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डिजिटल युग में बचपन की सुरक्षा: क्या भारत को 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन करना चाहिए?

कोर्ट की चेतावनी: क्यों उठ रही है प्रतिबंध की मांग?

आज से दो दशक पहले, बच्चों की शामें खेल के मैदानों में बीतती थीं, जहाँ धूल, पसीना और दोस्तों के साथ असली बातचीत होती थी। आज वह मैदान बदलकर 6 इंच की स्मार्टफोन स्क्रीन में सिमट गया है। भारत के हर गली-कूचे में आपको ऐसे बच्चे मिल जाएंगे जो अपनी उम्र से कहीं ज़्यादा जटिल डिजिटल दुनिया में खोए हुए हैं।

हाल ही में मद्रास हाई कोर्ट ने एक बेहद गंभीर और कड़वी चेतावनी दी है। कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि क्या भारत में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया जा सकता है? यह सवाल केवल एक कानूनी सुझाव नहीं है, बल्कि यह एक डरे हुए समाज और एक चिंतित न्यायपालिका की आवाज़ है।

मद्रास हाई कोर्ट का रुख अचानक नहीं बदला है। इसके पीछे साइबर अपराधों, बच्चों के खिलाफ होने वाले शोषण और मानसिक स्वास्थ्य में आती गिरावट के डरावने आंकड़े हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ‘हनी ट्रैपिंग’, ‘साइबर बुलिंग’ और ‘ऑनलाइन ग्रूमिंग’ के अड्डे बन चुके हैं। मासूम बच्चे अक्सर अपनी निजी जानकारी, तस्वीरें और लोकेशन साझा कर देते हैं, जिसका फायदा अपराधी उठाते हैं। कोर्ट का मानना है कि जब तक बच्चे मानसिक रूप से इन खतरों को समझने के लिए परिपक्व (Mature) नहीं हो जाते, उन्हें इस खुले जंगल में छोड़ना खतरे से खाली नहीं है।

सोशल मीडिया के अल्गोरिदम इस तरह बनाए गए हैं कि वे बड़ों को भी अपना आदी बना लेते हैं। बच्चों के कोमल मन पर इसका असर और भी गहरा होता है। ‘लाइक्स’ और ‘व्यूज’ की होड़ बच्चों में हीन भावना, चिंता (Anxiety) और नींद की कमी पैदा कर रही है। जब एक 13 साल का बच्चा अपनी तुलना किसी ‘इंस्टाग्राम इन्फ्लुएंसर’ की बनावटी ज़िंदगी से करता है, तो उसके आत्मविश्वास की नींव डगमगा जाती है।

अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि कानून बनाना सरकार का काम है, कोर्ट का नहीं। लेकिन जब कार्यपालिका (Government) किसी गंभीर सामाजिक बुराई पर चुप रहती है, तो न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ता है। कोर्ट का कहना है कि “बचपन अनमोल है” और इसकी रक्षा करना राज्य की ‘पैरेन्स पैट्रिया’ (Parens Patriae – यानी राज्य सभी नागरिकों का अभिभावक है) जिम्मेदारी है।

हालांकि, कुछ विशेषज्ञ इसे ‘पॉलिसी ओवररीच’ मानते हैं। उनका कहना है कि डिजिटल युग में बच्चों को तकनीक से पूरी तरह काट देना संभव नहीं है और न ही यह उनके भविष्य के लिए सही है। क्या बैन करना वाकई समाधान है या यह सिर्फ समस्या को ‘अंडरग्राउंड’ ले जाएगा?

ऑस्ट्रेलिया ने हाल ही में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन करने का कानून बनाया है। क्या भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में यह लागू हो सकता है? भारत में करोड़ों बच्चे ऐसे हैं जिनके पास अपना उपकरण नहीं है, वे माता-पिता के फोन का उपयोग करते हैं। ऐसे में यह पहचानना कि स्क्रीन के पीछे कौन है एक 14 साल का बच्चा या 40 साल का वयस्क तकनीकी रूप से बेहद कठिन है। क्या हम हर ऐप के लिए ‘आधार’ अनिवार्य करेंगे? यह निजता (Privacy) के नए सवाल खड़े करेगा।

कोविड-19 के बाद शिक्षा और डिजिटल दुनिया एक-दूसरे से जुड़ गए हैं। यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म्स पर ज्ञान का भंडार भी है। यदि हम 16 साल से कम उम्र के बच्चों पर बैन लगाते हैं, तो क्या हम उन्हें उस सीखने के अवसर से भी वंचित कर देंगे? कानून को ‘मनोरंजन’ और ‘शिक्षा’ के बीच एक बारीक रेखा खींचनी होगी।

वर्तमान में भारत के ‘डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम’ (DPDP Act) में बच्चों के डेटा के लिए माता-पिता की सहमति अनिवार्य है। लेकिन क्या केवल एक ‘चेकबॉक्स’ पर टिक करना सुरक्षा के लिए काफी है? सरकार को सोशल मीडिया कंपनियों को मजबूर करना होगा कि वे बच्चों के लिए अलग ‘किड्स मोड’ बनाएं, जिसमें कोई विज्ञापन न हो और हानिकारक कंटेंट को फ़िल्टर किया जाए।

बच्चों के व्यवहार को ट्रैक करना और उस डेटा को विज्ञापन कंपनियों को बेचना अपराध घोषित होना चाहिए। कानून से ज़्यादा ज़रूरी है ‘डिजिटल पेरेंटिंग’ के बारे में जागरूकता। माता-पिता को यह सिखाना होगा कि वे बच्चों की स्क्रीन टाइमिंग और उनके द्वारा देखे जाने वाले कंटेंट पर नज़र कैसे रखें।

इस पूरी कानूनी बहस में हम अक्सर सबसे महत्वपूर्ण पक्ष भूल जाते हैं बच्चे खुद क्या सोचते हैं? आजकल बच्चे ‘अकेलेपन’ को दूर करने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लेते हैं। जब माता-पिता व्यस्त होते हैं, तो स्मार्टफोन एक ‘सस्ता बेबीसिटर’ बन जाता है। हमें यह समझना होगा कि कोई भी कानून उस प्यार, ध्यान और समय की जगह नहीं ले सकता जो एक बच्चे को अपने परिवार से मिलना चाहिए। डिजिटल एडिक्शन केवल तकनीक की समस्या नहीं है, यह सामाजिक अलगाव (Social Isolation) का लक्षण है।

पूरी तरह से ‘बैन’ करना शायद आखिरी रास्ता होना चाहिए। भारत को एक ‘ग्रेडेड अप्रोच’ (Graded Approach) अपनानी चाहिए सोशल मीडिया पर सख्त पाबंदी। ‘पैरेंटल कंट्रोल’ के साथ सीमित उपयोग और विशेष सुरक्षित प्लेटफॉर्म्स। स्कूलों में ‘डिजिटल वेलबीइंग’ को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए ताकि बच्चे खुद जान सकें कि उनके लिए क्या सही है और क्या गलत।

मद्रास हाई कोर्ट का ‘नज’ (Nudge) सरकार के लिए एक वेक-अप कॉल है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि डिजिटल दुनिया के नियम अब केवल बड़ों के लिए नहीं हो सकते। बचपन को ‘अल्गोरिदम के चंगुल’ से बचाना हमारी पीढ़ी की सबसे बड़ी चुनौती है।

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