निवेशराज्यस्वास्थ्य
रासायनिक खादों और कीटनाशकों के महंगे चक्रव्यूह से मुक्त हो रहे किसान
₹2,481 करोड़ के 'राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन' (NMNF) से संवर रही बुंदेलखंड की माटी

उत्तर प्रदेश के सूखाग्रस्त, पथरीले और ऐतिहासिक रूप से चुनौतीपूर्ण बुंदेलखंड अंचल में स्थित धर्मनगरी चित्रकूट का किसान आज केवल जीवन-यापन के लिए संघर्ष नहीं कर रहा, बल्कि वह भारतीय कृषि के भविष्य की एक नई, हरित और स्वावलंबी इबारत लिख रहा है। बाजार में मिलने वाली रासायनिक खादों (यूरिया, डीएपी, पोटाश) और महंगे कीटनाशकों (Pesticides) की आसमान छूती कीमतों, नकली कृषि रसायनों के बढ़ते प्रकोप और लगातार बंजर होती मिट्टी की समस्या से त्रस्त होकर चित्रकूट के हजारों किसान तेजी से पारंपरिक, देसी गोवंश-आधारित और रसायन-मुक्त प्राकृतिक खेती (Natural Farming) को गले लगा रहे हैं।
इस जमीनी परिवर्तन को केंद्र सरकार द्वारा ₹2,481 करोड़ के कुल वित्तीय परिव्यय के साथ शुरू किए गए राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (National Mission on Natural Farming – NMNF) से अभूतपूर्व तकनीकी, संस्थागत और वित्तीय संबल मिला है। इस मिशन के अंतर्गत चित्रकूट जनपद के सुदूरवर्ती गांवों में ग्राम पंचायत स्तर पर क्लस्टर बनाकर किसानों को बीजामृत, जीवामृत, घनजीवामृत और प्राकृतिक कीट नियंत्रक तैयार करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
शुरुआती दौर में रासायनिक खादों के हटने से पैदावार में मामूली कमी (Yield Dip) आने के बावजूद, इनपुट लागत में 60 से 70 प्रतिशत की भारी गिरावट, पानी की 30 से 50 प्रतिशत बचत और रसायन-मुक्त उपज के बेहतर बाजार भाव के कारण किसानों का शुद्ध मुनाफा (Net Profit) रासायनिक खेती की तुलना में काफी बढ़ रहा है। यह पहल न केवल बुंदेलखंड की बंजर होती मिट्टी में जैविक कार्बन (Soil Organic Carbon) लौटा रही है, बल्कि जलवायु परिवर्तन और सूखे की मार झेल रहे इस क्षेत्र में जलवायु अनुकूलन (Climate Resilience) की सबसे मजबूत ढाल बनकर उभर रही है।
पिछले दो दशकों में ‘हरित क्रांति’ के अंधाधुंध अनुकरण के चलते चित्रकूट के किसानों ने भी फसलों की अधिक पैदावार के लालच में यूरिया और डीएपी (DAP) का भारी इस्तेमाल शुरू कर दिया था। परिणाम यह हुआ कि एक बोरी यूरिया से शुरू हुआ सफर प्रति एकड़ तीन से चार बोरियों तक पहुंच गया। खरीफ और रबी के मौसम में जब खाद की किल्लत होती थी, तो किसानों को आढ़तियों और कालाबाजारियों से ऊंचे दामों पर उर्वरक खरीदने पड़ते थे। कीटनाशकों के महंगे छिड़काव के बाद भी जब अचानक सूखा पड़ता या ओले गिरते, तो किसान की पूरी लागत डूब जाती थी और वह सूदखोरों या बैंकों के कर्ज में फंस जाता था।
चित्रकूट की मिट्टी मुख्य रूप से लाल-काली (रांकर, मार और काबर) प्रकृति की है। रासायनिक उर्वरकों के लगातार उपयोग से मिट्टी का सूक्ष्मजीव पारिस्थितिकी तंत्र (Microbial Ecosystem) पूरी तरह नष्ट हो गया। प्राकृतिक रूप से मिट्टी की जुताई करने वाले किसान के सबसे बड़े मित्र यानी केंचुए (Earthworms) मिट्टी से गायब हो गए। जमीन इतनी सख्त हो गई कि बारिश का पानी जमीन के भीतर रिसने के बजाय सतह से बहकर निकल जाता था। किसानों ने महसूस किया कि जब तक मिट्टी को रासायनिक जहर से मुक्त नहीं किया जाएगा, तब तक खेती कभी टिकाऊ नहीं हो सकती।
25 नवंबर 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा ₹2,481 करोड़ के कुल बजट के साथ राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (NMNF) को एक स्वतंत्र केंद्रीय प्रायोजित योजना (Centrally Sponsored Scheme) के रूप में मंजूरी दी गई थी। चित्रकूट के कर्वी, मऊ, मानिकपुर, रामनगर और पहाड़ी ब्लॉकों में 50-50 हेक्टेयर के भौगोलिक क्लस्टर बनाए गए हैं। प्रत्येक क्लस्टर में उन सीमांत और छोटे किसानों को प्राथमिकता दी जा रही है जो स्वेच्छा से अपने खेतों को रासायनिक खाद से मुक्त करने का संकल्प लेते हैं। मिशन के तहत इन किसानों को दो वर्षों के लिए ₹4,000 प्रति एकड़ प्रति वर्ष का प्रत्यक्ष वित्तीय प्रोत्साहन (Incentive) डीबीटी (DBT) के माध्यम से उनके खातों में दिया जा रहा है, ताकि शुरुआत में पैदावार में होने वाले किसी भी संभावित नुकसान की भरपाई की जा सके।
प्राकृतिक खेती में सबसे बड़ी बाधा यह आती है कि जो किसान व्यस्त हैं या जिनके पास पशुधन की कमी है, वे रोजाना जीवामृत या कीटनाशक अर्क नहीं बना पाते। NMNF के तहत चित्रकूट में स्थानीय ग्रामीण उद्यमियों और किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) के माध्यम से बायो-इनपुट रिसोर्स सेंटर (BRC) स्थापित किए जा रहे हैं। इन केंद्रों पर ड्रमों में मानकीकृत विधि से बना हुआ ताजा जीवामृत, बीजामृत, नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र और अग्न्यास्त्र बेहद मामूली कीमत पर उपलब्ध कराया जाता है, जिससे प्राकृतिक इनपुट की आपूर्ति श्रृंखला बेहद सरल हो गई है।
दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM) के साथ समन्वय स्थापित कर चित्रकूट में स्वयं सहायता समूहों (SHGs) की महिला सदस्यों को ‘कृषि सखी’ (Krishi Sakhi) के रूप में प्रशिक्षित किया गया है। ये कृषि सखियां गांवों में चौपाल लगाकर किसानों को गोबर-गोमूत्र के सही अनुपात, गुड़ और बेसन के घोल के किण्वन (Fermentation) और कीट नियंत्रण के प्राकृतिक नुस्खे सिखा रही हैं। महिला शक्ति का यह जुड़ाव इस अभियान को एक सामाजिक आंदोलन का रूप दे रहा है।
प्राकृतिक खेती के विज्ञान ने यह सिद्ध कर दिया है कि एक देशी गाय (जैसे साहीवाल, थारपारकर, गिर या बुंदेलखंडी केनवार नस्ल) रोजाना 10-12 किलो गोबर और 5-8 लीटर गोमूत्र देती है, जो 30 एकड़ जमीन पर प्राकृतिक खेती करने के लिए पूरी तरह पर्याप्त है।
चित्रकूट के गांवों में अब किसान अनुत्पादक गायों को भी बोझ नहीं मान रहे हैं। कई किसान जिनके पास अपनी गाय नहीं है, वे गोशालाओं या पड़ोसियों से ₹5 प्रति लीटर गोमूत्र और ₹2 प्रति किलो गोबर खरीद रहे हैं। इससे निराश्रित गोवंश को एक ठोस आर्थिक उपयोगिता मिल गई है, जिससे अन्ना प्रथा पर स्वतः अंकुश लग रहा है।
चित्रकूट की धरती पर किसानों द्वारा प्राकृतिक खेती को अपनाना केवल एक कृषि तकनीक का बदलाव नहीं है, बल्कि यह आर्थिक स्वावलंबन, पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का एक अद्भुत संगम है। रासायनिक उर्वरकों की विशाल केंद्रीय सब्सिडी, विदेशी आयातों पर निर्भरता, भूजल के पाताल में जाने और कैंसर जैसी बीमारियों के बढ़ते संकट के बीच चित्रकूट के किसानों ने यह सिद्ध कर दिया है कि समाधान प्रयोगशालाओं में नहीं, बल्कि हमारी पारंपरिक जड़ों और प्रकृति के शाश्वत नियमों में निहित है।
₹2,481 करोड़ के राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (NMNF) ने इस परिवर्तन को जो गति और संस्थागत संरक्षण दिया है, उसने चित्रकूट को बुंदेलखंड के बंजर पठार से निकालकर टिकाऊ कृषि के एक अंतरराष्ट्रीय मॉडल के रूप में स्थापित कर दिया है। जब किसान अपनी लागत घटाकर मिट्टी की सेहत सुधारता है, जहर-मुक्त अन्न पैदा करता है और अपनी फसलों को सूखे की मार से बचाने में सक्षम बनता है, तो वह केवल अपनी तकदीर नहीं बदलता, बल्कि वह राष्ट्र के अन्नदाता होने के अपने गौरव को पुनः पुनर्स्थापित करता है।
चित्रकूट के खेतों से उठी यह सुगंध आने वाले वर्षों में पूरे भारत की कृषि नीति और दिशा को एक नई, सुरक्षित और समृद्ध दिशा प्रदान करेगी।



