
देश के शीर्ष प्रौद्योगिकी संस्थानों में शुमार भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान बॉम्बे (IIT Bombay) ने अपने पवई स्थित आवासीय परिसर के छात्र हॉस्टलों में एक बड़ा बुनियादी ढांचागत बदलाव शुरू कर दिया है। संस्थान प्रशासन ने हॉस्टल के कमरों से पारंपरिक सीलिंग फैन (छत के पंखे) हटाकर उनकी जगह दीवार पर लगने वाले पंखे (Wall-Mounted Fans) लगाने की प्रक्रिया आधिकारिक तौर पर आरंभ कर दी है।
परिसर में वॉल-माउंटेड पंखों का पहला बड़ा बैच पहुंच चुका है और चिन्हित हॉस्टलों में पुराने सीलिंग पंखों को उतारकर नए पंखे लगाने का काम तेजी से जारी है। आईआईटी बॉम्बे के प्रशासनिक अधिकारियों ने इस कदम पर आधिकारिक स्पष्टीकरण देते हुए कहा है कि यह बदलाव हॉस्टल परिसरों के पूर्व-नियोजित नवीनीकरण और आधुनिकीकरण (Planned Hostel Renovation) का एक सामान्य हिस्सा है, जिसका निर्णय पहले ही लिया जा चुका था। प्रशासन ने इसे हाल ही में कैंपस में हुई छात्र आत्महत्या की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं से सीधे जोड़ने से इनकार किया है।
हालांकि, इस बदलाव का समय बेहद संवेदनशील है। 18 सितंबर को एनर्जी साइंस एंड इंजीनियरिंग विभाग के 20 वर्षीय बीटेक द्वितीय वर्ष के छात्र साहिल वाकोडे द्वारा हॉस्टल के कमरे में सीलिंग फैन से लटककर जान देने की दर्दनाक घटना के ठीक बाद यह कदम उठाया गया है। इस घटना के बाद पवई परिसर में छात्रों के जबर्दस्त विरोध-प्रदर्शन, डीन (प्रशासनिक मामले) के खिलाफ प्राथमिकी और पद से हटाए जाने के बाद पूरे देश में उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों के मानसिक दबाव, संस्थागत उत्पीड़न और सुरक्षा उपायों पर एक गंभीर विमर्श छिड़ गया है।
पारंपरिक सीलिंग पंखे कंक्रीट की छत में लोहे के हुक और भारी डाउन-रॉड के सहारे लटकते हैं, जो 80 से 100 किलोग्राम तक का अतिरिक्त वजन सहन करने में सक्षम होते हैं। कमरों से सीलिंग फैन हटा देने से छत पर फांसी लगाने योग्य कोई भी केंद्रीय ओवरहेड एंकर पॉइंट शेष नहीं रहता।
राजस्थान के कोचिंग हब कोटा में हॉस्टलों के लिए सीलिंग फैन में एक विशेष स्प्रिंग-लोडेड ‘एंटी-सुसाइड डिवाइस’ लगाना अनिवार्य किया गया था। इस प्रणाली में जैसे ही पंखे की रॉड पर 20 किलोग्राम से अधिक वजन पड़ता है, स्प्रिंग फैल जाती है और एक अलार्म बजने लगता है, जिससे व्यक्ति नीचे गिर जाता है। हालांकि, तकनीकी रूप से कई बार इस स्प्रिंग के जाम होने या रखरखाव की कमी से विफल होने की शिकायतें आई थीं।
आईआईटी बॉम्बे ने किसी अतिरिक्त स्प्रिंग डिवाइस पर निर्भर रहने के बजाय सीधे छत से पंखों को ही पूरी तरह हटाने का निर्णय लिया है। दीवार पर 7-8 फीट की ऊंचाई पर लगाए जाने वाले ये पंखे केवल साइड-एंगल से हवा फेंकते हैं और इनके ढांचे पर अतिरिक्त भार डालना भौतिक रूप से संभव नहीं होता। हॉस्टल प्रबंधन के अनुसार, पुराने हॉस्टलों के छोटे कमरों में बंक-बेड (दोमंजिला बिस्तर) लगाने या ऊंचे अध्ययन शेल्फ रखने में सीलिंग फैन कई बार बाधा बनते थे। वॉल-माउंटेड पंखों से कमरे का वर्टिकल स्पेस खाली होता है और वेंटिलेशन में भी सुधार आता है।
ऊर्जा विज्ञान और इंजीनियरिंग विभाग (Energy Science and Engineering) के 20 वर्षीय छात्र साहिल वाकोडे को 18 सितंबर को मिड-सेमेस्टर परीक्षा के दौरान कथित तौर पर मोबाइल फोन का उपयोग करने और प्रश्नपत्र को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) प्लेटफॉर्म पर अपलोड करने के आरोप में पकड़ा गया था।
साहिल के परिवार और छात्र संगठनों का आरोप है कि परीक्षा हॉल से बाहर निकाले जाने के बाद प्रशासनिक अधिकारियों ने उसे निष्कासित (Suspend) करने की धमकी दी और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया। परिवार ने यह भी आरोप लगाया कि साहिल को उसकी पृष्ठभूमि के कारण संस्थागत भेदभाव और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा।
आईआईटी बॉम्बे प्रशासन ने एक बयान जारी कर कहा कि छात्र के खिलाफ कोई औपचारिक अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू नहीं की गई थी। प्रशासन का दावा है कि परीक्षा के बाद छात्र की काउंसलिंग की गई थी और उसे आश्वस्त किया गया था कि इस घटना से उसका पूरा शैक्षणिक करियर बर्बाद नहीं होगा। निदेशक प्रो. शिरीष केदारे ने जाति-आधारित भेदभाव के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि संस्थान में छात्रों की श्रेणी से संबंधित जानकारी पूरी तरह गोपनीय रखी जाती है और शिक्षकों को यह जानकारी उपलब्ध नहीं होती।
छात्र की मौत की खबर फैलते ही सैकड़ों छात्र संस्थान के मुख्य गेट पर एकत्र हो गए और रविवार रात को एक लाइव-स्ट्रीम्ड महा-धरना दिया। भारी दबाव के बीच निदेशक प्रो. केदारे ने छात्रों के साथ तीन घंटे की लंबी बैठक की और प्रदर्शनकारियों द्वारा सौंपी गई 18 सूत्रीय मांगों की सूची पर हस्ताक्षर किए।
इन मांगों में परीक्षा हॉल के सख्त नियमों में मानवीय दृष्टिकोण, स्वतंत्र जांच समिति का गठन, पारदर्शी मेंटरशिप और हॉस्टल सुरक्षा उपायों का तत्काल क्रियान्वयन शामिल था।
पवई पुलिस ने छात्र के परिजनों की शिकायत पर प्रशासनिक मामलों के डीन प्रो. सूर्यनारायण दूल्ला के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता और एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज किया। इसके बाद उन्हें डीन के पद से तत्काल हटा दिया गया। दूसरी ओर, आईआईटी बॉम्बे फैकल्टी फोरम ने प्रो. दूल्ला के समर्थन में कैंपस में मार्च निकाला और कहा कि उन्होंने केवल सीनेट द्वारा अनुमोदित परीक्षा आचार संहिता का पालन किया था।
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार गुट) के मुख्य प्रवक्ता अनीश गवांडे ने इस कदम पर कड़ा तंज कसते हुए कहा:
“यह सोचना अत्यंत हास्यास्पद और बेतुका है कि हॉस्टल के कमरे से सीलिंग फैन बदल देने से एक पूरी तरह चरमरा चुकी व्यवस्था (Broken System) ठीक हो जाएगी! छात्र परीक्षाओं के अमानवीय दबाव, प्लेसमेंट के तनाव, जातिगत अपमान और प्रशासनिक असंवेदनशीलता के कारण अपनी जान दे रहे हैं। समस्या छत के पंखे में नहीं, बल्कि उस जहरीले अकादमिक माहौल में है जो एक 20 साल के मेधावी छात्र को यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि उसके पास मौत के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा है।”
अंबेडकर पेरियार फुले स्टडी सर्कल (APPSC) और अन्य छात्र समूहों ने कहा कि वे भौतिक सुरक्षा उपायों का विरोध नहीं करते, लेकिन इसे मूल समस्याओं से ध्यान भटकाने का जरिया नहीं बनाया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि जब तक फैकल्टी का रवैया सहानुभूतिपूर्ण नहीं होगा और मेंटरशिप सिस्टम मजबूत नहीं होगा, तब तक कोई भी इंफ्रास्ट्रक्चर बदलाव अधूरा है।
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि ‘मीन्स रेस्ट्रिक्शन’ केवल तात्कालिक आवेग (Impulsive Moment) को कुछ मिनटों के लिए टाल सकता है। यदि किसी छात्र के मन में आत्मघाती विचार आ रहे हैं, तो केवल पंखा हटा देना उसे ठीक नहीं कर सकता। इसके लिए जरूरी है कि संस्थान में ‘गेटकीपर ट्रेनिंग’ हो, जिससे दोस्त और वार्डन शुरुआती तनाव के लक्षणों को पहचान सकें।
शिक्षा विशेषज्ञों ने आईआईटी बॉम्बे और अन्य तकनीकी संस्थानों के लिए एक बहुस्तरीय सुधार मॉडल का प्रस्ताव दिया है आईआईटी के कठोर पाठ्यक्रम में लगातार होने वाले क्विज, मिड-सेमेस्टर और एंड-सेमेस्टर परीक्षाओं के चक्र को युक्तिसंगत बनाया जाना चाहिए, ताकि छात्रों को पाठ्येतर गतिविधियों और विश्राम के लिए पर्याप्त समय मिले। छात्र परामर्श केंद्र (Student Wellness Centre) को पूरी तरह स्वतंत्र बनाया जाना चाहिए। छात्रों में यह डर नहीं होना चाहिए कि मनोचिकित्सक के पास जाने से उनकी शैक्षणिक रिपोर्ट या प्लेसमेंट पर कोई नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। ग्रामीण, हिंदी या क्षेत्रीय भाषा माध्यम से आने वाले छात्रों के लिए पहले वर्ष में विशेष भाषा और बुनियादी गणित के ओरिएंटेशन कोर्स चलाए जाने चाहिए, ताकि वे अत्यधिक प्रतिस्पर्धी माहौल में हीनभावना का शिकार न हों।
आईआईटी बॉम्बे द्वारा हॉस्टल कमरों में सीलिंग फैन को हटाकर वॉल-माउंटेड पंखे लगाना एक व्यावहारिक और तत्कालिक सुरक्षा कदम जरूर है। आधुनिक आवासीय परिसरों में छात्रों को किसी भी प्रकार के आत्मघाती माध्यमों से दूर रखना प्रशासन का प्राथमिक कर्तव्य है।
लेकिन यह निर्विवाद सत्य है कि भारत के सबसे मेधावी मस्तिष्कों को तनाव, अवसाद और एकाकीपन से बचाने के लिए केवल लोहे और तारों के विन्यास को बदलना पर्याप्त नहीं होगा। साहिल वाकोडे जैसे अनगिनत होनहार युवाओं की असामयिक मौतें पूरे देश के नीति-निर्माताओं, शिक्षकों और अभिभावकों से यह सवाल पूछ रही हैं कि क्या हमारी तकनीकी शिक्षा प्रणाली मानवीय संवेदनाओं से शून्य हो चुकी है?
आईआईटी बॉम्बे को अब केवल हॉस्टल के कमरों का रंग-रोगन और पंखे बदलने तक सीमित नहीं रहना होगा, बल्कि उसे अपने कक्षा-कक्षों, परीक्षा हॉलों और प्रोफेसर-छात्र संबंधों में भी एक संवेदनशील, समावेशी और मानवीय क्रांति लानी होगी। सच्ची सुरक्षा दीवार पर लगे पंखे से नहीं, बल्कि उस भरोसे से पैदा होगी जहां हर छात्र यह महसूस कर सके कि विफलता के सबसे अंधेरे दौर में भी उसका संस्थान, उसके शिक्षक और उसके साथी उसके साथ खड़े हैं।



