डिजिटल युग में पहचान की सुरक्षा: कार्तिक आर्यन बनाम ‘अनधिकृत बाजार’
मुकदमे का आधार: क्या हैं 'पर्सनालिटी राइट्स'?

7 अप्रैल, 2026 को बॉलीवुड के चहेते अभिनेता कार्तिक आर्यन (Kartik Aaryan) ने अपनी व्यक्तिगत पहचान को डिजिटल डकैती से बचाने के लिए बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया है। उन्होंने अपनी ‘पर्सनालिटी राइट्स’ (Personality Rights) और बौद्धिक संपदा (Intellectual Property) की रक्षा के लिए एक व्यापक दीवानी मुकदमा (Civil Suit) दायर किया है। यह कानूनी कदम उन दर्जनों ई-कॉमर्स वेबसाइटों, सोशल मीडिया पेजों और अज्ञात “जॉन डो” (John Doe) अपराधियों के खिलाफ है, जो कार्तिक के नाम, आवाज, चेहरे और उनके प्रसिद्ध फिल्मी किरदारों की ‘likeness’ का उपयोग करके करोड़ों का अवैध व्यापार कर रहे हैं।
यह मामला केवल एक अभिनेता की व्यावसायिक चिंता नहीं है, बल्कि 2026 में जेनरेटिव एआई (Generative AI) और डीपफेक (Deepfakes) द्वारा उत्पन्न किए गए उन अस्तित्वगत खतरों को भी रेखांकित करता है, जो किसी भी व्यक्ति की निजता को खतरे में डाल सकते हैं।
कानूनी शब्दावली में, ‘पर्सनालिटी राइट्स’ (व्यक्तित्व अधिकार) एक व्यक्ति का वह अधिकार है जिसके तहत वह अपनी पहचान के व्यावसायिक उपयोग को नियंत्रित कर सकता है। कार्तिक आर्यन की याचिका में तीन मुख्य अधिकारों पर जोर दिया गया है यह अधिकार किसी प्रसिद्ध व्यक्ति को यह तय करने की शक्ति देता है कि उसका नाम या चेहरा किसी विज्ञापन या उत्पाद के लिए इस्तेमाल होगा या नहीं।
यह सुनिश्चित करता है कि किसी की निजी छवि का उपयोग बिना अनुमति के सार्वजनिक रूप से न किया जाए। इसका अर्थ है कि केवल वास्तविक फोटो ही नहीं, बल्कि किसी अभिनेता के कार्टून, कैरिकेचर या उनके द्वारा निभाए गए प्रसिद्ध किरदारों (जैसे ‘भूल भुलैया’ का रूह बाबा) की समानता का उपयोग भी अवैध है।
कार्तिक आर्यन ने अदालत के सामने सबूत पेश किए हैं कि कैसे उनकी पहचान का ‘वस्तुकरण’ (Commoditization) किया जा रहा है कई अंतरराष्ट्रीय और भारतीय शॉपिंग साइट्स कार्तिक के चेहरे वाले टी-शर्ट, मोबाइल कवर, और परफ्यूम बेच रही हैं। इन उत्पादों पर न तो कार्तिक की सहमति है और न ही उन्हें कोई रॉयल्टी (Royalty) दी जा रही है।
कई छोटे और मध्यम ब्रांड एआई टूल्स का उपयोग करके ऐसे विज्ञापन बना रहे हैं जिनमें कार्तिक आर्यन उनके उत्पाद का प्रचार करते दिखते हैं। यह उपभोक्ताओं के साथ धोखाधड़ी है क्योंकि कार्तिक का उन ब्रांडों से कोई संबंध नहीं है। कई अनधिकृत मोबाइल गेम्स में कार्तिक के चेहरे वाले ‘अवतार’ का उपयोग किया जा रहा है, जिससे डेवलपर्स लाखों कमा रहे हैं।
कार्तिक की याचिका की एक बड़ी विशेषता ‘जॉन डो’ (या अशोक कुमार) आदेश की मांग है।
यह एक ‘सर्च एंड सीज़र’ आदेश है जो अज्ञात उल्लंघनकर्ताओं के खिलाफ जारी किया जाता है। चूंकि इंटरनेट पर अपराधियों की पहचान छिपाना आसान है, इसलिए यह आदेश पुलिस और कानूनी अधिकारियों को उन सभी अज्ञात संस्थाओं के खिलाफ कार्रवाई करने की शक्ति देता है जो उल्लंघन में शामिल पाए जाते हैं।
कार्तिक ने तर्क दिया है कि इंटरनेट एक समुद्र की तरह है; एक वेबसाइट बंद होती है तो दूसरी खुल जाती है। इसलिए, उन्हें एक ‘अम्ब्रेला प्रोटेक्शन’ (व्यापक सुरक्षा) चाहिए जो वर्तमान और भविष्य के सभी अज्ञात उल्लंघनकर्ताओं पर लागू हो।
कार्तिक आर्यन की याचिका में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा एआई (Artificial Intelligence) का है। 2026 में, एआई तकनीक इतनी सुलभ हो गई है कि कोई भी व्यक्ति कार्तिक की आवाज और चेहरे का ‘डिजिटल क्लोन’ बना सकता है। कार्तिक ने चिंता जताई है कि एआई का उपयोग करके उनकी आवाज में फर्जी संदेश प्रसारित किए जा रहे हैं, जो उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचा सकते हैं।
सोशल मीडिया पर ऐसे डीपफेक वीडियो की भरमार है जहाँ कार्तिक को ऐसे उत्पाद बेचते या ऐसी बातें कहते दिखाया गया है जो उन्होंने कभी नहीं कहीं। कार्तिक ने मांग की है कि गूगल, मेटा (इंस्टाग्राम/फेसबुक) और एक्स (X) जैसे प्लेटफॉर्म्स को ऐसी ‘फिंगरप्रिंटिंग’ तकनीक लागू करनी चाहिए जो उनकी पहचान वाली किसी भी सामग्री को अपलोड होते ही ब्लॉक कर दे।
कार्तिक आर्यन का यह मुकदमा उन फैसलों की कड़ी है जिन्होंने सेलिब्रिटी राइट्स को भारत में मजबूत किया है:
| सेलिब्रिटी | कोर्ट का आदेश (प्रभावी बिंदु) |
| अमिताभ बच्चन (2022) | उनके नाम, आवाज और ‘बच्चन’ उपनाम के व्यावसायिक उपयोग पर पूर्ण रोक। |
| अनिल कपूर (2023) | उनके ‘झकास’ शब्द और उनकी समानता (Likeness) के किसी भी माध्यम में उपयोग पर रोक। |
| जैकी श्रॉफ (2024) | उनके ‘भिडू’ (Bhidu) शब्द और उनके व्यक्तित्व के किसी भी डिजिटल विरूपण पर प्रतिबंध। |
कार्तिक आर्यन इस सूची में सबसे युवा अभिनेताओं में से एक हैं जो अपनी ‘डिजिटल विरासत’ को बचाने के लिए इतनी मजबूती से सामने आए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस तरह के अनधिकृत उपयोग को नहीं रोका गया, तो एक अभिनेता की ब्रांड वैल्यू गिर सकती है। यदि कार्तिक का चेहरा हर सस्ते टी-शर्ट या मोबाइल ऐप पर दिखेगा, तो बड़े लक्जरी ब्रांड उन्हें अपना एंबेसडर बनाने में कतराएंगे। ब्रांड एंडोर्समेंट एक अभिनेता की आय का मुख्य स्रोत होते हैं। अनधिकृत उपयोग इस आय पर सीधा प्रहार है। यदि किसी फर्जी विज्ञापन के कारण उपभोक्ता को नुकसान होता है, तो कानूनी रूप से अभिनेता को भी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने अतीत में कलाकारों की बौद्धिक संपदा के प्रति संवेदनशीलता दिखाई है। कानूनविदों का मानना है कि अदालत कार्तिक को ‘अंतरिम निषेधाज्ञा’ (Interim Injunction) दे सकती है, जिसका अर्थ होगा सभी ई-कॉमर्स साइटों को कार्तिक से संबंधित अवैध सामान 48 घंटों के भीतर हटाना होगा। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को उन अकाउंट्स को सस्पेंड करना होगा जो कार्तिक के नाम पर फर्जी विज्ञापन चला रहे हैं। एआई डेवलपर्स को निर्देश दिया जाएगा कि वे अपने डेटासेट में कार्तिक की छवियों का उपयोग उनके व्यक्तित्व को री-क्रिएट करने के लिए न करें।
कार्तिक आर्यन का बॉम्बे हाई कोर्ट जाना केवल एक व्यक्तिगत कानूनी लड़ाई नहीं है, बल्कि यह “मेरा चेहरा, मेरा अधिकार” के सिद्धांत को स्थापित करने की कोशिश है। 2026 के एआई-प्रधान युग में, जहां वास्तविकता और कल्पना के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है, यह मुकदमा भविष्य के ‘डिजिटल अधिकारों’ के लिए एक मिसाल बनेगा।
यह मुकदमा यह संदेश देता है कि तकनीक कितनी भी आगे बढ़ जाए, किसी भी व्यक्ति (चाहे वह सितारा हो या आम नागरिक) की पहचान उसकी अपनी संपत्ति है, जिसे बाज़ार के लालच या एल्गोरिदम के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। अब सबकी नज़रें बॉम्बे हाई कोर्ट पर हैं, जिसका फैसला भारत में ‘डिजिटल निजता’ की नई परिभाषा तय करेगा।



