संगीत, ललित कला और तकनीकी शिल्पकला को नियमित पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाया गया।
सड़क पर उतरे छात्रों और उनके अभिभावकों का तर्क है कि केंद्रीय विद्यालय संगठन (KVS) और डेमॉन्स्ट्रेशन स्कूल (DMS) दोनों का प्रशासनिक दर्शन और मूल उद्देश्य पूरी तरह भिन्न है प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना है कि केवीएस का अपना एक बहुत ही सख्त, मानकीकृत और केंद्रीकृत पाठ्यक्रम ढांचा है। यदि डीएमएस को केवीएस के हवाले कर दिया गया, तो शिक्षकों की स्वतंत्र रूप से नए प्रयोग करने, गैर-पारंपरिक प्रोजेक्ट आधारित शिक्षण कराने और कक्षाओं में एक्शन-रिसर्च करने की छूट समाप्त हो जाएगी।
अभिभावक संघ ने चिंता जताई कि वर्तमान में डीएमएस में प्रवेश कंप्यूटर आधारित रैंडम लॉटरी (Random Draw) से होता है, जिससे समाज के कमजोर, मध्यम और वंचित वर्ग के बच्चों को उच्चस्तरीय शिक्षा का अवसर मिलता है। केवीएस में स्थानांतरणीय केंद्रीय कर्मचारियों, रक्षा कर्मियों आदि के लिए सख्त प्राथमिकता श्रेणियां (Category I, II) लागू होती हैं, जिससे स्थानीय और सामान्य पृष्ठभूमि के बच्चों के लिए प्रवेश के दरवाजे पूरी तरह बंद हो जाएंगे।
रीजनल कॉलेज ऑफ एजुकेशन (RIE) भोपाल के बी.एड और एम.एड छात्रों के लिए डीएमएस उनकी शिक्षण इंटर्नशिप का प्राथमिक केंद्र है। केवीएस के तहत जाने के बाद प्रशासनिक नियमों के टकराव के कारण शिक्षक-प्रशिक्षुओं के लिए इंटर्नशिप और शिक्षण अभ्यास के अवसर बाधित होंगे। छात्रों ने आशंका जताई कि वर्तमान में डीएमएस में चलने वाले विशेष वोकेशनल कोर्सेज, रोबोटिक्स लैब्स, थियेटर और आर्ट्स प्रोग्राम्स को केवीएस के सामान्य मानक खाके में फिट नहीं किया जा सकेगा।
आंदोलनकारी छात्रों ने सवाल उठाया कि विलय की स्थिति में वर्तमान में पढ़ रहे छात्रों की फीस संरचना, परीक्षा बोर्ड के प्रारूप और संविदा व नियमित शिक्षकों के भविष्य को लेकर कोई स्पष्ट नीति जारी नहीं की गई है।
स्कूल गेट पर आयोजित इस प्रदर्शन के दौरान छात्रों ने किसी राजनीतिक दल के झंडे के बिना स्वतःस्फूर्त होकर अनुशासनबद्ध तरीके से अपनी बात रखी। प्रदर्शन के अंत में छात्र प्रतिनिधियों के एक शिष्टमंडल ने आरआईई भोपाल के प्राचार्य प्रोफेसर एस. के. गुप्ता को अपना विस्तृत मांग पत्र और आपत्ति ज्ञापन सौंपा।
चार पीएम श्री डीएमएस (भोपाल, अजमेर, मैसूरु, भुवनेश्वर) को केवीएस को सौंपने के लिए गठित तौर-तरीका निर्धारण समिति (Modalities Committee) को तत्काल भंग किया जाए। डीएमएस की प्रयोगात्मक स्वायत्तता को संरक्षित रखते हुए इसे एनसीईआरटी के अंतर्गत ‘सेंटर फॉर एजुकेशनल इनोवेशन’ के रूप में और अधिक वित्तीय व तकनीकी संसाधन दिए जाएं। छात्रों ने साफ किया कि यदि केंद्र सरकार और शिक्षा मंत्रालय ने इस विलय प्रस्ताव को वापस नहीं लिया, तो वे अपने माता-पिता और पूर्व छात्रों (Alumni Network) के साथ मिलकर चरणबद्ध तरीके से शांतिपूर्ण जन-आंदोलन शुरू करेंगे।
शिक्षाविदों और समाजशास्त्रियों का मानना है कि किसी भी देश की स्कूली शिक्षा प्रणाली में विविधता (Institutional Pluralism) का होना अत्यंत आवश्यक है। सभी संस्थानों को एक ही केंद्रीकृत प्रशासनिक सांचे में ढालने से नवाचार की संभावनाएं क्षीण हो जाती हैं। एनसीईआरटी के डीएमएस स्कूल पिछले छह दशकों से देश में शिक्षा के नए प्रतिमानों को गढ़ने में सफल रहे हैं। ऐसे में प्रशासनिक सुविधा के नाम पर 60 वर्ष पुरानी शैक्षणिक विरासत और अनुसंधान मॉडल को समाप्त करने के बजाय उसे आधुनिक तकनीक के साथ सशक्त बनाना अधिक दूरदर्शी नीति होगी।
भोपाल के रीजनल स्कूल में ‘जेन अल्फा’ के स्कूली बच्चों द्वारा अपनी संस्थागत पहचान और नवाचार की संस्कृति को बचाने के लिए सड़क पर उतरना एक दुर्लभ और आंखें खोलने वाला लोकतांत्रिक उदाहरण है। यह आंदोलन यह सिद्ध करता है कि आज की नई पीढ़ी न केवल अपनी पढ़ाई के प्रति जागरूक है, बल्कि वह उस शैक्षणिक पर्यावरण और शोध संस्कृति के महत्व को भी भली-भांति समझती है जो उन्हें एक लीक से हटकर दृष्टिकोण प्रदान करती है। अब गेंद शिक्षा मंत्रालय और एनसीईआरटी प्रशासन के पाले में है कि वे इन युवा छात्रों की जायज चिंताओं का किस प्रकार संवेदनशील समाधान निकालते हैं।

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