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चंदौली के सुदूर गांवों में ‘बैंक सखी’ क्रांति: ज्योति विश्वकर्मा और नसरीन बानो बनीं वित्तीय समावेशन की नई मशाल

NRLM के तहत घर-घर पहुंचा रहीं बैंकिंग सेवाएं

पूर्वांचल के धान के कटोरे कहे जाने वाले जनपद चंदौली के सुदूर ग्रामीण अंचलों में सामाजिक बदलाव और महिला सशक्तिकरण की एक मूक, किंतु युगांतरकारी क्रांति आकार ले रही है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (National Rural Livelihoods Mission – NRLM) के अंतर्गत प्रशिक्षित ‘बैंक कॉरेस्पॉन्डेंट सखी’ (BC Sakhi) के रूप में काम कर रही ज्योति विश्वकर्मा (Jyoti Vishwakarma) और नसरीन बानो (Nasreen Bano) जैसी साधारण ग्रामीण महिलाएं आज न केवल अपने परिवारों की आर्थिक रीढ़ बन चुकी हैं, बल्कि सुदूर गांवों में वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) का सबसे भरोसेमंद चेहरा बनकर उभरी हैं।
पारंपरिक सामाजिक बंधनों, पितृसत्तात्मक झिझक और चारदीवारी की सीमाओं को तोड़कर इन महिलाओं ने हाथ में माइक्रो-एटीएम (Micro-ATM), बायोमेट्रिक फिंगरप्रिंट स्कैनर और टैबलेट थामकर गांव-गांव, घर-घर और ग्राम पंचायतों तक बैंकिंग प्रणाली की पहुंच सुनिश्चित की है। वृद्ध, विधवा, दिव्यांग पेंशनर्स और मनरेगा श्रमिकों के लिए जो बैंक शाखाएं कई किलोमीटर दूर एक दुर्गम चुनौती हुआ करती थीं, आज वही बैंक ‘सखी’ के रूप में उनकी चौखट पर चलकर आ रहा है।
शुरुआत में जब ज्योति ने अपने कंधे पर लैपटॉप और हाथ में बायोमेट्रिक मशीन लेकर गांव की गलियों में निकलना शुरू किया, तो कई लोगों ने संशय जताया। किंतु उन्होंने अपने धैर्य और निष्ठा से हर ग्रामीण का विश्वास जीता। आज वे हर माह लाखों रुपयों का लेन-देन कुशलतापूर्वक संभालती हैं और अपने परिवार की शिक्षा व स्वास्थ्य खर्च में बराबर की साझीदार हैं।
पारंपरिक रूढ़िवादिता और पर्दा प्रथा के माहौल से बाहर निकलकर नसरीन बानो ने न केवल डिजिटल तकनीक को तेजी से सीखा, बल्कि मुस्लिम बहुल बस्तियों में महिलाओं के बीच वित्तीय साक्षरता की अलख जगाई। वे उन बुजुर्ग महिलाओं के लिए वरदान साबित हुईं जो शारीरिक दुर्बलता या पर्दा प्रथा के कारण दूर बैंक शाखाओं में नहीं जा सकती थीं।
चंदौली के नक्सल-प्रभावित और पिछड़े इलाकों (जैसे नौगढ़ या चकिया के सीमावर्ती मजरे) में किसी भी राष्ट्रीयकृत बैंक की शाखा 8 से 12 किलोमीटर दूर स्थित होती है। वहां आने-जाने में एक ग्रामीण का पूरा दिन नष्ट हो जाता था और ₹50 से ₹100 किराये में खर्च हो जाते थे। अक्सर सर्वर डाउन होने पर बिना पैसे लिए लौटना पड़ता था। बीसी सखी के आने से व्यवस्था पूरी तरह बदल गई है। अब वृद्ध महिलाओं को बस अपना आधार नंबर बताना होता है और बायोमेट्रिक स्कैनर पर अंगूठा लगाना होता है। माइक्रो-एटीएम से तुरंत नकदी निकलती है और मौके पर ही पर्ची (Receipt) मिल जाती है। पीएम-किसान सम्मान निधि की ₹2,000 की किस्त हो या ₹1,000 की वृद्धावस्था पेंशन, जैसे ही दिल्ली या लखनऊ से डीबीटी का बटन दबता है, ज्योति और नसरीन अपने गांव में लोगों के दरवाजे पर पहुंचकर पैसे थमा देती हैं।
चंदौली की यह कहानी भारत के उस वृहद संरचनात्मक बदलाव का जीवंत उदाहरण है, जहां महिलाएं केवल लाभार्थी (Beneficiary) नहीं, बल्कि आर्थिक विकास की संवाहक (Change-makers) बन रही हैं जब एक ग्रामीण महिला अपने दम पर 10-15 हजार रुपये प्रतिमाह कमाती है, तो परिवार के भीतर उसके विचार और उसकी सहमति का मूल्य बढ़ जाता है। ज्योति और नसरीन को काम करते देखकर गांव की किशोरियां और युवतियां भी अब उच्च शिक्षा, डिजिटल कौशल और आत्मनिर्भरता के सपने देख रही हैं।

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