
16 मार्च, 2026 को बिहार की राजनीति में एक नया अध्याय लिखा गया, जब राज्यसभा की पाँच सीटों के लिए हुए चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने सभी पाँचों सीटों पर कब्जा जमाकर विपक्ष को शून्य पर समेट दिया। बिहार विधानसभा के पुस्तकालय कक्ष में हुई इस चुनावी प्रक्रिया ने न केवल सत्ता पक्ष के अटूट अनुशासन को प्रदर्शित किया, बल्कि विपक्षी महागठबंधन (आरजेडी-कांग्रेस-वाम दल) के भीतर मौजूद गहरे अविश्वास और बिखराव को भी सार्वजनिक कर दिया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की इस चुनाव में सीधी भागीदारी ने इसे ‘प्रतिष्ठा का प्रश्न’ बना दिया था।
बिहार में राज्यसभा की रिक्त हुई पाँच सीटों के लिए कुल छह उम्मीदवार मैदान में थे। एनडीए की ओर से पाँच और महागठबंधन की ओर से एक उम्मीदवार के होने के कारण मतदान अनिवार्य हो गया था। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार में पार्टी के संकटमोचक माने जाने वाले नितिन नवीन ने 44 प्रथम वरीयता के वोट पाकर अपनी जीत सुनिश्चित की।
बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में एक लंबी पारी खेलने के बाद, नीतीश कुमार का उच्च सदन (राज्यसभा) जाना एक बड़े रणनीतिक बदलाव का संकेत है। उन्हें भी 44 विधायकों का समर्थन मिला। ‘जननायक’ कर्पूरी ठाकुर के पुत्र और सामाजिक न्याय के प्रतीक रामनाथ ठाकुर ने 42 वोटों के साथ अपनी सीट बरकरार रखी। राष्ट्रिय लोक मोर्चा के प्रमुख को एनडीए के कोटे से उम्मीदवार बनाया गया था। उन्होंने 42 वोट हासिल कर अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता को फिर से साबित किया। भाजपा के प्रदेश महासचिव और एक युवा संगठनात्मक चेहरे के रूप में उभरे शिवेश कुमार ने आरजेडी के उम्मीदवार को दूसरी वरीयता के वोटों में पछाड़कर एनडीए की पांचवीं सीट पक्की की।
महागठबंधन के लिए यह चुनाव एक बड़ी राजनीतिक शर्मिंदगी साबित हुआ। आरजेडी के उम्मीदवार अमरेन्द्र धारी सिंह की हार ने विपक्षी एकता के दावों की पोल खोल दी। मतदान के दौरान महागठबंधन के चार विधायक (कांग्रेस के 3 और आरजेडी का 1) सदन में उपस्थित नहीं हुए। सूत्रों के अनुसार, इन विधायकों ने एनडीए के पक्ष में ‘क्रॉस वोटिंग’ की संभावना को टालने के बजाय अनुपस्थित रहकर अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता पक्ष की मदद की।
आरजेडी को उम्मीद थी कि AIMIM (5 विधायक) और बसपा (1 विधायक) के समर्थन से वे अपनी सीट निकाल लेंगे। लेकिन अपनी ही पार्टियों के विधायकों के टूटने के कारण उनका गणित 38 वोटों पर सिमट गया, जबकि जीत के लिए 41 वोटों की दरकार थी। यह परिणाम आरजेडी नेता तेजस्वी यादव के लिए एक चेतावनी है कि वे अपने कुनबे को एकजुट रखने में विफल हो रहे हैं।
इस चुनाव का सबसे बड़ा ‘एक्स-फैक्टर’ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का खुद उम्मीदवार बनना रहा। इसके पीछे कई राजनीतिक व्याख्याएं की जा रही हैं नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना यह संकेत देता है कि वे 2026 के उत्तरार्ध में केंद्र की राजनीति में कोई बड़ी जिम्मेदारी संभाल सकते हैं। एनडीए के भीतर यह चर्चा तेज है कि नीतीश कुमार धीरे-धीरे बिहार की कमान भाजपा या जेडीयू के किसी नए चेहरे को सौंपकर खुद को दिल्ली की राजनीति तक सीमित कर सकते हैं। मुख्यमंत्री का खुद चुनाव लड़ना एनडीए के विधायकों को यह संदेश देना था कि वे इस चुनाव को हल्के में न लें, जिससे पांचवीं सीट निकालने में आसानी हुई।
राज्यसभा चुनाव में ‘आनुपातिक प्रतिनिधित्व’ प्रणाली (Single Transferable Vote) का पालन किया जाता है। एनडीए के चार उम्मीदवारों (नीतीश, नितिन नवीन, रामनाथ और कुशवाहा) ने पहले ही दौर में जीत का कोटा पूरा कर लिया। इन चारों उम्मीदवारों के पास जो अतिरिक्त वोट बचे थे, वे पांचवें उम्मीदवार शिवेश कुमार को हस्तांतरित (Transfer) हो गए। महागठबंधन के पास केवल 38 ठोस वोट थे। विधायकों की अनुपस्थिति और क्रॉस वोटिंग के कारण आरजेडी उम्मीदवार दूसरी वरीयता की गणना में भी पिछड़ गया।
राज्यसभा चुनाव के इस परिणाम का असर आने वाले विधानसभा सत्र और बिहार की प्रशासनिक व्यवस्था पर भी पड़ेगा 5-0 की यह जीत एनडीए के लिए एक ‘बूस्टर डोज’ है। यह जेडीयू-भाजपा के बीच के उन संशयों को खत्म करता है जो अक्सर सीटों के बंटवारे को लेकर उठते रहे हैं। आरजेडी और कांग्रेस के बीच अब ‘ब्लेम गेम’ (आरोप-प्रत्यारोप) शुरू होगा। विपक्षी खेमे में नेतृत्व के प्रति अविश्वास बढ़ सकता है। एनडीए ने अपने उम्मीदवारों के जरिए ओबीसी (कुशवाहा, ठाकुर), ईबीसी और सवर्ण (नितिन नवीन, शिवेश) का एक संतुलित समीकरण पेश किया है, जो 2026 के आगामी चुनावों के लिए उनकी रणनीति का हिस्सा है।
यह राज्यसभा चुनाव एक ‘सेमीफाइनल’ की तरह था। अब रिक्त होने वाली विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होंगे, जहाँ एनडीए इस जीत की लय को बरकरार रखना चाहेगा। उपेन्द्र कुशवाहा की जीत ने यह साबित किया है कि ‘लव-कुश’ समीकरण (कुर्मी-कोइरी) अभी भी एनडीए की सबसे बड़ी ताकत है।
बिहार राज्यसभा चुनाव 2026 के परिणामों ने स्पष्ट कर दिया है कि फिलहाल बिहार की राजनीतिक पिच पर एनडीए का पूर्ण नियंत्रण है। नीतीश कुमार और नितिन नवीन की जोड़ी ने विपक्षी गेंदबाजी को न केवल विफल किया, बल्कि महागठबंधन के खेमे में ऐसी दरारें पैदा कर दी हैं जिन्हें भरना तेजस्वी यादव के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। 5-0 का यह आंकड़ा आने वाले वर्षों में बिहार की नीतियों और दिल्ली में बिहार के प्रतिनिधित्व की दिशा तय करेगा।



