दिल्ली की जहरीली हवा— सरकार के पास नहीं pollution का कोई solution….

दिल्ली की हवा ज़हर बन चुकी है—यह तथ्य कोई नई खबर नहीं। हर साल सर्दियों में यह शहर गैस चेंबर में बदल जाता है, और हर साल वही नाटक दोहराया जाता है: सरकारें मीटिंगें करती हैं, विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं, अदालतें फटकार लगाती हैं, और जनता धीरे-धीरे दम घोंटने को अपनी किस्मत मान लेती है।
जिस शहर में सांस लेना कठिन हो जाए, वहां ‘विकास’ और ‘स्मार्ट सिटी’ के सपने एक क्रूर मज़ाक से ज़्यादा कुछ नहीं।
सरकारें घोषणा करती हैं, प्रदूषण उन्हें धता बता देता है
कंफ्यूज़ नीतियाँ, काग़ज़ी योजनाएँ और एक-दूसरे पर आरोपों की सस्ती राजनीति—दिल्ली के प्रदूषण पर यही “पॉलिसी” लागू है।
पराली जली तो पंजाब-दोषी, हवा रुकी तो मौसम-दोषी, धुआँ बढ़ा तो उद्योग-दोषी।
पर सवाल यह है—सरकारें क्या सिर्फ दोष ढूँढने के लिए चुनी गई हैं? समाधान के लिए नहीं?
स्मॉग टावर, जल छिड़काव, ग्रेडेड रिस्पॉन्स प्लान—ये सब प्रदूषण नहीं, नागरिकों के गुस्से को ठंडा करने के उपकरण बन चुके हैं।
दिल्ली का प्रदूषण—एक सामूहिक हत्या है
PM2.5 का स्तर WHO मानक से 30–50 गुना अधिक हो जाता है।
यह हवा नहीं—एक धीमी मौत है, जिसे हम रोज़ सांसों के साथ अपने भीतर खींच रहे हैं।
लाखों बच्चे अपूर्ण फेफड़ों के साथ बड़े हो रहे हैं, बुजुर्गों की जान हर सांस पर टिकी है…..गर्भवती महिलाओं में जोखिम दोगुना हो चुका है, दिल के मरीजों को मौत के कितने और अलर्ट चाहिए?
यह किसी आपदा से कम नहीं…..पर क्या सरकारों को यह दिखता है? लगता नहीं।
क्या दिल्ली के नागरिक गैस चेंबर में जीने को मजबूर हैं?
दिल्ली की जनता भी कम दोषी नहीं।
जितनी आसानी से वे सरकारों को माफ़ कर देते हैं, उतनी ही आसानी से वे अपने बच्चों के फेफड़े भी दांव पर लगा देते हैं।
बिना ज़रूरत कारें निकालना, कचरा जलाना, मास्क न पहनना, और फिर उसी हवा की शिकायत करना.
जब पूरा शहर दम घुटने से कराहता है, तब भी सड़कों पर कारों का सैलाब कम नहीं होता।
क्या हम वास्तव में हवा को लेकर गंभीर हैं या सिर्फ शिकायत करने का अधिकार बचाए रखना चाहते हैं?
लोकतंत्र में बिना जिम्मेदारी सिर्फ अधिकारों की बात करना एक अच्छे नागरिक की निशानी नहीं है.
राजनीतिक इच्छाशक्ति पूरी तरह गायब
दिल्ली का प्रदूषण कोई ‘प्राकृतिक समस्या’ नहीं है—यह तीन स्तर की सरकारों की नाकामी है: केंद्र, दिल्ली सरकार और पड़ोसी राज्य
तीनों एक-दूसरे को दोष देने में इतने व्यस्त हैं कि समाधान उनकी प्राथमिकता सूची में कहीं है ही नहीं। सत्ता का खेल इतना गंदा हो चुका है कि एक शहर की जहरीली हवा भी इसे बदल नहीं पाती।
पराली: स्थायी समाधान जानबूझकर क्यों नहीं खोजा जाता?
पंजाब और हरियाणा में पराली का स्थायी समाधान आज भी सपना क्यों है?
आज तकनीकी उपलब्ध है। प्रदुषण भारत के अलावा कई विकाशील देशों की भी समस्या रहा है पर कई देशों ने इस समस्या का समाधान ढूंढने में सफलता पायी है। सरकार को उन देशों के अनुभवों से कुछ सीखना चाहिए.
तकनीकी, संसाधनों की उपलब्धता होने के बावजूद सिर्फ राजनीतिक ईच्छाशक्ति के अभाव में दिल्ली और आस-पास के इलाकों में रह रहे लोग गैस चैंबर में जीने को मजबूर हैं.
दिल्ली को सांस लेने का अधिकार कब मिलेगा?
मान लीजिए—किसी देश में पानी में जहर मिला दिया जाए, या दूध में पारा डाल दिया जाए।
क्या यह अपराध होगा? बिल्कुल।…..तो फिर हवा में घुला यह ज़हर अपराध क्यों नहीं माना जाता?
क्यों दिल्ली के नागरिक गैस चैंबर में जीने को मजबूर हैं?
क्या हम मौत को सामान्य मानने लगे हैं?
यह प्रश्न सबसे खतरनाक है।
क्योंकि जब समाज अपने दुख से समझौता कर लेता है, तो सरकारें प्राकृतिक रूप से और अधिक गैर-जिम्मेदार हो जाती हैं।
हर साल लाखों लोग बीमार पड़ते हैं, अस्पताल भरे रहते हैं….बच्चे इनहेलर लेकर स्कूल जाते हैं।और हम सब इसे ‘सर्दी का मौसम’ कहकर आगे बढ़ जाते हैं।
क्या हम कभी चेतेंगे?
निचोड़–
दिल्ली के नागरिकों को केवल प्लांटेड बहसों, प्रेस कॉन्फ्रेंस और दिशाहीन बैठकों से कुछ नहीं मिलेगा।
जरूरत है— बड़ी और कठोर नीति की, राजनीतिक इच्छाशक्ति की, और सबसे अधिक—जन जागरण की.
जब तक सरकारों की जवाबदेही तय नहीं होगी, जब तक सरकारों के लिए जनता का स्वास्थ्य प्राथमिकता नहीं होगा, जब तक जनता अपनी आदतों को नहीं बदलेगी.
तब तक दिल्ली की हवा और अधिक बदरंग होती जायेगी।
आज सवाल केवल इतना नहीं कि खराब हवा कब सुधरेगी।
सवाल यह है—हम अपनी और अपने बच्चों की सांसों की कीमत कब समझेंगे..?



