तसलीमा नसरीन की 19 साल बाद कोलकाता वापसी: एक भावुक पुनरागमन
वैचारिक लड़ाई और पश्चिम बंगाल का नया राजनीतिक परिदृश्य

निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका, मानवाधिकार कार्यकर्ता और प्रखर विचारिका तसलीमा नसरीन (Taslima Nasrin) ने करीब 19 वर्षों (18 वर्ष, 8 महीने और 10 दिन) के लंबे और कठिन अंतराल के बाद आखिरकार अपनी प्रिय सांस्कृतिक नगरी कोलकाता की धरती पर कदम रखा है। शुक्रवार को कोलकाता के नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरते ही मीडिया और समर्थकों से बात करते हुए उन्होंने इस क्षण को “अपने ही घर और अपनी आत्मा की भूमि पर वापसी” करार दिया।
पारंपरिक लाल-पाड़ सफेद सूती साड़ी में पहुँचीं 63 वर्षीय तसलीमा का हवाई अड्डे पर समर्थकों ने शंखध्वनि, पुष्पगुच्छ और भव्य अभिनंदन के साथ स्वागत किया।
1994 में बांग्लादेश से निष्कासित होने के बाद कोलकाता ही तसलीमा नसरीन का असली साहित्यिक ठिकाना बना था। हालांकि, नवंबर 2007 में तत्कालीन वामपंथी सरकार के कार्यकाल के दौरान कट्टरपंथियों के उग्र विरोध के चलते उन्हें रातों-रात शहर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था। शनिवार (1 अगस्त 2026) को रवींद्र सदन में आयोजित होने वाले एक बड़े ‘धार्मिक कट्टरपंथ विरोधी साहित्यिक सम्मेलन’ में भाग लेने के लिए हुई उनकी यह वापसी राज्य के नए राजनीतिक और सांस्कृतिक परिदृश्य में अत्यधिक महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
तसलीमा नसरीन के लिए कोलकाता केवल एक भौगोलिक शहर नहीं, बल्कि उनकी मातृभाषा बांग्ला, उनके पाठकों और उनके साहित्यिक विचारों की शरणस्थली रहा है। हवाई अड्डे पर एकत्र मीडियाकर्मियों और उत्साही समर्थकों को संबोधित करते हुए तसलीमा नसरीन बेहद भावुक नज़र आईं। उनकी आँखों में आँसू थे, लेकिन आवाज़ में वही पुरानी वैचारिक दृढ़ता थी।
उन्होंने कहा:
“मुझे आज ऐसा महसूस हो रहा है मानो मैं अपने ही घर लौट आई हूँ। मेरे दिल ने कभी बंगाल को किसी सीमा, धर्म या कँटीले तारों में नहीं बाँटा। ढाका ने मेरे लिए अपने दरवाज़े हमेशा के लिए बंद कर दिए हैं, इसलिए कोलकाता ही मेरा एकमात्र आश्रय और मेरी वास्तविक साहित्यिक भूमि है। मैं बहुत खुशी लेकर आई हूँ, लेकिन साथ ही एक वेदना भी है कि जिस शहर ने मुझे मेरी पहचान दी, वहाँ अपने पाठकों और दोस्तों के बीच लौटने में मुझे दो दशक लग गए।”
लेखिका ने इस बात पर विशेष बल दिया कि उनकी यह वापसी केवल एक व्यक्तिगत यात्रा नहीं है, बल्कि उन कट्टरपंथी ताकतों को करारा जवाब है जिन्होंने कभी यह सोचा था कि वे किसी लेखक की आवाज़ को हमेशा के लिए दबा सकते हैं।
तसलीमा नसरीन की कोलकाता वापसी केवल एक साहित्यिक घटना नहीं है; इसका एक गहरा राजनीतिक और सामाजिक इतिहास है, जो पश्चिम बंगाल के सत्ता परिवर्तन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विमर्श को उजागर करता है।नवंबर 2007 में तसलीमा नसरीन की आत्मकथात्मक पुस्तक ‘द्विखंडितो’ (Split in Two) का विरोध करते हुए ऑल इंडिया माइनॉरिटी फोरम द्वारा कोलकाता की सड़कों पर हिंसक प्रदर्शन किए गए थे। उस समय तत्कालीन बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा (Left Front) सरकार ने कानून-व्यवस्था बिगड़ने का हवाला देते हुए तसलीमा को तुरंत शहर छोड़ने का निर्देश दिया था। उन्हें पहले जयपुर और फिर दिल्ली स्थानांतरित किया गया, जहाँ से वे स्वीडन चली गईं।
2026 में पश्चिम बंगाल की राजनीतिक संरचना में हुए परिवर्तन के बाद तसलीमा की वापसी को एक नया मोड़ माना जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) नीत नई राज्य सरकार ने न केवल तसलीमा नसरीन को कोलकाता आने का औपचारिक निमंत्रण और पूर्ण सुरक्षा का भरोसा दिया, बल्कि उनके इस साहित्यिक आयोजन को सुगम बनाने में भी प्रशासनिक सहयोग प्रदान किया।
शनिवार को रवींद्र सदन में होने वाले सम्मेलन में राज्य के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी और प्रसिद्ध बंगाली साहित्यकार शीर्षेंदु मुखोपाध्याय के शामिल होने की संभावना है।
“सच्चे और उत्तरदायी सुशासन का वास्तविक और विधिक पैमाना केवल आर्थिक तरक्की नहीं है, बल्कि विचारकों, लेखकों और कलाकारों को बिना किसी भय के अपनी बात रखने के लिए एक सुरक्षित वातावरण और मंच प्रदान करना है।”
19 वर्षों के निर्वासित और कठिन जीवन के बाद तसलीमा नसरीन का कोलकाता लौटना केवल एक व्यक्ति की जीत नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्रता, साहित्य और निरंकुश कट्टरपंथ के खिलाफ एक वैचारिक विजय है।
कोलकाता की सड़कों, पुस्तक बाज़ारों (कॉलेज स्ट्रीट) और साहित्यिक गलियारों में उनकी वापसी की गूंज यह स्पष्ट संदेश देती है कि विचार कभी मरते नहीं और न ही उन्हें सीमाओं में क़ैद किया जा सकता है। भविष्य का सुरक्षित और न्यायसंगत रोडमैप यही मांग करता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं हर लेखक की स्वतंत्रता की रक्षा करें। नागरिक समाज और लोकतांत्रिक सरकारें जब एक पारदर्शी और सुरक्षित मंच पर साथ आएंगी, तभी भारत का आंतरिक सुशासन, बौद्धिक संप्रभुता, लोकतांत्रिक मूल्य और लोक कल्याण का विज़न सदैव सर्वोच्च, विश्वसनीय, निष्पक्ष, न्यायसंगत और अदम्य बना रहेगा।



