सुरक्षा, आज़ादी और सम्मान के लिए सड़कों पर उतरीं छात्राएं
SPM कॉलेज से पंजाबी बाग थाने तक 'विमेंस सेफ्टी मार्च'; आस्था कुंज पार्क कांड के खिलाफ गूंजी जवाबदेही की मांग

देश की राजधानी में महिलाओं के खिलाफ लगातार हो रहे अपराधों, सार्वजनिक स्थलों पर असुरक्षा के माहौल और संस्थागत उदासीनता के विरोध में छात्राओं का आक्रोश बुधवार को सड़कों पर फूट पड़ा। दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) से संबद्ध श्यामा प्रसाद मुखर्जी महिला महाविद्यालय (Shyama Prasad Mukherji College for Women – SPMC) की छात्राओं ने अन्य कॉलेजों के छात्रों और महिला संगठनों के साथ मिलकर कॉलेज परिसर से पश्चिमी दिल्ली के पंजाबी बाग पुलिस स्टेशन तक एक विशाल और ऐतिहासिक ‘गर्ल्स मार्च फॉर विमेंस सेफ्टी’ (Girls’ March for Women’s Safety) निकाला।
यह प्रदर्शन मुख्य रूप से दक्षिण दिल्ली के आस्था कुंज पार्क (Aastha Kunj Park) में एक 17 वर्षीय किशोरी के साथ हुई कथित दुष्कर्म की वीभत्स वारदात के विरोध में राजधानी के शैक्षणिक परिसरों में भड़के सिलसिलेवार छात्र आंदोलनों की चौथी बड़ी कड़ी था। हाथों में पितृसत्ता और समाज की संकीर्ण मानसिकता पर चोट करती तख्तियां, नारों की गूंज और आंखों में बदलाव का दृढ़ संकल्प लिए सैकड़ों छात्राओं ने स्पष्ट कर दिया कि अब वे घरों में कैद रहने या पहरेदारी वाली ‘शर्तिया सुरक्षा’ को स्वीकार नहीं करेंगी।
छात्राओं ने दिल्ली पुलिस और विश्वविद्यालय प्रशासन को सीधे कटघरे में खड़ा करते हुए पिंक हेल्प डेस्क (Pink Help Desk) की स्थापना, कॉलेज क्लस्टरों में पुलिस गश्त बढ़ाने और शिकायतों के सीधे निवारण के लिए पुलिस उपायुक्त (DCP) कार्यालय तक पारदर्शी समन्वय प्रणाली स्थापित करने की औपचारिक मांग की।
दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर हमेशा से चिंताएं रही हैं, लेकिन हाल ही में दक्षिण दिल्ली के कालकाजी/नेहरू प्लेस क्षेत्र स्थित आस्था कुंज पार्क में एक 17 वर्षीय नाबालिग छात्रा के साथ दिनदहाड़े हुई कथित दुष्कर्म की जघन्य घटना ने शैक्षणिक जगत को झकझोर कर रख दिया है मार्च की आयोजक छात्राओं ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आस्था कुंज पार्क की घटना कोई अपवाद या अलग-थलग मामला नहीं है, बल्कि यह उस असुरक्षित माहौल का प्रत्यक्ष परिणाम है जिसमें दिल्ली की महिलाएं हर दिन जीती हैं।
जब छात्राएं कोचिंग, लाइब्रेरी, पार्क या कॉलेज जाती हैं, तो उन्हें हर मोड़ पर असामाजिक तत्वों की घूरती नजरों, फब्तियों और शारीरिक हिंसा के खौफ से गुजरना पड़ता है। छात्राओं ने कहा कि जब तक व्यवस्था इन सार्वजनिक स्थलों को सुरक्षित नहीं बनाएगी, तब तक ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के नारे बेमानी हैं।
कॉलेज गेट के सामने एक विशेष ‘पिंक हेल्प डेस्क’ स्थापित की जाए, जहां महिला पुलिसकर्मी तैनात रहें ताकि छात्राएं बिना किसी झिझक के अपनी परेशानी साझा कर सकें। पंजाबी बाग वेस्ट मेट्रो स्टेशन और शिवाजी पार्क स्टेशन से कॉलेज परिसर तक आने वाली सड़कों पर कक्षाओं के शुरू होने (सुबह 8:00 से 9:30) और छूटने के समय (दोपहर 1:30 से 5:00) के दौरान पीसीआर वैन और बाइक-सवार महिला पुलिसकर्मियों (पिंक पैंथर्स) की नियमित गश्त अनिवार्य की जाए।
कॉलेज की चारदीवारी के आसपास और नजदीकी बस स्टैंडों पर बंद पड़ी स्ट्रीट लाइट्स को 48 घंटे के भीतर चालू किया जाए और दिल्ली पुलिस व पीडब्ल्यूडी के संयुक्त तत्वावधान में नए उच्च-क्षमता वाले सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं। एक ऐसा संस्थागत ढांचा विकसित किया जाए जिसके तहत कॉलेज की आंतरिक शिकायत समिति (ICC) और पश्चिमी जिले के डीसीपी (DCP) का सीधा संपर्क हो, ताकि कॉलेज छात्राओं से छेड़छाड़ या पीछा करने की किसी भी घटना पर पुलिस की त्वरित प्रतिक्रिया (Quick Response) सुनिश्चित हो सके।
मार्च के दौरान छात्राओं ने एक बेहद व्यावहारिक और दैनिक जीवन से जुड़े मुद्दे की ओर भी अधिकारियों का ध्यान आकर्षित किया मेट्रो स्टेशन से कॉलेज तक आने के लिए छात्राएं ई-रिक्शा का सहारा लेती हैं। छात्राओं ने आरोप लगाया कि कई ई-रिक्शा चालक नशे में होते हैं, अधिक किराया वसूलते हैं और अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हैं।छात्राओं ने मांग की कि कॉलेज रूट पर चलने वाले सभी ऑटो और ई-रिक्शा चालकों का अनिवार्य पुलिस सत्यापन (Police Verification) किया जाए और उन पर एक क्यूआर कोड (QR Code) चस्पा हो, जिसे स्कैन करते ही चालक की पहचान और आपराधिक रिकॉर्ड की पुष्टि हो सके।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी कॉलेज की छात्राओं द्वारा आयोजित यह मार्च केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं था, बल्कि यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 (जीने का अधिकार और व्यक्तिगत गरिमा) और अनुच्छेद 19 (देश के भीतर निर्बाध घूमने की स्वतंत्रता) को जमीन पर लागू करवाने की एक हुंकार थी। दशकों से महिला सुरक्षा के नाम पर समाज का रवैया ‘सुरक्षात्मक प्रतिगामी’ (Protective Regressive) रहा है अर्थात लड़कियों को शाम ढलने से पहले घर लौटने, अमुक कपड़े न पहनने या अकेले बाहर न जाने की सलाह दी जाती है।
एसपीएम कॉलेज की छात्राओं ने इस पितृसत्तात्मक विचार को सिरे से खारिज कर दिया। छात्राओं का स्पष्ट तर्क है कि सुरक्षा का अर्थ महिलाओं को चारदीवारी के भीतर बंद करना नहीं है, बल्कि सड़कों, पार्कों, बाजारों और सार्वजनिक परिवहन को इस हद तक सुरक्षित बनाना है कि कोई भी महिला दिन या रात के किसी भी पहर में बिना किसी भय के सिर उठाकर चल सके।
बुधवार को श्यामा प्रसाद मुखर्जी कॉलेज से पंजाबी बाग पुलिस स्टेशन तक निकाला गया यह ‘गर्ल्स मार्च’ देश की युवा पीढ़ी की निर्भीक चेतना का प्रतीक है। आस्था कुंज की वीभत्स घटना ने जिस तरह दिल्ली के विभिन्न परिसरों को झकझोरा है, उसने यह सिद्ध कर दिया है कि राजधानी की युवा महिलाएं अब अन्यायों और औपचारिक बयानों पर चुप बैठने वाली नहीं हैं।
पुलिस प्रशासन ने ज्ञापन स्वीकार करते हुए सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा करने और गश्त बढ़ाने का आश्वासन दिया है। किंतु अब समय आश्वासनों का नहीं, बल्कि ठोस और दृश्यमान कार्रवाई (Visible Action) का है। जब तक कॉलेज की चौखट से लेकर मेट्रो स्टेशन और शहर के अंतिम छोर तक हर छात्रा खुद को सुरक्षित, सम्मानित और सुना हुआ महसूस नहीं करती, तब तक आजादी के इस संघर्ष की आवाज सड़कों पर ऐसे ही गूंजती रहेगी।



