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कर्नाटक में सत्ता का ऐतिहासिक शिखर: सिद्धारमैया का त्याग, डी. के. शिवकुमार का मुख्यमंत्री के रूप में उदय

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के साथ कूटनीतिक द्वंद्व

कर्नाटक की प्रशासनिक और विधायी राजनीति के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी मोड़ लेकर आई है। कर्नाटक कांग्रेस के भीतर लंबे समय से चल रहे नेतृत्व परिवर्तन (Leadership Transition) की कयासबाजियों पर पूर्ण विराम लगाते हुए, निवर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अपने पद से आधिकारिक रूप से इस्तीफा दे दिया। उनके इस गरिमापूर्ण त्याग के तुरंत बाद, बेंगलुरु के एक निजी होटल में आयोजित कांग्रेस विधायक दल (CLP) की उच्च-स्तरीय बैठक में राज्य के उपमुख्यमंत्री और संकटमोचक नेता डी. के. शिवकुमार को सर्वसम्मति से नया सीएलपी नेता (Congress Legislature Party Leader) चुन लिया गया।

इस कूटनीतिक सत्ता हस्तांतरण (Smooth Power Shift) की सबसे बड़ी और विहंगम विशेषता यह रही कि स्वयं सिद्धारमैया ने डी. के. शिवकुमार के नाम का प्रस्ताव विधायी पटल पर रखा, जिसका पार्टी के सबसे वरिष्ठ दलित नेता और कैबिनेट मंत्री जी. परमेश्वर ने पुरजोर समर्थन (Seconded) किया। इस सर्वसम्मत निर्णय ने पार्टी के भीतर किसी भी प्रकार की आंतरिक गुटबाजी या असंतोष की संभावना को पूरी तरह समाप्त कर दिया है और डी. के. शिवकुमार के कर्नाटक के अगले मुख्यमंत्री (Chief Minister of Karnataka) के रूप में शपथ लेने का मार्ग पूरी तरह प्रशस्त कर दिया है।

वर्ष २०२३ के कर्नाटक विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी को मिली ऐतिहासिक और प्रचंड जीत के बाद से ही राज्य की राजनीति में मुख्यमंत्री पद को लेकर दो ध्रुव बने हुए थे। एक तरफ जननेता और अहिंदा (AHINDA) गठबंधन के प्रतीक सिद्धारमैया थे, तो दूसरी तरफ संगठनात्मक कौशल, रणनीतिक चातुर्य और पार्टी के मुख्य वित्तीय व लॉजिस्टिक स्तंभ डी. के. शिवकुमार थे।

कांग्रेस आलाकमान ने २०२३ में सरकार गठन के समय ही दोनों शीर्ष नेताओं के बीच एक गुप्त और कूटनीतिक ‘पावर-शेयरिंग फॉर्मूला’ (Power Sharing Formula) तैयार किया था। इसके तहत पहले ढाई वर्ष सिद्धारमैया को प्रशासनिक कमान सौंपनी थी और शेष कार्यकाल डी. के. शिवकुमार के हवाले करना था। मई २०२६ का यह घटनाक्रम इसी वादे और आंतरिक सांगठनिक कूटनीति की तार्किक परिणति है। सिद्धारमैया द्वारा बिना किसी सार्वजनिक विवाद या बयानबाजी के अपने पद से गरिमापूर्ण ढंग से कदम पीछे खींचना यह साबित करता है कि कांग्रेस आलाकमान राज्य में शासन की स्थिरता (Political Stability) को लेकर अत्यंत गंभीर था।

इस नेतृत्व परिवर्तन की पूरी पटकथा में वरिष्ठ नेता जी. परमेश्वर की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। जब सिद्धारमैया ने प्रस्ताव रखा, तो जी. परमेश्वर ने तुरंत उसका समर्थन किया। जी. परमेश्वर कर्नाटक की राजनीति में एक बड़ा और सम्मानित दलित चेहरा हैं। उनका डी. के. शिवकुमार के नाम पर मुहर लगाना यह दर्शाता है कि नए मुख्यमंत्री को राज्य के सभी सामाजिक और विधायी गुटों का पूर्ण और अटूट समर्थन प्राप्त है, जिससे सरकार के स्थायित्व पर कोई संकट नहीं आएगा।

डी. के. शिवकुमार एक ऐसे समय में कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद का कांटों भरा ताज पहनने जा रहे हैं, जब राज्य कई बड़े अंतर-राज्यीय और आर्थिक मुद्दों से जूझ रहा है। इनमें सबसे गंभीर और ज्वलंत मुद्दा मेकेदातु बांध परियोजना (Mekedatu Dam Dispute) को लेकर पड़ोसी राज्य तमिलनाडु के साथ चल रहा टकराव है।

हाल ही में २७ मई, २०२६ को तमिलनाडु के नवनियुक्त मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने नई दिल्ली का अपना पहला आधिकारिक दौरा किया था। अपनी इस दिल्ली यात्रा के दौरान सीएम जोसेफ विजय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर कर्नाटक सरकार द्वारा कावेरी नदी पर मेकेदातु बांध परियोजना के लिए की जा रही ‘भूमि पूजन’ की घोषणाओं का कड़ा विरोध किया था। तमिलनाडु का तर्क है कि यह परियोजना कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का सीधा उल्लंघन है।

डी. के. शिवकुमार वर्तमान में कर्नाटक के जल संसाधन मंत्री भी हैं और मेकेदातु बांध का निर्माण कराना उनका सबसे बड़ा ड्रीम प्रोजेक्ट और राजनीतिक वादा रहा है। अब मुख्यमंत्री का पद संभालने के बाद, उन पर कर्नाटक के किसानों और बेंगलुरु शहर के लिए पीने के पानी की सुरक्षा सुनिश्चित करने का भारी दबाव होगा। उन्हें तमिलनाडु के सीएम जोसेफ विजय की ‘द्रविड़ कूटनीति’ का सामना करने के लिए कानून और संवाद के स्तर पर एक बेहद परिपक्व प्रशासनिक सूझबूझ का परिचय देना होगा।

कर्नाटक सरकार वर्तमान में कई बड़ी लोक-कल्याणकारी योजनाओं (जैसे गृह लक्ष्मी, युवा निधि, शक्ति योजना आदि) का संचालन कर रही है, जिसके कारण राज्य के खजाने (State Exchequer) पर एक बड़ा वित्तीय बोझ है। डी. के. शिवकुमार को अपनी आर्थिक कूटनीति के माध्यम से यह सुनिश्चित करना होगा कि इन कल्याणकारी योजनाओं को बिना किसी रुकावट के जारी रखा जा सके, और साथ ही बेंगलुरु जैसे वैश्विक आईटी हब (IT Hub) के बुनियादी ढांचे और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के लिए भी पर्याप्त बजटीय आवंटन हो सके।

एक सफल बिजनेसमैन और व्यावहारिक राजनेता होने के नाते, उद्योग जगत और कॉर्पोरेट सेक्टर्स को डी. के. शिवकुमार से काफी उम्मीदें हैं। उनके मुख्यमंत्री बनने से राज्य में बड़े वैश्विक निवेश (Global Investment) को आकर्षित करने की गति तेज होने का अनुमान है।

३० मई, २०२६ को बेंगलुरु की धरती पर संपन्न हुआ यह नेतृत्व परिवर्तन भारतीय लोकतंत्र और संघीय राजनीति (Federal Politics) का एक अत्यंत परिपक्व और अनुकरणीय अध्याय है। जिस प्रकार हाल के दिनों में देश के अन्य हिस्सों में प्रशासनिक बदलाव हो रहे हैं जैसे दिल्ली में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता द्वारा छात्रों के कल्याण के लिए मुफ्त परिवहन नीतियां लागू की जा रही हैं, या असम में हिमंत बिस्वा सरमा सरकार यूसीसी विधेयक पारित कर सामाजिक सुधार कर रही है उसी तर्ज पर कर्नाटक ने भी अपनी आंतरिक कूटनीति के दम पर बिना किसी शोर-शराबे के एक सुचारू सत्ता हस्तांतरण का सर्वश्रेष्ठ मॉडल प्रस्तुत किया है।

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