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भारत-दक्षिण कोरिया आर्थिक कूटनीति का नया क्षितिज: ‘कोरिया एन्क्लेव’ की घोषणा और $50 बिलियन के व्यापार का महा-संकल्प

पीयूष गोयल के संबोधन और मोदी-ली शिखर वार्ता

21 अप्रैल, 2026 की तिथि भारत और दक्षिण कोरिया के द्विपक्षीय संबंधों में एक मील का पत्थर बनकर उभरी है। नई दिल्ली के वाणिज्यिक गलियारों में आयोजित ‘भारत-दक्षिण कोरिया बिजनेस फोरम’ के दौरान जो गर्मजोशी दिखी, वह केवल कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि भविष्य की आर्थिक महाशक्ति बनने की दिशा में एक ठोस कदम है। केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने इस मंच से भारत में एक समर्पित ‘कोरिया एन्क्लेव’ (Korea Enclave) स्थापित करने की ऐतिहासिक घोषणा की।

यह पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्युंग (Lee Jae-myung) के बीच हुई गहन चर्चाओं का परिणाम है। दोनों नेताओं ने न केवल अपने आर्थिक लक्ष्यों को पुनर्परिभाषित किया है, बल्कि वैश्विक अस्थिरता के इस दौर में शांति और स्थिरता का साझा संदेश भी दिया है।

पीयूष गोयल द्वारा घोषित ‘कोरिया एन्क्लेव’ भारत की ‘प्लग एंड प्ले’ (Plug and Play) औद्योगिक नीति का सबसे परिष्कृत रूप है। यह कोई सामान्य औद्योगिक क्षेत्र नहीं, बल्कि दक्षिण कोरियाई कंपनियों की विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुसार तैयार किया गया एक ‘मिनी-कोरिया’ होगा। इस एन्क्लेव में कोरियाई कार्य संस्कृति के अनुरूप विश्व स्तरीय बुनियादी ढांचा होगा। इसमें न केवल कारखाने होंगे, बल्कि कोरियाई कर्मियों के लिए विशेष आवास, स्कूल, अस्पताल और सांस्कृतिक केंद्र भी शामिल होंगे।

यद्यपि स्थान की अंतिम घोषणा अभी बाकी है, लेकिन उत्तर प्रदेश के नोएडा (जेवर एयरपोर्ट के पास), गुजरात (धोलेरा) या तमिलनाडु (चेन्नई के पास) को प्रबल दावेदार माना जा रहा है, जहाँ पहले से ही सैमसंग और हुंडई जैसी कंपनियों की मजबूत उपस्थिति है। पीयूष गोयल ने स्पष्ट किया कि इस एन्क्लेव के भीतर आने वाली कंपनियों को ‘सिंगल विंडो क्लीयरेंस’ से आगे बढ़कर ‘जीरो-टच गवर्नेंस’ का अनुभव मिलेगा। नियमों को सरल बनाया जाएगा ताकि दक्षिण कोरिया की दिग्गज कंपनियों के साथ-साथ उनके ‘टियर-2’ और ‘टियर-3’ वेंडर (MSMEs) भी भारत में निवेश कर सकें।

भारत और दक्षिण कोरिया ने वर्तमान व्यापारिक परिदृश्य को बदलने के लिए एक साहसी निर्णय लिया है। दोनों देशों ने 2030 तक अपने द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाकर $50 बिलियन करने का संकल्प लिया है। वर्तमान में द्विपक्षीय व्यापार $28-30 बिलियन के आसपास मंडरा रहा है। $50 बिलियन का लक्ष्य हासिल करने के लिए अगले चार वर्षों में लगभग 15-18% की वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) की आवश्यकता होगी।

भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती व्यापार घाटा है। पीयूष गोयल ने दक्षिण कोरियाई नेतृत्व से आग्रह किया है कि वे भारतीय कृषि उत्पादों (जैसे अंगूर, आम, और चावल), फार्मास्यूटिकल्स और स्टील के लिए अपने बाजार और अधिक खोलें। वैश्विक स्तर पर ‘चीन प्लस वन’ (China Plus One) की रणनीति के तहत, दक्षिण कोरिया अपनी मैन्युफैक्चरिंग चेन को भारत में स्थानांतरित करना चाहता है, जिससे भारत का निर्यात आधार मजबूत होगा।

व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते (CEPA), जो 2010 से प्रभावी है, को अब पुराना माना जा रहा है। मोदी और ली की वार्ता में इसे अपग्रेड करने पर विशेष जोर दिया गया। दोनों नेताओं ने प्रतिबद्धता जताई है कि अगले 12 महीनों के भीतर सीईपीए के उन्नयन (Upgrading) की प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी।

नए समझौते में डिजिटल व्यापार, ई-कॉमर्स, ग्रीन एनर्जी और सप्लाई चेन लचीलेपन (Supply Chain Resilience) जैसे आधुनिक विषयों को शामिल किया जाएगा। भारत चाहता है कि उसके आईटी पेशेवरों और स्वास्थ्य सेवा कर्मियों के लिए दक्षिण कोरिया में वीजा नियम आसान हों, जबकि कोरिया भारत के सेमीकंडक्टर और ईवी (EV) इकोसिस्टम में अधिक पहुंच चाहता है।

प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ली जे-म्युंग के बीच हुई मुलाकात ने यह सिद्ध कर दिया कि दोनों देश केवल आर्थिक भागीदार नहीं, बल्कि रणनीतिक सहयोगी भी हैं। दोनों नेताओं ने ‘स्वतंत्र, खुले और समावेशी हिंद-प्रशांत क्षेत्र’ की वकालत की। दक्षिण कोरिया की ‘इंडो-पैसिफिक स्ट्रेटेजी’ और भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ के बीच गहरे तालमेल पर चर्चा हुई। दक्षिण कोरियाई तकनीक से निर्मित ‘के-9 वज्र’ तोपों की सफलता के बाद, अब दोनों देश उन्नत युद्धपोतों, पनडुब्बी निर्माण और सैन्य परिवहन विमानों के क्षेत्र में सह-उत्पादन (Co-production) पर विचार कर रहे हैं।

वर्तमान में यूक्रेन और पश्चिम एशिया के संकटों के बीच, मोदी और ली ने साझा संदेश दिया कि विकास के लिए शांति अनिवार्य है। उन्होंने परमाणु अप्रसार और आतंकवाद के खिलाफ शून्य सहिष्णुता (Zero Tolerance) की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।

लक्ष्य का वर्ष द्विपक्षीय व्यापार लक्ष्य प्रमुख फोकस क्षेत्र
2026-27 $32-34 बिलियन सीईपीए अपग्रेडेशन और एन्क्लेव साइट फाइनल करना।
2028-29 $42-45 बिलियन सेमीकंडक्टर फैब और ईवी बैटरी उत्पादन की शुरुआत।
2030 $50 बिलियन रक्षा और हाई-टेक एक्सपोर्ट में भारत-कोरिया की वैश्विक हिस्सेदारी।

यद्यपि ‘कोरिया एन्क्लेव’ और $50 बिलियन का लक्ष्य सुनने में आकर्षक हैं, लेकिन इनके सामने कुछ वास्तविक चुनौतियां भी हैं दक्षिण कोरिया के कड़े स्वच्छता और गुणवत्ता मानकों के कारण भारतीय खाद्य उत्पादों को अक्सर कठिनाई होती है। इसे तकनीकी स्तर पर सुलझाना होगा। एन्क्लेव के लिए राज्यों के साथ समन्वय और भूमि हस्तांतरण की प्रक्रिया को तेज करना होगा ताकि निवेशकों का विश्वास बना रहे। वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देश भी दक्षिण कोरियाई निवेश के लिए भारत को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। भारत को अपनी पीएलआई (PLI) योजनाओं को और अधिक आकर्षक बनाना होगा।

वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल का ‘कोरिया एन्क्लेव’ का प्रस्ताव भारत की ‘वैश्विक फैक्ट्री’ बनने की महत्वाकांक्षा का एक जीवंत उदाहरण है। दक्षिण कोरिया के पास तकनीक और पूंजी है, जबकि भारत के पास दुनिया का सबसे बड़ा बाजार और कुशल युवा कार्यबल है। मोदी-ली वार्ता ने इस पूरकता (Complementarity) को एक औपचारिक रणनीतिक ढांचे में ढाल दिया है।

यदि अगले एक साल में सीईपीए का सफल अपग्रेडेशन होता है और ‘कोरिया एन्क्लेव’ की जमीन पर नींव रखी जाती है, तो 2030 तक $50 बिलियन का लक्ष्य केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों और कोरियाई लोगों के लिए समृद्धि का नया द्वार होगा। भारत और दक्षिण कोरिया के इस ‘आर्थिक विवाह’ से न केवल दोनों देशों का लाभ होगा, बल्कि यह एशिया में शक्ति संतुलन के लिए भी एक निर्णायक मोड़ साबित होगा।

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