अर्थव्यवस्थाराष्ट्रीय

पश्चिम बंगाल में चाय बागान श्रमिकों को दिवाली और काली पूजा का बड़ा तोहफा

19,524 श्रमिकों के खातों में सीधे पहुंचेगी ₹5,000 की एकमुश्त सहायता

उत्तर बंगाल की हरी-भरी वादियों, तराई और डुआर्स के चाय बागानों में हाड़-तोड़ मेहनत करने वाले हजारों मेहनतकश श्रमिकों के चेहरों पर आगामी रोशनी के त्योहार दीपावली और आस्था के महापर्व काली पूजा से पहले एक नई चमक लौट आई है। पश्चिम बंगाल सरकार ने उत्तर बंगाल के चाय अंचल में लंबे समय से आर्थिक संकट और आजीविका की अनिश्चितता से जूझ रहे चाय बागान श्रमिकों के लिए एक विशेष राहत पैकेज की घोषणा की है। राज्य सरकार द्वारा सिलीगुड़ी स्थित मिनी सचिवालय ‘उत्तरकन्या’ में आयोजित एक उच्चस्तरीय प्रशासनिक समीक्षा बैठक के दौरान यह निर्णय लिया गया कि राज्य के 19,524 पंजीकृत चाय बागान श्रमिकों को पांच-पांच हजार रुपये की एकमुश्त वित्तीय सहायता सीधे उनके बैंक खातों में प्रदान की जाएगी। इस कल्याणकारी कदम पर राज्य के राजकोष से कुल नौ करोड़ छिहत्तर लाख रुपये का वित्तीय भार आएगा, जिसे त्योहारों की औपचारिक शुरुआत से ठीक पहले लाभार्थियों के खातों में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से अंतरित कर दिया जाएगा।
इस तात्कालिक वित्तीय राहत के साथ ही राज्य सरकार ने चाय बागानों में रहने वाले गरीब परिवारों की दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा को मजबूती प्रदान करने के लिए एक दूरगामी नीतिगत सुधार का खाका भी प्रस्तुत किया है। वर्तमान में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत चाय श्रमिकों को मिलने वाले 35 किलोग्राम मासिक रियायती चावल के कोटे को बढ़ाकर सीधे 50 किलोग्राम प्रति माह करने की योजना पर काम शुरू कर दिया गया है। इस संबंध में अधिकारियों को रूपरेखा तैयार करने के निर्देश दिए जा चुके हैं और उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले नए साल यानी जनवरी से इस बढ़ी हुई मात्रा का वितरण पूरे राज्य के चाय बागानों में शुरू कर दिया जाएगा। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि खाद्यान्न कोटे में होने वाली इस बढ़ोतरी का लाभ केवल चालू बागानों के श्रमिकों तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि संकटग्रस्त, विवादित या मालिकों द्वारा छोड़ दिए जाने के कारण बंद पड़े चाय बागानों के श्रमिकों और उनके परिवारों को भी इसके दायरे में पूरी तरह शामिल किया जाएगा।
उत्तरकन्या में आयोजित इस महत्वपूर्ण प्रशासनिक बैठक में उत्तर बंगाल के सभी प्रमुख जिलों दार्जिलिंग, कलिम्पोंग, जलपाईगुड़ी और अलीपुरद्वार के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी, श्रम विभाग के प्रतिनिधि और जन कल्याण से जुड़ी विभिन्न एजेंसियों के प्रमुख मौजूद थे। बैठक में चाय उद्योग की वर्तमान स्थिति, पत्तियों की तुड़ाई के सीजन, मजदूरी भुगतान और आगामी त्योहारों के दौरान श्रमिकों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर गहन चर्चा की गई। बैठक को संबोधित करते हुए नेतृत्व ने खुलकर स्वीकार किया कि प्रारंभिक योजना के तहत चाय बागान श्रमिकों को इससे भी बड़ी आर्थिक सहायता देने पर विचार चल रहा था, किंतु राज्य के वित्तीय संसाधनों और बजट की मौजूदा सीमाओं को देखते हुए फिलहाल प्रति श्रमिक ₹5,000 की राशि निर्धारित की गई है। यह सुनिश्चित किया गया है कि किसी भी बिचौलिए, ठेकेदार या यूनियन स्तर पर कटौती के बिना यह राशि सीधे श्रमिकों के आधार-लिंक्ड बैंक खातों में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) के जरिए पहुंचेगी। इसके लिए श्रम विभाग और स्थानीय जिला प्रशासनों को 48 घंटे के भीतर सभी 19,524 चयनित लाभार्थियों की बैंक सूचियों का शत-प्रतिशत सत्यापन पूरा करने के कड़े निर्देश जारी किए गए हैं।
पश्चिम बंगाल की अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक पहचान में चाय उद्योग का स्थान हमेशा से विशिष्ट रहा है, किंतु हाल के दशकों में यह क्षेत्र कई गंभीर संरचनात्मक चुनौतियों से दो-चार रहा है। दार्जिलिंग की विश्वप्रसिद्ध ऑर्थोडॉक्स चाय हो या तराई-डुआर्स की कड़क सीटीसी चाय, वैश्विक बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव, जलवायु परिवर्तन के कारण पत्तियों के उत्पादन में आई गिरावट, कीटनाशकों के कड़े अंतरराष्ट्रीय मानकों और बागान मालिकों की वित्तीय देनदारियों ने उद्योग पर भारी दबाव डाला है। इसके परिणामस्वरूप कई बागानों में उत्पादन ठप हो गया, कुछ मामलों में प्रबंधन ने बागानों पर ताला जड़ दिया और कई बागान दिवालियापन की कानूनी प्रक्रियाओं में उलझ गए। इन विषम परिस्थितियों का सबसे दुखद और सीधा असर वहां पीढ़ियों से काम कर रहे आदिवासी और गोरखा समुदाय के चाय श्रमिकों पर पड़ा। नियमित मजदूरी बंद हो जाने, भविष्य निधि और ग्रेच्युटी का पैसा अटक जाने तथा मुफ्त राशन व चिकित्सा जैसी अनिवार्य सुविधाओं के बंद होने से हजारों परिवारों के सामने भुखमरी और पलायन का संकट खड़ा हो गया था।
ऐसे समय में राज्य सरकार द्वारा त्योहारों के मुहाने पर घोषित की गई यह ₹5,000 की एकमुश्त सहायता इन श्रमिक परिवारों के लिए एक बहुत बड़ा संबल बनकर उभरी है। दीपावली, काली पूजा और इसके बाद आने वाले छठ पर्व के दौरान इन ग्रामीण क्षेत्रों में पारिवारिक खर्च कई गुना बढ़ जाते हैं। नए कपड़े, पूजा की सामग्री, घर की मरम्मत और बच्चों की जरूरतों को पूरा करने के लिए श्रमिकों को अक्सर स्थानीय सूदखोरों या महाजनों से ऊंचे ब्याज पर कर्ज लेने के लिए विवश होना पड़ता था। सरकार के इस कदम से न केवल लगभग बीस हजार परिवारों को सूदखोरों के चंगुल में फंसने से बचाया जा सकेगा, बल्कि स्थानीय हाट-बाजारों में भी धन का प्रवाह होगा, जिससे छोटे दुकानदारों और व्यापारियों को भी आर्थिक गति मिलेगी।
वित्तीय सहायता से भी अधिक महत्वपूर्ण वह घोषणा मानी जा रही है, जो श्रमिकों की थाली और पोषण सुरक्षा से सीधे तौर पर जुड़ी है। उत्तर बंगाल के चाय बागानों में कुपोषण और एनीमिया की समस्या ऐतिहासिक रूप से एक बड़ी चुनौती रही है। बागान श्रमिकों के लिए सस्ता खाद्यान्न हमेशा से उनके वेज-पैकेज का अभिन्न अंग रहा है, किंतु 35 किलोग्राम का मौजूदा मासिक कोटा बड़े परिवारों के लिए नाकाफी साबित होता था। राशन का कोटा समाप्त होने के बाद परिवारों को खुले बाजार से महंगे दामों पर घटिया चावल खरीदने के लिए अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा खर्च करना पड़ता था। अब सरकार द्वारा इसे बढ़ाकर सीधे 50 किलोग्राम करने के फैसले से प्रति परिवार प्रतिमाह 15 किलोग्राम अतिरिक्त चावल उपलब्ध होगा। यह 42 प्रतिशत से अधिक की भारी वृद्धि है, जो यह सुनिश्चित करेगी कि चाय बागान के किसी भी चूल्हे में अनाज की कमी के कारण आग न बुझे।
विशेष रूप से बंद पड़े चाय बागानों के संदर्भ में यह निर्णय एक संजीवनी की तरह देखा जा रहा है। जब कोई चाय बागान बंद होता है, तो वहां के श्रमिक सबसे ज्यादा असहाय हो जाते हैं क्योंकि उनके पास आय का कोई दूसरा विकल्प नहीं होता। कई बागानों में श्रमिक वैकल्पिक मजदूरी की तलाश में नदी किनारे पत्थर तोड़ने या दूसरे राज्यों में भवन निर्माण कार्यों में पलायन करने को मजबूर होते हैं। सरकार ने इस नीतिगत निर्णय में बंद और चालू बागानों के बीच का भेद समाप्त करते हुए दोनों वर्गों के श्रमिकों को समान रूप से 50 किलोग्राम चावल देने की बात कही है। खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग को निर्देश दिया गया है कि वह बंद बागानों के समीप स्थित उचित दर की दुकानों (फेयर प्राइस शॉप्स) में खाद्यान्न का पर्याप्त बफर स्टॉक सुनिश्चित करे और परिवहन व वितरण तंत्र को इस प्रकार दुरुस्त करे कि जनवरी माह के पहले सप्ताह से ही प्रत्येक पात्र कार्डधारक को अपना पूरा कोटा सुगमता से मिल सके।
प्रशासनिक बैठक के दौरान चाय बागानों के पुनरुद्धार और बंद पड़े एस्टेट्स को फिर से चालू कराने की व्यापक रणनीति पर भी गंभीरता से विचार-विमर्श हुआ। सरकार ने श्रम मंत्री को व्यक्तिगत रूप से यह दायित्व सौंपा है कि वे बागान मालिकों, चाय उद्योग संघों (जैसे टीएआई और डीबीआईटीए), श्रमिक यूनियनों और वित्तीय संस्थाओं के साथ त्रिपक्षीय वार्ता का नया दौर शुरू करें। सरकार का मानना है कि केवल सरकारी सहायता या राहत पैकेज के सहारे चाय बागानों का स्थायी भविष्य तय नहीं किया जा सकता; अंतिम समाधान तभी निकलेगा जब बंद बागानों के गेट दोबारा खुलेंगे, कारखानों के सायरन बजेंगे और हरी पत्तियों की तुड़ाई का नियमित चक्र पटरी पर लौटेगा। इसके साथ ही बागान क्षेत्रों में मनरेगा के जॉब कार्ड्स का नवीनीकरण करने और केंद्र सरकार की ‘प्रधानमंत्री चाय श्रमिक योजना’ के अंतर्गत मिलने वाले सामाजिक सुरक्षा लाभों को धरातल पर शत-प्रतिशत लागू करने पर भी बल दिया गया है।
सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से भी यह घोषणा बेहद अहम मानी जा रही है। उत्तर बंगाल के जिलों में चाय बागान श्रमिक केवल एक श्रम बल नहीं हैं, बल्कि वे इस पूरे क्षेत्र के सामाजिक ताने-बाने, संस्कृति और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की रीढ़ हैं। पिछले कुछ वर्षों में न्यूनतम मजदूरी को वैधानिक रूप देने, चाय बागान की जमीन पर श्रमिकों को मालिकाना हक यानी भूमि का पट्टा दिलाने और बंद बागानों के स्थायी समाधान को लेकर विभिन्न श्रमिक संगठनों ने कई बार आंदोलन और प्रदर्शन किए हैं। त्योहारी मौसम में घोषित इस दोहरे कल्याणकारी पैकेज से चाय अंचल में उपजे लंबे तनाव और असंतोष को शांत करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
यूनियन प्रतिनिधियों और स्थानीय नागरिक समाज ने सरकार के इस कदम का व्यापक स्वागत किया है, हालांकि साथ ही यह मांग भी उठाई है कि इस राहत का दायरा आने वाले समय में उत्तर बंगाल के उन अन्य छोटे चाय उत्पादकों (स्मॉल टी ग्रोअर्स) और असंगठित दिहाड़ी मजदूरों तक भी बढ़ाया जाना चाहिए जो किसी औपचारिक सूची में दर्ज नहीं हैं। इसके अलावा श्रमिकों के लिए स्थायी आवास, शुद्ध पेयजल की पाइपलाइन, बागान क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का आधुनिकीकरण और स्थानीय स्कूलों में बेहतर शिक्षा सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग को भी एक बार फिर दोहराया गया है। सरकार की ओर से यह भी संकेत दिया गया है कि कलिम्पोंग और आसपास के पहाड़ी अंचलों में स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे को सुदृढ़ करने के लिए आगामी महीनों में नए मेडिकल कॉलेज और विशेष अस्पतालों की नींव रखी जाएगी।
दीपावली की पूर्व संध्या पर पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा लिया गया यह निर्णय इस बात का परिचायक है कि जब शासन की नीतियां समाज के सबसे अंतिम पायदान पर खड़े कामगारों की वास्तविक पीड़ा को केंद्र में रखकर बनाई जाती हैं, तो वे उत्सवों के मायने बदल देती हैं। 19,524 चाय बागान श्रमिकों के बैंक खातों में पहुंचने वाली ₹5,000 की सीधी सहायता और नए साल से शुरू होने वाली 50 किलो चावल की पोषण सुरक्षा निश्चित रूप से दार्जिलिंग की पहाड़ियों और डुआर्स के जंगलों में बसे इन मेहनतकश परिवारों के घरों में न केवल दीपकों की रोशनी बिखेरेगी, बल्कि उनके जीवन में भविष्य के प्रति एक नया विश्वास और संबल भी जगाएगी।

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