
दिल्ली के द्वारका इलाके में हुई भीषण सड़क दुर्घटना ने एक बार फिर राष्ट्रीय राजधानी की सड़कों पर सुरक्षा, नाबालिगों की लापरवाही और न्यायिक प्रक्रियाओं के बीच के जटिल अंतर्संबंधों को उजागर कर दिया है। एक 17 वर्षीय किशोर द्वारा चलाई जा रही SUV ने जिस तरह से 23 वर्षीय बाइक सवार साहिल धनेश्वरा की जान ली, वह केवल एक हादसा नहीं बल्कि सामाजिक और कानूनी तंत्र की विफलता का प्रतीक है।
3 फरवरी की सुबह दिल्ली के द्वारका इलाके में अन्य दिनों की तरह ही सामान्य हलचल थी। दोपहर करीब 11:57 बजे लाल बहादुर शास्त्री कॉलेज के पास एक तेज रफ्तार SUV ने विपरीत दिशा से आ रहे मोटरसाइकिल सवार साहिल को जोरदार टक्कर मारी। टक्कर इतनी भीषण थी कि साहिल की मौके पर ही मौत हो गई और SUV अनियंत्रित होकर एक खड़ी टैक्सी से जा टकराई। इस घटना ने एक पल में दो परिवारों को उजाड़ दिया एक वह जिसने अपना बेटा खोया, और दूसरा वह जिसका बेटा अब कानून की नजर में एक ‘अपराधी’ है।
दिल्ली पुलिस के अनुसार, आरोपी किशोर को किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष पेश किया गया था, जहाँ से उसे शुरुआत में ‘ऑब्जर्वेशन होम’ (सुधार गृह) भेजा गया। लेकिन मंगलवार को बोर्ड ने उसे उसकी कक्षा 10वीं की बोर्ड परीक्षाओं में शामिल होने के लिए अंतरिम जमानत दे दी। भारतीय किशोर न्याय प्रणाली इस सिद्धांत पर काम करती है कि 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों को अपराधी मानने के बजाय ‘कानून के उल्लंघन में शामिल किशोर’ (CCL) माना जाए। उन्हें सजा देने के बजाय सुधारने का प्रयास किया जाता है। शिक्षा का अधिकार इसी सुधार प्रक्रिया का एक अभिन्न हिस्सा है।
बोर्ड का तर्क है कि यदि किशोर को परीक्षा देने से रोका गया, तो उसका शैक्षणिक वर्ष बर्बाद हो जाएगा, जो उसके दीर्घकालिक पुनर्वास में बाधक बन सकता है। हालांकि, यह राहत केवल ‘अंतरिम’ है, जिसका अर्थ है कि परीक्षाओं के तुरंत बाद उसे पुनः कानूनी प्रक्रियाओं का सामना करना होगा।
इस मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि एक 17 वर्षीय किशोर, जिसके पास ड्राइविंग लाइसेंस भी नहीं था, उसे सड़क पर एक शक्तिशाली SUV चलाने की अनुमति कैसे मिली? संशोधित मोटर वाहन अधिनियम (2019) की धारा 199A के अनुसार, यदि कोई नाबालिग वाहन चलाते हुए अपराध करता है, तो वाहन के मालिक या अभिभावक को सीधे तौर पर जिम्मेदार माना जाता है। इसमें अभिभावक को 3 साल तक की जेल और 25,000 रुपये का जुर्माना हो सकता है। वाहन का रजिस्ट्रेशन 12 महीने के लिए रद्द किया जा सकता है। नाबालिग को 25 वर्ष की आयु तक ड्राइविंग लाइसेंस प्राप्त करने के लिए अयोग्य घोषित किया जा सकता है। पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि क्या किशोर ने चाबी चुपके से ली थी या उसे घर वालों की सहमति प्राप्त थी। सड़क पर ‘किलर मशीन’ सौंपना केवल लापरवाही नहीं, बल्कि एक संभावित अपराध है।
जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 2015 में किए गए महत्वपूर्ण संशोधनों के अनुसार, यदि 16 से 18 वर्ष के बीच का कोई किशोर ‘जघन्य अपराध’ (Heinous Offense) करता है, तो बोर्ड यह आकलन कर सकता है कि क्या उस पर एक वयस्क (Adult) की तरह मुकदमा चलाया जाना चाहिए। बोर्ड इस बात की जांच करता है कि क्या किशोर को अपने कृत्य के परिणामों का पता था। बिना लाइसेंस के घनी आबादी वाले इलाके में तेज रफ्तार गाड़ी चलाना यह दर्शाता है कि उसे खतरे का आभास था। निर्भया मामले के बाद आए इस कानून का उद्देश्य उन किशोरों को सख्त सजा देना है जो गंभीर अपराध करते हैं। साहिल के परिवार की मांग है कि इस मामले को ‘दुर्घटना’ के बजाय ‘हत्या’ की श्रेणी में देखा जाए।
23 वर्षीय साहिल धनेश्वरा का जीवन अभी शुरू ही हुआ था। वह अपने करियर और भविष्य के सपनों की ओर बढ़ रहा था। एक लापरवाह क्षण ने उसकी दुनिया को समाप्त कर दिया। हिट-एंड-रन के मामलों में अक्सर देखा जाता है कि रईस परिवारों के बिगड़ैल बच्चे महंगी गाड़ियों को खिलौना समझकर सड़कों पर निकलते हैं। साहिल जैसे मध्यमवर्गीय युवाओं के लिए सड़क सुरक्षा अब एक जीवन-मरण का प्रश्न बन गई है। कानून के तहत मिलने वाला मुआवजा कभी भी एक जीवन की भरपाई नहीं कर सकता। वास्तविक न्याय तभी माना जाएगा जब आरोपी को उसके किए की उचित सजा मिले, जिससे समाज में एक कड़ा संदेश जाए।
द्वारका जैसे इलाकों में चौड़ी सड़कें और रात के समय कम ट्रैफिक अक्सर ‘जॉयराइडिंग’ के लिए उकसाता है। पुलिस ने घटनास्थल पर जो स्थिति देखी क्षतिग्रस्त मोटरसाइकिल, क्षतिग्रस्त टैक्सी और SUV वह इस बात का प्रमाण है कि गाड़ी की गति नियंत्रण से बहुत बाहर थी। बिना लाइसेंस के गाड़ी चलाना एक अपराध है। विपरीत दिशा (Wrong side) से टक्कर मारना ट्रैफिक नियमों की घोर अवहेलना है। दिल्ली पुलिस के लिए यह अनिवार्य है कि वे परीक्षाओं के नाम पर मिली इस छूट के दौरान आरोपी पर कड़ी नजर रखें ताकि वह साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ न कर सके या फरार न हो सके।
द्वारका का यह हादसा हमें चेतावनी देता है कि केवल कानून बना देना काफी नहीं है। जब तक स्कूलों में सड़क सुरक्षा की शिक्षा और घरों में माता-पिता का नियंत्रण नहीं होगा, तब तक साहिल जैसे मासूम अपनी जान गंवाते रहेंगे। आरोपी किशोर को बोर्ड परीक्षाओं के लिए बेल देना उसकी ‘शिक्षा’ के लिए जरूरी हो सकता है, लेकिन यह ‘साहिल की मौत’ के प्रति उदासीनता नहीं होनी चाहिए। न्याय के तराजू में एक तरफ किशोर का भविष्य है और दूसरी तरफ एक मृतक का अधिकार। समाज की उम्मीद यही है कि ‘परीक्षा’ समाप्त होते ही कानून की देवी अपनी पट्टी खोलकर उस किशोर के कृत्यों का वास्तविक हिसाब करेगी।



