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एक नाज़ुक ठहराव: क्या 72 घंटे का संघर्षविराम थाईलैंड-कंबोडिया के दशकों पुराने घाव भर पाएगा?

संघर्षविराम या रणनीतिक विराम?

दक्षिण-पूर्व एशिया के जंगलों और प्राचीन पत्थरों के बीच एक ऐसी लड़ाई छिड़ी हुई है जो जितनी ज़मीन की है, उससे कहीं ज़्यादा आत्म-सम्मान और इतिहास की है। थाईलैंड और कंबोडिया के बीच की सीमा पर अक्सर गोलियों की गूँज सुनाई देती है, लेकिन हाल ही में घोषित ’72 घंटे का संघर्षविराम’ (Ceasefire) एक दुर्लभ शांति लेकर आया है।

सैनिक अपनी बंदूकों की नाल नीचे कर चुके हैं, और सीमावर्ती गांवों के लोग, जो बंकरों में छिपने के आदी हो चुके हैं, राहत की सांस ले रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह 72 घंटे की शांति केवल अगली लड़ाई की तैयारी के लिए एक ‘सांस लेने की जगह’ (Breathing Space) है, या यह एक स्थायी समाधान की शुरुआत है?

इस पूरे विवाद के केंद्र में है 11वीं सदी का एक भव्य मंदिर प्रीह विहियर (Preah Vihear)। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और एक ऊँची पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। विवाद की जड़ 20वीं सदी की शुरुआत में फ्रांस के औपनिवेशिक काल के दौरान बनाए गए नक्शों में है। कंबोडिया इन फ्रांसीसी नक्शों को मानता है, जबकि थाईलैंड का कहना है कि प्राकृतिक जलविभाजन रेखा (Watershed line) के हिसाब से यह ज़मीन उसकी है। 1962 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) ने मंदिर कंबोडिया को दे दिया, लेकिन उसके आसपास की 4.6 वर्ग किलोमीटर की ज़मीन पर विवाद बना रहा। यही वह छोटा सा टुकड़ा है जो दोनों देशों के बीच बार-बार युद्ध जैसी स्थिति पैदा कर देता है।

72 घंटे का यह संघर्षविराम अंतरराष्ट्रीय दबाव और दोनों देशों के घरेलू हालातों का नतीजा हो सकता है। लेकिन इसे ‘समाधान’ समझना जल्दबाज़ी होगी। दोनों देशों में राष्ट्रवाद एक बड़ा चुनावी मुद्दा है। जब भी घरेलू राजनीति में संकट आता है, सीमा विवाद को हवा देना सबसे आसान तरीका बन जाता है। थाईलैंड में राजनीतिक अस्थिरता और कंबोडिया में मज़बूत होती सत्ता दोनों ही इस विवाद को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं। क्या यह संघर्षविराम केवल जनता का ध्यान भटकाने के लिए है?

सीमा पर तैनात सैनिकों के लिए भी यह एक मानसिक और शारीरिक बोझ है। 72 घंटे का यह समय रसद पहुँचाने, घायल सैनिकों को हटाने और मोर्चाबंदी को फिर से ठीक करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इतिहास गवाह है कि कई बार संघर्षविराम का उपयोग शांति के लिए नहीं, बल्कि शक्ति संचय के लिए किया जाता है।

थाईलैंड और कंबोडिया का यह विवाद कोई इकलौता मामला नहीं है। पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया (ASEAN क्षेत्र) में सीमा विवादों का एक जाल बिछा हुआ है जो कभी भी जानलेवा साबित हो सकता है। इन देशों के लिए सीमा केवल एक रेखा नहीं है, बल्कि यह उनकी राष्ट्रीय पहचान और ‘प्रभुसत्ता’ (Sovereignty) का प्रतीक है। ज़मीन के एक छोटे से टुकड़े को खोना भी जनता की नज़रों में ‘हार’ माना जाता है। ज़मीन के नीचे दबे खनिज या समुद्र में छिपे तेल के भंडार इन विवादों को और भी जटिल बना देते हैं। प्रीह विहियर के मामले में पर्यटन का राजस्व भी एक बड़ा कारक है।

अखबारों में इसे ‘बॉर्डर डिस्प्यूट’ कहा जाता है, लेकिन सीमा पर रहने वाले परिवारों के लिए यह ‘बर्बादी’ है। जब भी झड़पें होती हैं, स्कूल बंद हो जाते हैं और अस्पताल सेना के कब्ज़े में आ जाते हैं। एक पूरी पीढ़ी ऐसी है जो धमाकों की आवाज़ पहचान कर सोती और जागती है। हज़ारों लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ता है। वे राहत शिविरों में 72 घंटे के इस संघर्षविराम के खत्म होने का डर लिए बैठे हैं। क्या कोई नेता इन लोगों की आँखों में छिपी दहशत को देख पा रहा है?

दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों का संगठन (ASEAN) अक्सर ‘हस्तक्षेप न करने’ (Non-interference) की नीति का पालन करता है। लेकिन जब दो सदस्य देश आपस में लड़ते हैं, तो संगठन की प्रासंगिकता पर सवाल उठते हैं। आसियान ने कई बार मध्यस्थता की कोशिश की है, लेकिन दोनों देश इसे ‘द्विपक्षीय’ मामला बताकर टाल देते हैं। 72 घंटे का यह विराम शायद आसियान के पर्दे के पीछे किए गए कूटनीतिक प्रयासों का नतीजा हो सकता है।

72 घंटे की इस खिड़की को एक स्थायी दरवाज़े में बदलने के लिए कुछ कड़े कदम उठाने होंगे विवादित क्षेत्र को ‘शांति ज़ोन’ घोषित किया जाए और मंदिर के पर्यटन से होने वाली कमाई दोनों देशों में साझा हो। आधुनिक जीपीएस तकनीक और निष्पक्ष अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की मदद से सीमा का फिर से निर्धारण किया जाना चाहिए। नेताओं को समझना होगा कि शांति विकास लाती है, जबकि युद्ध केवल कब्रें और गरीबी देता है।

प्राचीन मंदिर और गौरव का इतिहास महत्वपूर्ण है, लेकिन वे इंसानी जान से कीमती नहीं हो सकते। 72 घंटे का यह संघर्षविराम एक बहुत ही ‘नाज़ुक विराम’ (Fragile Pause) है। यदि इस समय का उपयोग बातचीत के लिए नहीं किया गया, तो 73वें घंटे में फिर से तोपें गरजने लगेंगी।

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