
29 अप्रैल, 2026 की शाम भारतीय लोकतंत्र के लिए एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में समाप्त हुई। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दूसरे और अंतिम चरण में 91.66% का भारी मतदान दर्ज किया गया है। चुनाव आयोग (ECI) द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पहले चरण (93.19%) और दूसरे चरण के संयुक्त आंकड़े राज्य के इतिहास में एक नया मील का पत्थर साबित हुए हैं। 92.47% के कुल मतदान के साथ पश्चिम बंगाल ने 2011 के अपने ही रिकॉर्ड (84.72%) को बड़े अंतर से पीछे छोड़ दिया है।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने इस भागीदारी को “चुनाव का पर्व, पश्चिम बंगाल का गर्व” बताते हुए इसे आजादी के बाद का सबसे ऐतिहासिक क्षण करार दिया। जहाँ एक ओर रिकॉर्ड तोड़ मतदान ने राजनीतिक पंडितों को चकित कर दिया है, वहीं दूसरी ओर सामने आए ‘एग्जिट पोल्स’ ने राज्य में ‘त्रिशंकु विधानसभा’ (Hung Assembly) या भाजपा की मामूली बढ़त के साथ एक नए सत्ता संघर्ष की ओर इशारा किया है।
पश्चिम बंगाल में मतदान का प्रतिशत केवल एक संख्या नहीं, बल्कि मतदाताओं की गहरी चिंता और सक्रियता का प्रतीक है। 93.48% के साथ राज्य का ‘सिरमौर’ जिला रहा। 91.73% मतदान दर्ज कर ‘दीदी के गढ़’ में भारी उत्साह दिखाया। 91.70% मतदान। 91.50% मतदान। इस बार महिला मतदाताओं का प्रतिशत (92.28%) पुरुषों (91.07%) से अधिक रहा। ‘लक्ष्मी भंडार’ और ‘कन्याश्री’ जैसी योजनाओं का असर यहाँ स्पष्ट दिखा, जहाँ महिलाएं सुबह 5 बजे से ही कतारों में खड़ी नजर आईं।
अंतिम चरण की 142 सीटों पर मतदान के दौरान बंगाल की गलियों में राजनीतिक तनाव चरम पर रहा। दक्षिण 24 परगना में टीएमसी सांसद सागरिका घोष ने आरोप लगाया कि केंद्रीय बलों ने महिलाओं और एक बच्चे पर लाठीचार्ज किया। टीएमसी ने इसे “बंगाल की जनता के खिलाफ युद्ध” करार दिया। हावड़ा के उदय नारायणपुर में टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी ने आरोप लगाया कि केंद्रीय बलों के ‘धक्का-मुक्की’ के कारण एक बुजुर्ग मतदाता की मृत्यु हो गई। उन्होंने बलों को “भाजपा की प्राइवेट आर्मी” बताया। 100% वेबकास्टिंग और 1,200 मतदाताओं प्रति बूथ की सीमा के कारण बड़ी घटनाओं को टालने में मदद मिली, हालांकि कई बूथों पर ईवीएम से छेड़छाड़ की शिकायतों के बाद पुनर्मतदान (Repolling) की संभावना जताई गई है।
मतदान के तुरंत बाद आए एग्जिट पोल्स ने राज्य की धड़कनें बढ़ा दी हैं। अधिकांश सर्वे एक बेहद करीबी मुकाबले (Neck-to-Neck) की ओर इशारा कर रहे हैं:
| एजेंसी | भाजपा (BJP+) | टीएमसी (TMC) | कांग्रेस-वाम |
| टाइम्स ऑफ इंडिया (Poll of Polls) | 142–152 | 135–145 | 3–6 |
| इंडिया टुडे (Axis My India) | 148–158 | 128–138 | 2–5 |
| पीपुल्स पल्स | 105–115 | 175–185 | 1–3 |
| चाणक्य | 155+ | 125–135 | 4 |
जहाँ भाजपा को ‘अर्बन भद्रलोक’ और ‘मटुआ’ समुदाय का समर्थन मिलने की उम्मीद है, वहीं टीएमसी अपनी महिला केंद्रित कल्याणकारी योजनाओं के दम पर बहुमत (148) का आंकड़ा पार करने का दावा कर रही है।
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के कारण चुनावी सूचियों में हुए बदलावों ने मतदाताओं के बीच एक तरह की ‘असुरक्षा’ पैदा की, जिसका असर भारी मतदान के रूप में दिखा। ममता बनर्जी ने चुनाव को “बंगाल की बेटी बनाम बाहरी” का मुद्दा बनाया, जबकि प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह ने “भ्रष्टाचार मुक्त सोनार बांग्ला” और गंगा एक्सप्रेसवे जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के विजन को पेश किया। राघव चड्ढा जैसे चेहरों का भाजपा में जाना और डिजिटल कैंपेनिंग ने शहरी युवाओं के मूड को प्रभावित किया है।
| श्रेणी | 2021 चुनाव | 2026 चुनाव |
| कुल मतदान % | 81.76% | 92.47% |
| कुल निर्वाचन क्षेत्र | 294 | 294 |
| कुल मतदाता | ~7.32 करोड़ | ~7.81 करोड़ |
| प्रमुख मुकाबला | TMC vs BJP | TMC vs BJP+ |
अब सबकी नजरें 4 मई, 2026 पर टिकी हैं। पश्चिम बंगाल की जनता ने अपना भविष्य ‘ईवीएम’ के भीतर सुरक्षित कर दिया है। यदि वे जीतते हैं, तो यह भारतीय राजनीति के इतिहास की सबसे बड़ी वैचारिक जीत होगी एक ऐसे राज्य में जहां दक्षिणपंथी राजनीति दशकों तक हाशिए पर रही। यदि ममता बनर्जी चौथी बार वापसी करती हैं, तो वे भारतीय राजनीति की सबसे शक्तिशाली महिला नेता के रूप में उभरेंगी, जो सीधे तौर पर 2029 की राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करेंगी।
पश्चिम बंगाल का यह चुनाव केवल एक सरकार चुनने के लिए नहीं था, बल्कि यह बंगाल के ‘सांस्कृतिक डीएनए’ और ‘राजनीतिक भविष्य’ के बीच का संघर्ष था। 92% से अधिक मतदान यह दर्शाता है कि बंगाल की जनता खामोश नहीं है; उसने बदलाव या निरंतरता के लिए एक निर्णायक प्रहार किया है।
एग्जिट पोल्स चाहे जो कहें, बंगाल की मिट्टी का मिजाज हमेशा से अप्रत्याशित रहा है। 4 मई को जब ‘बॉक्स’ खुलेंगे, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि ‘जय बांग्ला’ का नारा गूंजेगा या ‘जय श्री राम’ के उद्घोष के साथ कोलकाता की सड़कों पर भगवा लहर दौड़ेगी। फिलहाल, बंगाल ने अपने उच्चतम मतदान से दुनिया को यह दिखा दिया है कि “लोकतंत्र की असली धड़कन” आज भी भारत के पूर्वी कोने में सबसे तेज धड़कती है।



