
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा गुरुवार, 5 मार्च 2026 को की गई राज्यपालों और उपराज्यपालों की व्यापक नियुक्तियां भारतीय संवैधानिक इतिहास के सबसे बड़े प्रशासनिक फेरबदल में से एक हैं। यह केवल सरकारी पदों का स्थानांतरण नहीं है, बल्कि आगामी राज्यसभा चुनावों और 2026 के अंत में होने वाले पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों की रणनीतिक बिसात पर केंद्र सरकार द्वारा की गई एक निर्णायक ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 155 और 156 के तहत राष्ट्रपति को राज्यपालों की नियुक्ति और उनके कार्यकाल को निर्धारित करने का अधिकार है। गुरुवार की रात राष्ट्रपति भवन से जारी विज्ञप्ति ने राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी। इस फेरबदल का सबसे बड़ा केंद्र बिंदु पश्चिम बंगाल और दिल्ली रहे हैं, जहाँ नियुक्तियों के माध्यम से केंद्र ने अपनी भविष्य की प्राथमिकताओं को स्पष्ट कर दिया है।
तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि को पश्चिम बंगाल का नया राज्यपाल नियुक्त करना इस पूरे फेरबदल की सबसे महत्वपूर्ण घटना है। डॉ. सी.वी. आनंद बोस का कार्यकाल विवादों और फिर ममता सरकार के साथ अचानक आए ‘मृदु व्यवहार’ (Soft Approach) के बीच झूल रहा था। उनके इस्तीफे के पीछे केंद्र की यह मंशा साफ दिखती है कि बंगाल जैसे संवेदनशील राज्य में चुनाव से पहले एक ‘सख्त और अनुभवी’ प्रशासक की जरूरत है।
पूर्व आईपीएस अधिकारी और नागालैंड समझौते के वार्ताकार रहे रवि अपनी ‘संवैधानिक सक्रियता’ के लिए जाने जाते हैं। तमिलनाडु में मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के साथ उनके टकरावों ने यह साबित किया कि वे केंद्र की नीतियों और संवैधानिक मर्यादाओं के साथ कोई समझौता नहीं करते। पश्चिम बंगाल में चुनाव पूर्व हिंसा और कानून-व्यवस्था के मुद्दों पर आर.एन. रवि का अनुभव केंद्र के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करेगा। तृणमूल कांग्रेस ने इस नियुक्ति को “टकराव की राजनीति” की शुरुआत बताया है।
दिल्ली के उपराज्यपाल (LG) के रूप में वी.के. सक्सेना का कार्यकाल काफी सक्रिय रहा, लेकिन उनके लद्दाख स्थानांतरण के बाद तरनजीत सिंह संधू की नियुक्ति ने सबको चौंका दिया। संधू अमेरिका में भारत के राजदूत रह चुके हैं और भारत-अमेरिका परमाणु समझौते से लेकर हालिया व्यापारिक संधियों तक में उनकी भूमिका अहम रही है। दिल्ली जैसे वैश्विक महानगर, जो देश की राजधानी भी है, वहां एक मझे हुए राजनयिक को लाना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दिल्ली की छवि सुधारने की कोशिश है। संधू का शांत लेकिन दृढ़ स्वभाव दिल्ली सरकार (AAP) और केंद्र के बीच जारी ‘फाइलों के युद्ध’ को एक नया मोड़ दे सकता है। जहाँ वी.के. सक्सेना सीधे टकराव के लिए जाने जाते थे, संधू अपने कूटनीतिक कौशल से व्यवस्था को सुव्यवस्थित कर सकते हैं।
बिहार में सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन की नियुक्ति आंतरिक सुरक्षा और सामाजिक समीकरणों के लिहाज से एक ‘मास्टरस्ट्रोक’ है। कश्मीर में अपनी सेवाओं और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) में अपने अनुभव के कारण, जनरल हसनैन एक मजबूत प्रशासक माने जाते हैं। बिहार में जातिगत जनगणना और राजनीतिक उथल-पुथल के बीच उनकी उपस्थिति शासन में स्थिरता का संदेश देगी। मुस्लिम समुदाय से आने वाले एक पूर्व सैन्य अधिकारी को राज्यपाल बनाना केंद्र की ‘सबका साथ, सबका विकास’ की छवि को मजबूत करता है।
| राज्य / UT | नया प्रमुख | रणनीतिक महत्व |
| महाराष्ट्र | जिष्णु देव वर्मा | आगामी महाराष्ट्र चुनावों को देखते हुए एक अनुभवी आदिवासी चेहरे को कमान। |
| लद्दाख (LG) | वी.के. सक्सेना | सीमावर्ती तनाव और स्थानीय 6वीं अनुसूची की मांग को संभालने के लिए कड़ा प्रशासक। |
| तेलंगाना | शिव प्रताप शुक्ला | दक्षिण भारत में भाजपा के विस्तार और प्रशासनिक समन्वय के लिए अनुभवी ब्राह्मण चेहरा। |
| केरल | बनवारीलाल पुरोहित | पी. विजयन सरकार के साथ संवैधानिक संवाद को प्रभावी बनाने के लिए अनुभवी नेता। |
यह फेरबदल राज्यसभा चुनावों के ठीक पहले हुआ है। राज्यपालों की भूमिका निर्वाचित विधायकों की शपथ, चुनाव प्रक्रिया की निगरानी और केंद्र को रिपोर्ट भेजने में महत्वपूर्ण होती है। केंद्र सुनिश्चित करना चाहता है कि सभी राज्यों में ऐसे संवैधानिक प्रमुख हों जो कानून-व्यवस्था और पारदर्शिता पर कड़ा नियंत्रण रखें।
हमेशा की तरह, इस फेरबदल पर विपक्ष ने सवाल उठाए हैं। विपक्षी दलों का तर्क है कि राज्यपालों का उपयोग केंद्र द्वारा राज्य सरकारों को अस्थिर करने या उन पर दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है। सेवानिवृत्त अधिकारियों और राजनयिकों की बड़ी संख्या यह दर्शाती है कि केंद्र ‘कैरियर पॉलिटिशियन’ के बजाय ‘एक्जीक्यूटिव माइंडसेट’ वाले लोगों को तरजीह दे रहा है।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का यह निर्णय केवल व्यक्तियों का बदलाव नहीं है, बल्कि यह केंद्र सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ वाली प्रशासनिक नीति का विस्तार है। आर.एन. रवि का बंगाल जाना और तरनजीत संधू का दिल्ली आना यह संकेत देता है कि केंद्र अब राज्यों के साथ अपने संबंधों में किसी भी प्रकार की ‘प्रशासनिक ढिलाई’ बर्दाश्त नहीं करेगा। आने वाले महीनों में, ये नए राज्यपाल अपनी-अपनी कार्यशैली से राज्यों की राजनीति और शासन के भविष्य को परिभाषित करेंगे।



