
भारत में शिक्षा और रोजगार के बीच की खाई लगातार गहरी होती जा रही है। युवाओं के लिए डिग्री हासिल करना जितना जरूरी बना दिया गया है, उनके लिए अपनी डिग्री के आधार पर रोजगार हासिल करना उतना ही बड़ा संघर्ष साबित हो रहा है। घर-परिवार में बच्चों के लिए पढ़ाई की उम्मीदें बंधती हैं, पर सच्चाई यही है कि बड़ी संख्या में ग्रेजुएट और पोस्ट-ग्रेजुएट युवा नौकरियों की कतार में खड़े नजर आते हैं।
अब समस्या यह नहीं रह गई कि डिग्री मिल रही है या नहीं बड़ी चुनौती यह है कि क्या हमारी शिक्षा उनके अंदर वे काबिलियत और कौशल पैदा कर रही है जिसकी जरूरत आज की इंडस्ट्री और तेजी से बदलती अर्थव्यवस्था को है? इंडिया स्किल्स रिपोर्ट 2025 और विभिन्न सर्वे बताते हैं कि हर दूसरा डिग्रीधारी युवा, कहीं न कहीं, नौकरी पाने लायक आवश्यक स्किल्स यानी रोजगार की योग्यताओं की कमी महसूस करता है। आईटी, बैंकिंग, डाटा साइंस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों में जहां इंडस्ट्री को कुशल कर्मचारी चाहिए, वहां शिक्षा-प्रणाली के बहुत से स्नातक खरे नहीं उतरते।
ज्यादातर कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में अब भी वही पुराना पाठ्यक्रम, रटा-रटाया पैटर्न और सैद्धांतिक ज्ञान है, जबकि आज इंडस्ट्री को डिजिटल, कंप्यूटेशनल, कम्युनिकेशन, टीम वर्क, प्रॉब्लम सॉल्विंग जैसी क्षमताओं वाले कामगार चाहिए। इंटर्नशिप, फील्ड प्रोजेक्ट, वर्कशॉप, लाइव केस स्टडीज, और सॉफ्ट स्किल्स जैसे पहलुओं पर ज़ोर अभी भी पर्याप्त नहीं है, और यही वजह है कि युवा डिग्री के साथ आत्मविश्वास तो लाते हैं, पर ठीक-ठाक नौकरी मिलने में उन्हें बार-बार निराशा हाथ लगती है।
सरकारी स्तर पर स्किल इंडिया, नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2020 में वोकेशनल एजुकेशन, डिजिटल लर्निंग प्लेटफॉर्म्स, अप्रेंटिसशिप और स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने की अनेक कोशिशें शुरू हुई हैं, मगर इनका असर ग्रामीण-शहरी और विभिन्न राज्य स्तर पर असमान दिखता है। युवाओं को सही करियर मार्गदर्शन, जीवन कौशल, एवं व्यावहारिक प्रशिक्षण देने का दायरा अभी भी संस्थागत शिक्षा में व्यापक होना बाकी है।
अभिभावक, शिक्षक और शिक्षा नीति-निर्माताओं को यह समझना जरूरी है कि केवल मार्क्स, डिग्री या अंग्रेज़ी ज्ञान से आगे बढ़कर अब समय है कि स्कूल-कॉलेज स्तर से ही आत्म-निर्भरता, प्रयोगशीलता और ‘आजन्म सीखने’ की आदत डाली जाए। छात्र को अध्ययन में टॉप करना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है कि वह साक्षात्कार, टीम में काम करने, समस्या का समाधान निकालने, और रोज़गार की बदलती ज़रूरतों के हिसाब से खुद को बार-बार दक्ष बनाए।
रोजगार और शिक्षा की इस खाई केवल शिक्षण संस्थाओं या सरकारों का ही काम नहीं समाज के हर हिस्से को मिलकर यह माहौल बनाना होगा कि हर युवा अपनी प्रतिभा, कौशल और सपनों के साथ समाज की मुख्यधारा में सफल और आत्मनिर्भर बने। तभी सही मायनों में शिक्षा, ‘नौकरी के काबिल’ युवाओं का भारत गढ़ पाएगी।



