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समुद्री कूटनीति की महाविजय: होर्मुज के अशांत पानी से मुंद्रा के तट तक ‘शिवालिक’ की ऐतिहासिक यात्रा

'शिवालिक' और 'नंदा देवी': मिशन 'सेफ पैसेज' की रूपरेखा

16 मार्च, 2026 को गुजरात के मुंद्रा पोर्ट (Mundra Port) के क्षितिज पर जब विशाल एलपीजी टैंकर ‘शिवालिक’ (Shivalik) दिखाई दिया, तो यह केवल एक व्यावसायिक जहाज का आगमन नहीं था, बल्कि यह भारत की अजेय विदेश नीति और ऊर्जा सुरक्षा की एक बड़ी जीत का प्रतीक था। पश्चिम एशिया में जारी भीषण संघर्ष के बीच, जहाँ वैश्विक व्यापारिक जहाज होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से गुजरने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं, वहां भारत के दो एलपीजी जहाजों शिवालिक और नंदा देवी को ईरान द्वारा “विशेष सुरक्षित मार्ग” प्रदान करना एक कूटनीतिक चमत्कार से कम नहीं है। शिपिंग मंत्रालय के विशेष सचिव राजेश कुमार सिन्हा की देखरेख में संपन्न हुआ यह मिशन भारत के करोड़ों घरों में जलने वाले चूल्हों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में मील का पत्थर है

इस मिशन की गंभीरता को समझने के लिए उस रास्ते की भयावहता को समझना जरूरी है जहाँ से ‘शिवालिक’ को गुजरना पड़ा। होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच एकमात्र जलमार्ग है। दुनिया के कुल कच्चे तेल का 20% और एलपीजी का 25% इसी 33 किलोमीटर चौड़े रास्ते से गुजरता है।

2026 में मिडिल ईस्ट के तनाव ने इस मार्ग को ‘वॉर ज़ोन’ में बदल दिया है। ड्रोन हमलों, समुद्री सुरंगों और जहाजों को जब्त किए जाने की घटनाओं ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को तोड़ दिया था। भारत अपनी कुल एलपीजी खपत का एक बड़ा हिस्सा कतर, सऊदी अरब और यूएई से आयात करता है। इन जहाजों का रुकना भारत में रसोई गैस की भारी कमी और महंगाई का कारण बन सकता था।

भारत सरकार ने इस संकट को भांपते हुए ‘मिशन सेफ पैसेज’ की शुरुआत की। शिपिंग मंत्रालय के विशेष सचिव राजेश कुमार सिन्हा ने शनिवार को ही संकेत दे दिया था कि गहन कूटनीतिक वार्ताओं के बाद भारतीय जहाजों को रास्ता मिल गया है। भारत ने ईरान के साथ अपने ऐतिहासिक संबंधों का उपयोग किया। ईरानी राजदूत मोहम्मद फथाली के इस बयान ने “भारत हमारा मित्र है” रास्ता साफ कर दिया। ‘शिवालिक’ और ‘नंदा देवी’ को ईरानी नौसेना द्वारा विशेष ‘एस्कॉर्ट’ या निगरानी के साथ सुरक्षित गलियारा दिया गया। ‘ऑपरेशन संकल्प’ के तहत भारतीय युद्धपोत भी ओमान की खाड़ी में मुस्तैद थे, ताकि किसी भी अनहोनी की स्थिति में तुरंत सहायता प्रदान की जा सके।

16 मार्च को मुंद्रा पोर्ट पर शिवालिक का लंगर डालना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कई मायनों में महत्वपूर्ण है शिवालिक में लगभग 40,000 मीट्रिक टन से अधिक तरल पेट्रोलियम गैस (LPG) मौजूद है। यह खेप उत्तर भारत और पश्चिमी भारत के बॉटलिंग प्लांट्स के लिए ‘लाइफलाइन’ का काम करेगी। पिछले सप्ताह गैस की कमी की अफवाहों से कीमतों में जो उछाल देखा गया था, वह अब शांत होने की उम्मीद है। अडानी पोर्ट्स द्वारा संचालित मुंद्रा पोर्ट ने इस हाई-रिस्क कार्गो को रिसीव करने के लिए विशेष सुरक्षा प्रोटोकॉल और ‘फास्ट-ट्रैक अनलोडिंग’ की व्यवस्था की है।

शिवालिक की सफलता के बाद अब सबकी निगाहें ‘नंदा देवी’ (Nanda Devi) पर टिकी हैं। विशेष सचिव के अनुसार, नंदा देवी 17 मार्च 2026 को भारतीय तट पर पहुँचेगा। यह जहाज भी उसी कूटनीतिक सुरक्षा चक्र का हिस्सा है। दो जहाजों का लगातार आना यह दर्शाता है कि यह कोई इत्तेफाक नहीं था, बल्कि एक सुनियोजित द्विपक्षीय समझौता था।

यह घटनाक्रम दुनिया को भारत की बढ़ती शक्ति का संदेश देता है भारत ने दिखाया है कि वह अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग और ईरान के साथ ऊर्जा सहयोग को एक साथ साध सकता है। संघर्ष के बीच भी भारत का किसी भी पक्ष का हिस्सा न बनना और केवल मानवीय व आर्थिक हितों पर ध्यान केंद्रित करना उसे एक विश्वसनीय वैश्विक शक्ति बनाता है। ‘शिवालिक’ के सुरक्षित आने से ‘वार रिस्क प्रीमियम’ में कमी आएगी, जिसका सीधा फायदा भारतीय उपभोक्ताओं को कम कीमतों के रूप में मिल सकता है।

भले ही यह मिशन सफल रहा, लेकिन इसने भारत के लिए कुछ कड़वे सवाल भी छोड़े हैं भारत को अपने ‘स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व’ (SPR) की तर्ज पर ‘एलपीजी रिजर्व’ पर भी काम करने की जरूरत है ताकि 15-30 दिनों का संकट बिना आयात के झेला जा सके।आईएनएसटीसी (INSTC) जैसे गलियारों को और विकसित करने की आवश्यकता है ताकि फारस की खाड़ी पर निर्भरता कम हो सके।

‘शिवालिक’ का मुंद्रा पहुँचना केवल एक जहाज की यात्रा का अंत नहीं है, बल्कि यह भारतीय विदेश मंत्रालय, शिपिंग मंत्रालय और नौसेना के बीच बेहतरीन तालमेल का विजय पर्व है। राजेश कुमार सिन्हा और उनकी टीम ने यह सुनिश्चित किया कि युद्ध की लपटें भारतीय रसोई तक न पहुँचें। जैसे ही ‘नंदा देवी’ कल भारतीय तट को छुएगा, भारत इस क्षेत्र में अपनी ऊर्जा सुरक्षा की एक महत्वपूर्ण लड़ाई जीत चुका होगा। यह साबित करता है कि कठिन समय में “मित्रता” और “मजबूत नेतृत्व” ही सबसे बड़े सुरक्षा कवच होते हैं।

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