
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में लगातार गहराते वायु प्रदूषण और जहरीली धुंध की मोटी चादर के बीच हरियाणा सरकार और गुरुग्राम जिला प्रशासन ने आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने के लिए अभूतपूर्व और कड़े प्रशासनिक कदम उठाए हैं। वायु गुणवत्ता सूचकांक के खतरनाक स्तर पर पहुंचने, वातावरण में सूक्ष्म कणों के जमाव और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर मंडराते गंभीर खतरे को देखते हुए जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण तथा उपायुक्त कार्यालय ने मंगलवार शाम एक विस्तृत आदेश जारी किया है। इस नए आदेश के अंतर्गत पांच नवंबर से जिले में स्थित सभी सरकारी कार्यालयों, निजी कंपनियों, बहुराष्ट्रीय निगमों और सूचना प्रौद्योगिकी संस्थानों के लिए पचास प्रतिशत कर्मचारियों को घर से कार्य कराने यानी वर्क फ्रॉम होम की व्यवस्था अनिवार्य रूप से लागू करने का निर्देश दिया गया है। इसके साथ ही हवा में धूल के कणों को नियंत्रित करने के उद्देश्य से जिले की सीमा के भीतर चल रही सभी प्रकार की निर्माण और ध्वस्तीकरण गतिविधियों पर बीस नवंबर तक के लिए पूर्ण पाबंदी लगा दी गई है। हालांकि, आवश्यक सार्वजनिक अवसंरचना, जनस्वास्थ्य और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण परियोजनाओं को बेहद सख्त पर्यावरणीय निगरानी के साथ इस प्रतिबंध से छूट दी गई है, किंतु आम नागरिकों, बिल्डरों और औद्योगिक इकाइयों को स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि नियमों की थोड़ी सी भी अनदेखी पाए जाने पर सीधे विधिक कार्रवाई और भारी जुर्माना लगाया जाएगा।
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में प्रत्येक वर्ष अक्टूबर के अंतिम सप्ताह और नवंबर के शुरुआती पखवाड़े में मौसम के प्रतिकूल बदलाव के चलते वायु प्रदूषण गंभीर संकट का रूप धारण कर लेता है। उत्तर भारत में तापमान में आ रही गिरावट, हवा की बेहद धीमी गति, पश्चिमी विक्षोभ की निष्क्रियता और वायुमंडलीय दबाव के कारण हवा की ऊपरी परत में एक इनवर्जन लेयर बन जाती है। यह परत जमीन के समीप उठने वाले धुएं, धूल और विभिन्न गैसों को वायुमंडल में ऊपर जाने से रोकती है, जिसके परिणामस्वरूप पूरी घाटी एक विशाल गैस चैंबर में तब्दील हो जाती है। पिछले कई दिनों से गुरुग्राम और आसपास के इलाकों में सुबह और शाम के समय दृश्यता घटकर कुछ सौ मीटर रह गई है और वायु गुणवत्ता सूचकांक चार सौ के खतरनाक आंकड़े को पार करने की कगार पर पहुंच चुका है। पर्यावरण विशेषज्ञों और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार, इस प्रदूषण में वाहनों से निकलने वाली जहरीली गैसों, विशेष रूप से नाइट्रोजन ऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड, तथा निर्माण स्थलों से उड़ने वाली महीन धूल का योगदान सबसे अधिक पाया गया है। इसी वैज्ञानिक निष्कर्ष के आधार पर प्रशासन ने सबसे पहले वाहनों के आवागमन को आधा करने और निर्माण गतिविधियों को पूरी तरह रोकने की दोहरी रणनीति अपनाई है।
गुरुग्राम को देश की मिलेनियम सिटी और उत्तर भारत का सबसे बड़ा सूचना प्रौद्योगिकी एवं कॉर्पोरेट हब माना जाता है। यहां स्थित साइबर सिटी, उद्योग विहार, गोल्फ कोर्स रोड, गोल्फ कोर्स एक्सटेंशन, सोहना रोड और मानेसर औद्योगिक क्षेत्र में देश-विदेश की अग्रणी सॉफ्टवेयर, वित्तीय, ऑटोमोबाइल और परामर्शदाता कंपनियों के वैश्विक कार्यालय स्थित हैं। एक सामान्य कार्यदिवस में इन वाणिज्यिक परिसरों में लगभग आठ से दस लाख पेशेवर काम करने पहुंचते हैं। इनमें से एक बहुत बड़ा हिस्सा निजी कारों, कैब और दोपहिया वाहनों के जरिए दिल्ली, फरीदाबाद, नोएडा और गाजियाबाद जैसे पड़ोसी शहरों से रोजाना यात्रा करता है। वाहनों के इस भारी रेले के कारण दिल्ली-गुरुग्राम एक्सप्रेसवे, महरौली-गुरुग्राम रोड, सोहना एलिवेटेड कॉरिडोर और सरहौल बॉर्डर पर घंटों लंबा ट्रैफिक जाम लगना आम बात है। इन जामों में रेंगते वाहनों से निकलने वाला उत्सर्जन स्थानीय हवा को अत्यंत विषाक्त बना देता है।
प्रशासन द्वारा पांच नवंबर से पचास प्रतिशत वर्क फ्रॉम होम लागू करने के निर्णय का प्राथमिक उद्देश्य इसी सड़कों पर लगने वाले भारी ट्रैफिक दबाव को तत्काल प्रभाव से समाप्त करना है। आदेश के तहत सभी निजी प्रतिष्ठानों को निर्देश दिया गया है कि वे अपने कुल कार्यबल को दो हिस्सों में विभाजित करें और आंतरिक रोटेशन रोस्टर तैयार करें, ताकि एक समय में केवल पचास प्रतिशत कर्मचारी ही भौतिक रूप से कार्यालय परिसर में उपस्थित रहें, जबकि शेष पचास प्रतिशत कर्मचारी घर से डिजिटल माध्यम से अपने दायित्वों का निर्वहन करें। सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग के शीर्ष संगठन नैसकॉम और गुरुग्राम की विभिन्न कॉर्पोरेट वेलफेयर एसोसिएशनों ने इस फैसले का स्वागत करते हुए प्रशासन को पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया है। अधिकांश बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने मानव संसाधन विभागों को निर्देश दे दिए हैं कि वे हाइब्रिड मॉडल को तुरंत सक्रिय करें ताकि कामकाज में किसी प्रकार का व्यवधान पैदा न हो और साथ ही सड़कों पर निजी वाहनों की आवाजाही में कम से कम चालीस से पचास प्रतिशत की कमी लाई जा सके।
निजी क्षेत्र के साथ-साथ यह व्यवस्था जिले के सभी राज्य और केंद्र सरकार के प्रशासनिक कार्यालयों, स्वायत्त निकायों, नगर निगमों और बोर्डों पर भी समान रूप से लागू की गई है। उपायुक्त ने स्पष्ट किया है कि केवल वही विभाग और कर्मचारी इस नियम से बाहर रहेंगे जो कानून-व्यवस्था, आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएं, अग्निशमन, आपदा राहत, जलापूर्ति, सीवरेज प्रबंधन और बिजली आपूर्ति जैसी चौबीसों घंटे चलने वाली आवश्यक जनसुविधाओं से सीधे जुड़े हुए हैं। सामान्य प्रशासनिक और लिपिकीय कार्यों से जुड़े सरकारी विभागों में अधिकारियों और कर्मचारियों को रोटेशन के आधार पर बुलाया जाएगा। सरकारी तंत्र में कामकाज की गति को बनाए रखने के लिए डिजिटल फाइल ट्रैकिंग और ई-ऑफिस प्रणाली का उपयोग अनिवार्य कर दिया गया है। अधिकारियों का मानना है कि सरकारी और निजी दोनों स्तरों पर एक साथ उठाए गए इस कदम से न केवल सड़कों पर डीजल और पेट्रोल से चलने वाले वाहनों की संख्या घटेगी, बल्कि सार्वजनिक परिवहन पर भी भीड़ का अवांछित दबाव कम होगा, जिससे वायु प्रदूषण के स्थानीय हॉटस्पॉट्स में त्वरित सुधार देखने को मिलेगा।
वाहन उत्सर्जन पर लगाम कसने के समानांतर प्रशासन का दूसरा सबसे कठोर प्रहार निर्माण और विध्वंस गतिविधियों पर हुआ है। सर्दियों के महीनों में हवा में तैरने वाले पीएम 2.5 और पीएम 10 कणों में से लगभग तीस प्रतिशत हिस्सेदारी खुले में होने वाले निर्माण कार्यों और तोड़फोड़ से उड़ने वाली धूल की होती है। हवा में नमी अधिक होने के कारण यह धूल जमीन के पास तैरती रहती है और सांस के जरिए सीधे फेफड़ों में पहुंचकर गंभीर बीमारियों को जन्म देती है। इसी खतरे को कुचलने के लिए जिले में बीस नवंबर तक सभी प्रकार की गैर-जरूरी निर्माण गतिविधियों पर पूर्ण ताला लगा दिया गया है। इस रोक के दायरे में आवासीय मकानों, विला, बहुमंजिला सोसायटियों, निजी व्यावसायिक परिसरों, मॉल, गोदामों, निजी भूखंडों पर खुदाई, बोरिंग, सड़क निर्माण, प्लास्टर, टाइल कटिंग, वेल्डिंग और पुरानी इमारतों को ढहाने के तमाम कार्य शामिल हैं। बिल्डरों और ठेकेदारों को अपनी साइटों पर निर्माण सामग्री जैसे रेत, बजरी, सीमेंट और मिट्टी के खुले ढेर तत्काल प्रभाव से त्रिस्तरीय ग्रीन नेट या तिरपाल से पूरी तरह ढकने के आदेश दिए गए हैं ताकि तेज हवाओं के साथ धूल उड़कर वायुमंडल में न फैले।
इस सख्त प्रतिबंध के बीच प्रशासन ने जनहित और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी कुछ अत्यंत आवश्यक बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को सीमित और कड़ी शर्तों के आधार पर छूट प्रदान की है। इस छूट के अंतर्गत दिल्ली-गुरुग्राम मेट्रो विस्तार परियोजना, क्षेत्रीय त्वरित पारगमन प्रणाली यानी आरआरटीएस कॉरिडोर, राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण द्वारा संचालित रणनीतिक एक्सप्रेसवे, बड़े सरकारी सुपर स्पेशियलिटी अस्पतालों के आपातकालीन विंग का निर्माण और सैन्य व रक्षा प्रतिष्ठानों से जुड़े निर्माण कार्य शामिल हैं। हालांकि, प्रशासन ने साफ कर दिया है कि इन छूट प्राप्त परियोजनाओं को भी काम करने का अधिकार तभी होगा जब वे धूल नियंत्रण के सभी चौदह अनिवार्य वैज्ञानिक मानकों का मौके पर अक्षरशः पालन करेंगी। इन साइटों पर चौबीसों घंटे उच्च क्षमता वाली एंटी-स्मॉग गनों का संचालन, स्वचालित वाटर मिस्ट स्प्रिंकलर्स के जरिए लगातार पानी का छिड़काव, निर्माण मलबे को पूरी तरह ढककर रखना, साइट से बाहर निकलने वाले सभी भारी ट्रकों और डंपरों के पहियों को धोने के लिए वाशिंग बे का अनिवार्य उपयोग और हवा में तैरने वाले कणों की निगरानी के लिए लाइव पीएम सेंसर लगाना अनिवार्य किया गया है। यदि किसी छूट प्राप्त साइट पर भी धूल उड़ती पाई गई, तो उसका विशेष परमिट तुरंत रद्द कर दिया जाएगा।
आदेशों को केवल कागजों तक सीमित न रखकर धरातल पर प्रभावी बनाने के लिए प्रशासन ने एक त्रिस्तरीय सघन प्रवर्तन तंत्र की स्थापना की है। हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, गुरुग्राम नगर निगम, मानेसर नगर निगम, गुरुग्राम महानगर विकास प्राधिकरण और जिला पुलिस की संयुक्त सदस्यता वाले पच्चीस विशेष उड़नदस्तों का गठन किया गया है। इन उड़नदस्तों को उपमंडल मजिस्ट्रेटों और पर्यावरण अभियंताओं के नेतृत्व में तैनात किया गया है, जो दिन और रात के समय जिले के विभिन्न हिस्सों में औचक निरीक्षण करेंगे। इन टीमों को विशेष रूप से द्वारका एक्सप्रेसवे बेल्ट, न्यू गुरुग्राम के सेक्टर, सोहना रोड, पटौदी रोड और मानेसर औद्योगिक कॉरिडोर में गश्त करने के निर्देश दिए गए हैं, जहां वर्तमान में सैकड़ों बड़े रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स प्रगति पर हैं। इसके अतिरिक्त रात के अंधेरे में होने वाले अवैध निर्माण और कचरा जलाने की घटनाओं को पकड़ने के लिए थर्मल कैमरों से लैस निगरानी ड्रोनों का उपयोग शुरू किया जा रहा है।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने औद्योगिक क्षेत्रों और रिहायशी सोसायटियों में डीजल से चलने वाले जनरेटर सेटों के अनियंत्रित इस्तेमाल पर भी सख्त निगरानी बैठा दी है। दिल्ली-एनसीआर में लागू ग्रैप नियमों के अनुसार सभी प्रकार के वाणिज्यिक, औद्योगिक और आवासीय परिसरों में नियमित बिजली की अनुपलब्धता के दौरान सामान्य कार्यों के लिए डीजी सेट चलाने पर पूर्ण रोक है। केवल अस्पतालों, नर्सिंग होम, लिफ्ट संचालन, आपातकालीन अग्निशमन और आवश्यक जलापूर्ति के लिए ही हाइब्रिड या स्वीकृत मानकों वाले जनरेटरों के सीमित इस्तेमाल की अनुमति है। दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम को निर्देश दिए गए हैं कि वह सभी रिहायशी सोसायटियों और औद्योगिक पार्कों में चौबीसों घंटे निर्बाध विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करे, ताकि किसी भी स्थिति में बैकअप के नाम पर डीजल जनरेटर चलाने की नौबत न आए। यदि किसी सोसाइटी या मॉल में अनावश्यक रूप से डीजी सेट से काला धुआं निकलता पाया गया, तो प्रबंधन के खिलाफ सीधे दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।
कानूनी प्रावधानों की दृष्टि से प्रशासन ने उल्लंघनकर्ताओं से निपटने के लिए बेहद कड़ा रुख अख्तियार किया है। जिला प्रशासन ने इन प्रतिबंधों को पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986, वायु प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण अधिनियम 1981 तथा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 133 के अंतर्गत कानूनी आदेश के रूप में अधिसूचित किया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि आदेश की अवहेलना करने वाले किसी भी व्यक्ति, बिल्डर, ठेकेदार या कॉर्पोरेट प्रबंधक के खिलाफ केवल सामान्य प्रशासनिक चेतावनी जारी नहीं होगी, बल्कि उनके खिलाफ आपराधिक धाराओं में पुलिस प्राथमिकी दर्ज कराई जाएगी। पहली बार नियमों का उल्लंघन करने वाली निर्माण साइटों पर पांच लाख से लेकर पच्चीस लाख रुपये तक का पर्यावरणीय मुआवजा लगाया जाएगा और साइट को तुरंत सील कर दिया जाएगा। बार-बार उल्लंघन करने वाले प्रतिष्ठानों के बिजली और पानी के कनेक्शन काटने के साथ-साथ उनके व्यावसायिक लाइसेंस और नगर निगम की स्वीकृतियों को रद्द करने की संस्तुति की जाएगी।
इस प्रशासनिक सख्ती के बीच जिले के स्वास्थ्य विभाग ने भी बिगड़ती आबोहवा को देखते हुए एक विस्तृत मेडिकल एडवाइजरी जारी की है। मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने सभी सरकारी और निजी अस्पतालों को सांस संबंधी बीमारियों, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और हृदय रोगों के मरीजों के लिए विशेष ओपीडी और आपातकालीन बेड आरक्षित रखने के निर्देश दिए हैं। डॉक्टरों का कहना है कि हवा में सूक्ष्म कणों की मात्रा अत्यधिक बढ़ने से बुजुर्गों, छोटे बच्चों और पहले से फेफड़ों की बीमारी से पीड़ित लोगों के लिए घर से बाहर निकलना जानलेवा साबित हो सकता है। विशेष रूप से सुबह और शाम के समय जब हवा में स्मॉग का घनत्व सबसे अधिक होता है, नागरिकों को पार्क में टहलने, दौड़ने या किसी भी प्रकार का भारी व्यायाम करने से पूरी तरह बचने की सलाह दी गई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने नागरिकों से अपील की है कि वे बाहर निकलते समय अनिवार्य रूप से एन-95 या समकक्ष सुरक्षा वाले मास्क का उपयोग करें, घरों के भीतर धूल को रोकने के उपाय करें और आंखों में जलन या सांस लेने में तकलीफ होने पर बिना देरी किए चिकित्सकीय परामर्श लें।
गुरुग्राम के उपायुक्त ने जिले के सभी प्रबुद्ध नागरिकों, सामाजिक संगठनों और रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशनों से इस असाधारण संकट की घड़ी में एक जिम्मेदार नागरिक की भूमिका निभाने का आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि वायु प्रदूषण किसी एक विभाग या सरकार की अकेली लड़ाई नहीं है, बल्कि यह हर एक व्यक्ति के जीवन और आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य से जुड़ा साझा सरोकार है। यदि नागरिक निजी वाहनों का उपयोग कम करके कारपूलिंग और सार्वजनिक परिवहन को अपनाएं, अपने घरों के आसपास धूल पर पानी का छिड़काव करें और किसी भी प्रकार के सूखे पत्तों या प्लास्टिक के कचरे को जलाने से बचें, तो स्थिति को बिगड़ने से रोका जा सकता है। नागरिकों की सुविधा के लिए एक चौबीसों घंटे संचालित होने वाला जिला स्तरीय कंट्रोल रूम और ग्रीन हरियाणा मोबाइल ऐप भी सक्रिय किया गया है, जहां कोई भी व्यक्ति प्रदूषण फैलाने वाली गतिविधियों की जियो-टैग्ड तस्वीर सीधे अपलोड कर सकता है, जिस पर संबंधित प्रवर्तन दल को दो घंटे के भीतर मौके पर पहुंचकर कार्रवाई करनी होगी।
गुरुग्राम में पांच नवंबर से लागू होने जा रहा पचास प्रतिशत वर्क फ्रॉम होम और बीस नवंबर तक निर्माण गतिविधियों पर लगाया गया पूर्ण प्रतिबंध इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में प्रदूषण की स्थिति अब केवल एक मौसमी असुविधा नहीं, बल्कि एक गंभीर स्वास्थ्य आपातकाल का रूप ले चुकी है। आने वाले पंद्रह से बीस दिन पूरे एनसीआर के लिए अग्निपरीक्षा के समान होंगे, क्योंकि इस दौरान हवा की रफ्तार में और अधिक गिरावट आने की संभावना है। अब यह देखना अत्यंत महत्वपूर्ण होगा कि कॉर्पोरेट जगत, रियल एस्टेट उद्योग और आम नागरिक प्रशासन के इन आपातकालीन आदेशों पर किस हद तक ईमानदारी से अमल करते हैं, क्योंकि नियमों का कड़ाई से पालन ही मिलेनियम सिटी को जहरीली हवा के इस दमघोंटू शिकंजे से बाहर निकालने का एकमात्र व्यावहारिक रास्ता है।



