
भारत आज तेजी से विकास कर रहा है, लेकिन युवाओं के लिए रोजगार की समस्या अभी भी गंभीर बनी हुई है। देश की आर्थिक प्रगति के बीच जब करोड़ों युवा काम की तलाश में भटक रहे हैं, तो उनके मन में उम्मीद की किरण कम होती जा रही है। बेरोज़गारी की यह समस्या न केवल सामाजिक समस्या है, बल्कि आर्थिक और मानसिक स्वास्थ्य पर भी इसका गहरा असर पड़ता है।
हालिया आंकड़ों के मुताबिक, भारत में बेरोज़गारी दर अगस्त 2025 में लगभग 5.1% रही, जो पिछले समय की तुलना में थोड़ी कम हुई है। इसके बावजूद, 15 से 29 वर्ष के युवाओं में बेरोज़गारी दर काफी अधिक, लगभग 14.6% तक दर्ज की गई है, जो राष्ट्रीय औसत से तीन गुना ज्यादा है। शहरों में बेरोज़गारी दर ग्रामीण इलाकों की तुलना में ज्यादा है, जहां औद्योगिक और सेवा क्षेत्र अधिक विकसित हैं मगर नौकरी की मांग उससे कहीं ज्यादा है। महिला युवाओं में बेरोज़गारी दर पुरुषों की तुलना में अधिक (लगभग 17.8%) रिकॉर्ड की गई है। यह आंकड़े बतलाते हैं कि समस्या न केवल व्यापक है, बल्कि उसमें लैंगिक असमानता भी गहरी है।
जनसंख्या में तेजी से बढ़ती युवाओं की संख्या जिससे रोजगार उत्पन्न करना सरकार और उद्योगों के लिए चुनौती पेश करता है। शिक्षा प्रणाली का स्वरूप: अनेक युवा उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं पर उनके पास वो कौशल नहीं होते जो वर्तमान उद्योग क्षेत्रों जैसे एआई, ग्रीन एनर्जी, एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग में काम आ सकें। तकनीकी बदलाव और ऑटोमेशन: तेजी से बढ़ती तकनीकों ने पारंपरिक रोजगारों को कम किया है, जिससे नौकरियों की संरचना बदली है। औद्योगिक विकास की असमानता: कुछ राज्यों में तेजी से रोजगार सृजन हो रहा है, तो कई क्षेत्रों में अवसर कम हैं।
नौकरी न मिलने की निराशा से युवा अक्सर मानसिक रूप से भी कमजोर हो जाते हैं। उनका आत्मसम्मान गिरता है, सामाजिक अलगाव बढ़ता है, और कई बार यह आर्थिक अपराध और दुष्प्रवृत्तियों को भी जन्म देता है। युवा अपनी प्रतिभा और काबिलियत के बावजूद जब नौकरी न पा सकें, तो समाज में गैरबराबरी की भावना गहराती है।
बेरोज़गारी का पता केवल युवाओं से नहीं लगाया जा सकता। यह एक सामूहिक असफलता है जहां नीति निर्धारक सही योजनाएं और निवेश नहीं कर पा रहे हैं। शिक्षा प्रणाली और उद्योगों के बीच तालमेल नहीं हो पा रहा। उद्योग उन नए कौशलों वाली नौकरियों के लिए युवाओं को तैयार नहीं कर पा रहे। परिवार और समाज कभी-कभी गैर-रियलिस्टिक उम्मीदें और दबाव डालते हैं।
सरकार रोजगार बढ़ाने के लिए कई योजनाएं चला रही है जिनमें स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम, स्टार्टअप इंडिया, मेक इन इंडिया और डिजिटल इंडिया प्रमुख हैं। हालांकि, रोजगार सृजन की मांग अब भी आपूर्ति से बहुत अधिक है। सरकार को चाहिए कि वह नई शिक्षा प्रणाली बनाए जो समकालीन कौशल को प्राथमिकता दे, उद्यमशीलता को बढ़ावा दे, और खासकर महिला रोजगार को सशक्त करे। इसके साथ ही औद्योगिक नीति में तेजी और ग्रामीण रोजगार पर ज्यादा ध्यान देना होगा।
युवा वर्ग को खुद भी समय की मांग के अनुसार कौशल सीखने और सपनों को व्यवहारिक बनाने की जरूरत है। परिवारों को चाहिए कि वे युवाओं का मनोबल बढ़ाएं, इच्छाओं को समझें और उन्हें सही दिशा दिखाएं। समाज को युवा के प्रति सकारात्मक सोच और सहायता का माहौल बनाना होगा।
शिक्षा को रोजगारोन्मुख बनाना। युवाओं के लिए व्यापक कौशल विकास योजनाएं। टेक्नोलॉजी को रोजगार सृजन का साधन बनाना।सामाजिक विचारों में बदलाव लाना और मनोवैज्ञानिक सहायता देना। महिला सशक्तिकरण के जरिए रोजगार क्षेत्र का विस्तार। सरकारी योजनाओं का सही और पारदर्शी क्रियान्वयन।
भारत की युवा शक्ति देश की सबसे बड़ी पूंजी है, पर बेरोज़गारी की समस्या इसके विकास में बाधा बन रही है। इसे हल करने के लिए समुचित नीति, शिक्षा सुधार, सामाजिक समर्थन और युवाओं की इच्छाशक्ति की जरूरत है। तभी युवा अपना भरोसा वापस पा सकेंगे और देश को आर्थिक-सामाजिक प्रगति के नए आयामों पर ले जा सकेंगे।



