वैश्विक अनिश्चितता के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था का ‘स्वर्णिम काल’
विश्व बैंक द्वारा विकास दर के अनुमान में बढ़ोतरी और 2026-27 का आर्थिक रोडमैप

8 अप्रैल, 2026 को विश्व बैंक (World Bank) द्वारा जारी की गई अपनी नवीनतम रिपोर्ट ‘साउथ एशिया इकोनॉमिक अपडेट – अप्रैल 2026’ में भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रति अटूट विश्वास जताया गया है। ऐसे समय में जब मध्य पूर्व (ईरान-इजरायल युद्ध) में तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार अस्थिर हैं और कई विकसित देश मंदी की आहट से जूझ रहे हैं, विश्व बैंक ने भारत के विकास दर (GDP Growth) के अनुमान को पहले के 6.3% से बढ़ाकर 6.6% (वित्त वर्ष 2026-27 के लिए) कर दिया है।
विश्व बैंक की रिपोर्ट का सबसे प्रमुख निष्कर्ष यह है कि दक्षिण एशिया की पूरी आर्थिक गतिशीलता भारत पर टिकी हुई है। दक्षिण एशिया की कुल अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी लगभग 80% है। रिपोर्ट के अनुसार, यदि भारत को इस गणना से हटा दिया जाए, तो शेष दक्षिण एशिया की वृद्धि दर 2026 में केवल 4.1% रह जाएगी, जबकि भारत के साथ यह औसत 6.3% है। विश्व बैंक के अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारत ने वैश्विक झटकों (जैसे ऊर्जा की कीमतों में उछाल) को झेलने के लिए पर्याप्त बफर और नीतिगत ढांचा तैयार कर लिया है।
विश्व बैंक ने भारत की विकास दर को 6.6% तक संशोधित करने के पीछे निम्नलिखित ठोस कारण बताए हैं भारत ने हाल ही में यूरोपीय संघ (EU) और यूनाइटेड किंगडम (UK) के साथ महत्वपूर्ण मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) पर हस्ताक्षर किए हैं। इन समझौतों से भारतीय कपड़ा, आईटी सेवाओं और विनिर्माण क्षेत्र को बड़े वैश्विक बाजारों तक शुल्क-मुक्त पहुँच मिली है। विश्व बैंक का अनुमान है कि इन व्यापार समझौतों के कारण भारतीय श्रमिकों की वास्तविक आय में 1.2% से 1.5% तक की वृद्धि हो सकती है।
भारत सरकार ने 2024-2026 के बीच ‘गति शक्ति’ और ‘पीएलआई’ (PLI) योजनाओं के माध्यम से बुनियादी ढांचे पर रिकॉर्ड निवेश किया है। सड़कों, रेलवे और बंदरगाहों के निर्माण से न केवल लॉजिस्टिक्स लागत कम हुई है, बल्कि सीमेंट, स्टील और विनिर्माण क्षेत्रों में मांग भी बढ़ी है।
जीएसटी दरों में हालिया कटौती और डिजिटल भुगतान (UPI) के विस्तार ने असंगठित क्षेत्र को मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से जोड़ा है। इससे कर संग्रह (Tax Collection) में निरंतर वृद्धि हुई है, जिससे सरकार को विकास कार्यों के लिए अधिक ‘राजकोषीय स्थान’ (Fiscal Space) मिला है। पश्चिमी देशों के विपरीत, भारत की विकास दर का एक बड़ा हिस्सा आंतरिक मांग से संचालित होता है। भारत का मध्यम वर्ग तेजी से बढ़ रहा है, जिससे ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में मांग बनी हुई है।
जहाँ एक ओर वृद्धि के संकेत उत्साहजनक हैं, वहीं विश्व बैंक ने कुछ गंभीर जोखिमों (Headwinds) के प्रति आगाह भी किया है भारत अपनी कच्चा तेल (Crude Oil) की जरूरतों का 80% से अधिक आयात करता है। यदि मध्य पूर्व में युद्ध लंबा खिंचता है, तो तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल को पार कर सकती हैं।
ऊर्जा की ऊंची कीमतों का सीधा असर परिवहन लागत पर पड़ता है, जिससे खाद्य और आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं। विश्व बैंक ने अनुमान लगाया है कि यदि ऊर्जा संकट गहराया, तो भारत की खुदरा मुद्रास्फीति 5.5% के आसपास बनी रह सकती है।सरकार को किसानों को बचाने के लिए उर्वरक और ईंधन सब्सिडी पर अधिक खर्च करना पड़ सकता है, जो राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को कम करने के लक्ष्य में बाधा बन सकता है।
विश्व बैंक की रिपोर्ट दक्षिण एशिया के अन्य देशों के लिए उतनी सुखद नहीं है जितनी भारत के लिए:
| देश | 2026-27 अनुमान | मुख्य चुनौती |
| मालदीव | 0.7% | भारी कर्ज और चीन के साथ व्यापारिक संतुलन का अभाव। |
| नेपाल | 2.3% | पेट्रोलियम संकट और विदेशी मुद्रा भंडार की कमी। |
| पाकिस्तान | 2.1% | राजनीतिक अस्थिरता और उच्च ब्याज दरें। |
| श्रीलंका | 3.6% | ऊर्जा लागत में वृद्धि के कारण सुधार की गति धीमी। |
| भारत | 6.6% | मजबूत घरेलू मांग और नीतिगत स्थिरता। |
रिपोर्ट के अनुसार, भारत ‘उच्च-मध्यम आय’ देश बनने की दहलीज पर है। 2047 तक पूर्ण रूप से विकसित राष्ट्र बनने के लिए विश्व बैंक ने तीन सुझाव दिए हैं भारत को अपनी कृषि उत्पादकता को सालाना 0.8% अतिरिक्त बढ़ाने की आवश्यकता है। महिलाओं की कार्यबल (Workforce) में भागीदारी को बढ़ाना अनिवार्य है। वर्तमान में यह वैश्विक औसत से कम है। जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने के लिए ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ और सौर ऊर्जा के क्षेत्र में निवेश को और तेज करना होगा।
विश्व बैंक के दक्षिण एशिया के उपाध्यक्ष मार्टिन रायसर (Martin Raiser) ने कहा है कि “भारत की कहानी केवल विकास दर की नहीं, बल्कि स्थिरता की है।” 2026-27 के लिए 6.6% का विकास दर अनुमान यह स्पष्ट करता है कि भारत अब वैश्विक अर्थव्यवस्था का ‘पैसेंजर’ नहीं बल्कि ‘पायलट’ बन चुका है।
जहाँ दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं ‘नकारात्मक विकास’ या ‘मंदी’ की बात कर रही हैं, भारत का 6.6% की रफ्तार से बढ़ना एक चमत्कारिक उपलब्धि है। यदि भारत बाहरी जोखिमों (विशेष रूप से ऊर्जा संकट) का प्रबंधन कुशलता से कर लेता है, तो वह दशक के अंत तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के अपने लक्ष्य को समय से पहले प्राप्त कर सकता है।



