
7 अप्रैल, 2026 की तारीख भारतीय लोकतांत्रिक प्रक्रिया के इतिहास में एक मील का पत्थर बन गई है। पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले, भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) ने मतदाता सूची के शुद्धिकरण के लिए चलाए गए अपने ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (Special Intensive Revision – SIR) अभियान के दूसरे और अंतिम चरण को संपन्न कर लिया है। इस व्यापक अभ्यास के दौरान, पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से कुल 90.66 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं।
यह संख्या केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह राज्य की कुल मतदाता आबादी का लगभग 12% से 15% हिस्सा है। ‘इंडिया टुडे’ के वरिष्ठ संवाददाता इंद्रजीत कुंडू की रिपोर्ट के अनुसार, यह पूरी प्रक्रिया न केवल प्रशासनिक थी, बल्कि इसमें सर्वोच्च न्यायालय का कड़ा रुख और न्यायिक अधिकारियों की अभूतपूर्व भागीदारी भी शामिल थी।
मतदाता सूची से इतनी बड़ी संख्या में नामों का हटना रातों-रात नहीं हुआ। निर्वाचन आयोग ने इसे तीन सुनियोजित चरणों में अंजाम दिया ताकि सटीकता सुनिश्चित की जा सके SIR अभियान के पहले चरण में आयोग ने डिजिटल डेटा एनालिटिक्स और बूथ स्तर के अधिकारियों (BLO) के माध्यम से गहन सत्यापन किया। इस दौरान 58.2 लाख नाम हटाए गए। इनमें अधिकांश ऐसे थे जो एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत थे (Duplicates) या जिनकी मृत्यु हो चुकी थी।
प्रारूप मतदाता सूची (Draft Roll) के प्रकाशन के बाद, जनता और राजनीतिक दलों से प्राप्त आपत्तियों के आधार पर 5.46 लाख अतिरिक्त नाम हटाए गए। यह चरण मुख्य रूप से उन प्रविष्टियों पर केंद्रित था जो दस्तावेजों में विसंगतियों के कारण संदिग्ध पाई गई थीं। सबसे महत्वपूर्ण और अंतिम चरण आज (7 अप्रैल) संपन्न हुआ। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर, आयोग ने 60 लाख संदिग्ध मामलों को न्यायिक अधिकारियों के समक्ष रखा। इस कानूनी प्रक्रिया के बाद 27 लाख और नाम हटाए गए।
इस शुद्धिकरण अभियान को “अभूतपूर्व” बनाने वाली सबसे बड़ी कड़ी सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप था। बंगाल की मतदाता सूची में ‘फर्जी मतदाताओं’ और ‘अवैध घुसपैठियों’ के दावों को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया था कि “लोकतंत्र की पवित्रता मतदाता सूची की शुद्धता पर टिकी है।”
पहली बार, निर्वाचन आयोग ने शुद्धिकरण कार्य के लिए केवल प्रशासनिक कर्मचारियों पर निर्भर रहने के बजाय राज्य भर में 700 से अधिक न्यायिक अधिकारियों (जजों और मजिस्ट्रेटों) को तैनात किया। इन अधिकारियों ने 60 लाख विवादित मामलों में ‘अदालत’ लगाई। मतदाताओं को अपने दस्तावेज़ों के साथ उपस्थित होने का नोटिस दिया गया। जिन मामलों में मतदाता अनुपस्थित रहे या जिनके दस्तावेज़ जाली पाए गए, उन्हें हटाने का आदेश न्यायिक आदेश (Judicial Order) के रूप में पारित किया गया। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, इस न्यायिक हस्तक्षेप ने राजनीतिक दलों के उन आरोपों को कुंद कर दिया जिनमें नामों को हटाने की प्रक्रिया को ‘पक्षपातपूर्ण’ बताया जा रहा था।
निर्वाचन आयोग ने नामों के विलोपन के लिए निम्नलिखित श्रेणियों को आधार बनाया उन्नत सॉफ्टवेयर के जरिए ऐसे मतदाताओं की पहचान की गई जिनका नाम, पिता का नाम और जन्मतिथि अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में समान थी। मतदाता पहचान पत्र को आधार से जोड़ने की स्वैच्छिक प्रक्रिया के दौरान लाखों ‘घोस्ट वोटर्स’ (Ghost Voters) की पहचान हुई।
पश्चिम बंगाल से काम के सिलसिले में दूसरे राज्यों में जाकर बसे लाखों लोग, जिन्होंने वहां भी मतदाता पहचान पत्र बनवा लिया था, उनके नाम घरेलू सूची से हटा दिए गए। चेहरे की पहचान (Facial Recognition) तकनीक का उपयोग करके उन लोगों को पकड़ा गया जिन्होंने अलग-अलग पहचान पत्रों पर अपनी फोटो लगा रखी थी।
90.66 लाख नामों का हटना पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक ‘चुनावी भूकंप’ की तरह है। भाजपा ने इसे अपनी नैतिक जीत बताया है। विपक्ष का लंबे समय से आरोप रहा है कि सत्ताधारी दल ने ‘फर्जी मतदाताओं’ के जरिए चुनावों को प्रभावित किया है। नेता प्रतिपक्ष ने मांग की है कि हटाए गए नामों की विस्तृत रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
तृणमूल कांग्रेस ने प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा है कि इस बहाने अल्पसंख्यक समुदायों और गरीब वर्गों को निशाना बनाया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने आगाह किया है कि यदि एक भी वास्तविक भारतीय नागरिक का नाम हटा है, तो वे इसके खिलाफ आंदोलन करेंगी। कई नागरिकों में अपने नाम कटने को लेकर संशय और भय है, जिसके समाधान के लिए आयोग ने विशेष ‘हेल्पलाइन’ और ‘रिकवरी स्लॉट’ की घोषणा की है।
90.66 लाख नामों के हटने से पश्चिम बंगाल का ‘वोटर-पापुलेशन रेशियो’ (V-P Ratio) अब राष्ट्रीय औसत के करीब आ गया है। फर्जी नामों के हटने से ‘बोगस वोटिंग’ की संभावना न्यूनतम हो गई है। कई विधानसभा क्षेत्रों में हार-जीत का अंतर 5,000 से 10,000 वोटों का होता है। यदि किसी क्षेत्र से 20,000-30,000 फर्जी नाम हटे हैं, तो वहां 2026 का परिणाम 2021 से बिल्कुल अलग हो सकता है। आयोग अब 18-19 वर्ष के नए मतदाताओं के पंजीकरण पर ध्यान केंद्रित करेगा ताकि सूची न केवल ‘शुद्ध’ हो, बल्कि ‘पूर्ण’ भी हो।
पश्चिम बंगाल में संपन्न हुआ यह विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान भारतीय निर्वाचन आयोग की विश्वसनीयता को पुनर्स्थापित करता है। 700 न्यायिक अधिकारियों की देखरेख में 90.66 लाख नामों का विलोपन यह संदेश देता है कि तकनीक और न्यायपालिका का समन्वय चुनावी धांधली को जड़ से खत्म कर सकता है।



