
यह सवाल सीधा भी है और असहज भी किशोरों की बढ़ती डिजिटल लत के लिए जिम्मेदार कौन है बच्चे, माता-पिता, स्कूल, या फिर टेक कंपनियां और सरकार? सच यह है कि दोष किसी एक पर नहीं डाला जा सकता; यह एक ऐसा जाल है जो परिवार, समाज, बाज़ार और नीतियों के मिलेजुले असर से बनता है।
आज का किशोर दिन की शुरुआत मोबाइल नोटिफिकेशन से करता है और रात स्क्रीन की रोशनी में खत्म। ऑनलाइन क्लास, असाइनमेंट, गेमिंग, सोशल मीडिया, रील्स, चैट सब मिलकर घंटों का स्क्रीन टाइम खा जाते हैं। बाहर से देखो तो यह “टेक-फ्रेंडली जेनरेशन” लगती है, पर भीतर से यह ध्यान भटकाव, बेचैनी, गुस्सा, नींद की कमी और अकेलेपन का कारण बन रही है।
डिजिटल लत की कुछ आसान पहचानें हैं बिना वजह बार-बार फोन चेक करना। थोड़ी देर नेट न मिले तो चिड़चिड़ापन या घबराहट।पढ़ाई, खेल, नींद, परिवार से ज्यादा समय स्क्रीन को देना। “ऑफलाइन” बैठने पर बोरियत या खालीपन महसूस होना।ये सब मिलकर सिर्फ “शौक” नहीं, धीरे-धीरे “निर्भरता” की तरफ इशारा करते हैं।
किशोरावस्था वैसे ही भावनाओं, पहचान और दबावों का उथल-पुथल भरा समय है। ऐसे में डिजिटल दुनिया उन्हें तीन आसान चीज़ें दे देती है त्वरित मनोरंजन – एक क्लिक में हज़ारों वीडियो। त्वरित मान्यता – लाइक, कमेंट, फॉलोअर। त्वरित भागना – असली तनाव से बचने के लिए वर्चुअल दुनिया।
जब असली दुनिया में परीक्षा, तुलना, डांट, भविष्य का डर और रिश्तों की जटिलता बढ़ती है, तो ऑनलाइन दुनिया एक आसान भागने का रास्ता बन जाती है। किशोरों का दिमाग अभी विकसित हो रहा होता है; उसे “तुरंत सुख” देने वाली चीज़ें तेजी से अपनी आदत बना लेती हैं।
नहीं। बच्चे किसी शून्य में नहीं रहते। वे वही सीखते हैं जो घर, स्कूल और समाज उन्हें रोज दिखाता है। कई घरों में माता-पिता खुद भी हर समय फोन पर रहते हैं। बच्चा रोए तो हाथ में मोबाइल थमा दिया जाता है। “फ्री टाइम” का मतलब टीवी या मोबाइल मान लिया जाता है। पढ़ाई के नाम पर लैपटॉप/मोबाइल दिए जाते हैं, पर उपयोग का कोई स्पष्ट नियम नहीं होता। ऐसे माहौल में बच्चे को यह सिखाना कि “तुम क्यों फोन पर ज्यादा रहते हो?” अपने आप में विरोधाभास है। बच्चा सुन नहीं रहा, वह कॉपी कर रहा है।
माता-पिता की जिम्मेदारी सबसे ज्यादा और सबसे कठिन है। ज़्यादातर माता-पिता बुरे इरादे से नहीं, मजबूरी और अनजाने में गलत फैसले लेते हैं काम का दबाव, थकान या समय की कमी के कारण बच्चे को संभालने की जगह उसे स्क्रीन दे देना। “सबके पास है, मेरे बच्चे के पास न हो तो वह पीछे रह जाएगा” यह डर। टेक्नोलॉजी के बारे में खुद जानकारी कम होना कौन सा ऐप सुरक्षित है, किससे खतरा हो सकता है, यह न जानना।
फिर भी, माता-पिता से कुछ बुनियादी जिम्मेदारियाँ नहीं टाली जा सकतीं उम्र के अनुसार स्क्रीन टाइम की सीमा तय करना। घर में कुछ “स्क्रीन-फ्री ज़ोन” और “स्क्रीन-फ्री टाइम” बनाना।खुद भी सामने फोन कम इस्तेमाल करना, ताकि बच्चा देख कर सीखे। बच्चे से खुलकर बात करना सिर्फ डांटना नहीं, उसकी डिजिटल दुनिया को समझना।
आज स्कूल भी डिजिटल पर निर्भर हैं ऑनलाइन होमवर्क, प्रोजेक्ट, व्हाट्सऐप ग्रुप, स्मार्ट क्लास, आदि। इससे फायदा भी है, लेकिन खतरा भी पढ़ाई के नाम पर दी गई स्क्रीन ही आगे मनोरंजन और लत का रास्ता बन जाती है। कई स्कूलों में बच्चों को “डिजिटल साक्षरता” तो सिखाई जाती है, पर “डिजिटल अनुशासन” और “डिजिटल मानसिक स्वास्थ्य” पर गंभीर चर्चा नहीं होती। नोट्स, प्रोजेक्ट और असाइनमेंट कई बार ऐसे बनाए जाते हैं कि बिना फोन/इंटरनेट के पूरा ही नहीं हो सकते।
स्कूल यह कर सकते हैं पाठ्यक्रम में “डिजिटल वेलबीइंग” पर एक छोटा अनिवार्य मॉड्यूल शामिल करना। छात्रों, शिक्षकों और माता-पिता के लिए वर्कशॉप स्क्रीन टाइम, साइबर बुलिंग, गेमिंग लत, नींद पर असर, आदि पर। स्कूल प्रांगण में मोबाइल उपयोग पर स्पष्ट और सख्त नियम साथ ही उनका पालन, केवल कागज़ पर नहीं। “ऑफ़लाइन” गतिविधियाँ, खेल, कला, नाटक, वाद-विवाद को बढ़ावा देना, ताकि बच्चों के पास स्क्रीन के अलावा भी खुशी और खुद को व्यक्त करने के साधन हों।
सच बात यह है कि आज की ज़्यादातर ऐप्स और गेम्स ऐसे डिज़ाइन की जाती हैं कि उपयोगकर्ता उन्हें छोड़ न पाए लगातार नोटिफिकेशन, “फियर ऑफ मिसिंग आउट” (FOMO) पैदा करने वाले मैसेज। अनंत स्क्रॉल ऊपर की सीमा ही नहीं, बस खींचते जाओ।रिवार्ड, लेवल, स्ट्रीक, बैज जो दिमाग में बार-बार “डोपामिन” की छोटी-छोटी खुराक देते हैं। एल्गोरिदम जो देखते हैं कि आपको क्या पसंद है और फिर वही चीज़ लगातार आगे परोसते जाते हैं।
किशोरों के लिए यह जाल और गहरा है, क्योंकि उनकी आत्म-छवि बन रही होती है, इसलिए लाइक्स और कमेंट्स पर उनका मन आसान से निर्भर हो जाता है। वे जोखिम के परिणाम पूरी तरह नहीं समझते, पर रोमांच और जिज्ञासा जल्दी आकर्षित करती है।
यहाँ टेक कंपनियों की नैतिक जिम्मेदारी बनती है 18 साल से कम उम्र के उपयोगकर्ताओं के लिए डिफ़ॉल्ट रूप से कम नोटिफिकेशन, सीमित स्क्रीन टाइम टूल, और सख्त प्राइवेसी सेटिंग्स देना। बच्चों व किशोरों के लिए लक्षित विज्ञापन, जुए जैसी गेमिंग मिकैनिक्स, और अति-उत्तेजक कंटेंट को सीमित करना।“डिजिटल वेलबीइंग” फीचर्स केवल दिखावे के लिए नहीं, बल्कि सचमुच उपयोगी और उपयोग में आसान बनाना।
जब किसी चीज़ का असर पूरे समाज पर हो, तो सरकार की जिम्मेदारी भी तय होती है। शराब, तंबाकू, जुआ आदि पर नियम और चेतावनी हैं, पर डिजिटल लत पर अभी स्पष्ट, व्यापक नीति बहुत कम है।
नीतिगत स्तर पर ज़रूरी कदम हो सकते हैं नाबालिगों के लिए सोशल मीडिया और गेमिंग प्लेटफॉर्म पर कड़े उम्र-सत्यापन के नियम।बच्चों को लक्षित एल्गोरिदमिक कंटेंट और विज्ञापनों पर सीमाएँ। स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य और डिजिटल वेलबीइंग को लेकर राष्ट्रीय स्तर की गाइडलाइन। शोध और डेटा संग्रह के लिए समर्थन, ताकि समस्या की सही तस्वीर सामने आए और उसके अनुसार नीति बने।
कई बार माता-पिता, शिक्षक और मीडिया किशोरों को सिर्फ “पीड़ित” या “दोषी” मानकर बात खत्म कर देते हैं। लेकिन यह पीढ़ी बहुत जागरूक भी है। जब उसे भरोसा, जानकारी और सहयोग मिलता है, तो यही बच्चे स्वयं स्क्रीन टाइम सीमित करने के ऐप इस्तेमाल करते हैं। “डिजिटल डिटॉक्स” चैलेंज लेते हैं। अपने दोस्तों को भी गेमिंग/रील्स की हद से बाहर निकलने के लिए प्रेरित करते हैं। ऑफलाइन हॉबी, खेल, संगीत, लेखन, पढ़ने की आदतें विकसित करते हैं।
अब मूल सवाल पर लौटें “किशोरों की डिजिटल लत के लिए जिम्मेदार कौन? ”केवल किशोरों को दोष देना गलत होगा – वे वह वापिस कर रहे हैं जो हमने उन्हें दिया। माता-पिता की अनदेखी और गलत उदाहरण जिम्मेदार हैं। स्कूलों का डिजिटल अनुशासन पर कमजोर फोकस जिम्मेदार है। टेक कंपनियों के लालची और लत-पैदा करने वाले डिज़ाइन जिम्मेदार हैं। सरकार की धीमी और अधूरी नीतियाँ जिम्मेदार हैं। इसलिए सही बात यह है कि यह “साझी जिम्मेदारी” है। समस्या भी सामूहिक है, समाधान भी सामूहिक ही होगा।
डिजिटल दुनिया अब जीवन का हिस्सा है, उसे पूरी तरह खत्म करना न संभव है, न ज़रूरी। लेकिन यह तय करना बहुत ज़रूरी है कि “कौन किसे चला रहा है” हम स्क्रीन को या स्क्रीन हमें? किशोरों की डिजिटल लत का सवाल केवल आंकड़ों, ऐप्स और नीतियों का नहीं, रिश्तों का है। जब घर में बात, भरोसा, साथ और समझ बढ़ती है, तो बच्चा स्क्रीन में कम और जीवन में ज़्यादा अर्थ खोजने लगता है।



