रक्षा विनिर्माण में आत्मनिर्भरता का ऐतिहासिक शिखर
भारत का वार्षिक रक्षा उत्पादन ₹1.78 लाख करोड़ के सर्वकालिक उच्च स्तर पर, 5 वर्षों में 110% की अप्रत्याशित वृद्धि

17 June 2026 को भारत के रक्षा पटल, राष्ट्रीय सुरक्षा और औद्योगिक सुशासन (Industrial Governance) के इतिहास में एक अत्यंत गौरवशाली और ऐतिहासिक मील का पत्थर स्थापित हुआ है। रक्षा मंत्रालय (MoD) द्वारा बुधवार को जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2025-2026 में भारत का वार्षिक रक्षा उत्पादन (Annual Defence Production) ₹1.78 लाख करोड़ के अब तक के सबसे उच्चतम और सर्वकालिक रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया है।
रक्षा मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत किए गए तुलनात्मक वित्तीय आंकड़े देश के रक्षा औद्योगिक आधार (Defence Industrial Base) के तेजी से होते विस्तार को रेखांकित करते हैं चालू वित्तीय वर्ष का ₹1.78 लाख करोड़ का यह आंकड़ा पिछले वित्तीय वर्ष (2024-2025) के ₹1.54 लाख करोड़ के उत्पादन की तुलना में 15.6 प्रतिशत की मजबूत और कड़क वृद्धि को दर्शाता है।
यदि वित्तीय वर्ष 2020-2021 से तुलना की जाए, जब देश का कुल रक्षा उत्पादन ₹84,643 करोड़ था, तो पिछले पांच वर्षों में इसमें 110 प्रतिशत की भारी और आश्चर्यजनक वृद्धि दर्ज की गई है। साल 2013-2014 में भारत का स्वदेशी रक्षा उत्पादन मात्र ₹43,746 करोड़ था। इसकी तुलना में आज देश का स्वदेशी रक्षा विनिर्माण लगभग चार गुना बढ़कर वैश्विक रक्षा बाजार को चुनौती दे रहा है।
इस ऐतिहासिक सफलता की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें सार्वजनिक क्षेत्र के साथ-साथ निजी उद्योगों की भागीदारी का ग्राफ भी अपने सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुँच गया है रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (DPSUs) और अन्य सार्वजनिक इकाइयों ने कुल उत्पादन में लगभग 76 प्रतिशत का कड़ा योगदान दिया है।
भारत के निजी रक्षा विनिर्माताओं का योगदान वित्तीय वर्ष 2024-2025 के 22 प्रतिशत से बढ़कर इस साल 24 प्रतिशत (लगभग ₹42,000 करोड़) के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुँच गया है। यह दर्शाता है कि घरेलू निजी कंपनियां अब जटिल और उच्च-मूल्य वाली रक्षा प्रणालियों की आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) में गहराई से एकीकृत हो चुकी हैं।
यह घरेलू उत्पादन क्रांति सीधे तौर पर भारत के निर्यात मोर्चे पर भी परिलक्षित हो रही है। इस साल भारत ने ₹38,424 करोड़ का रिकॉर्ड रक्षा निर्यात (Record Defence Exports) हासिल किया है, जो देश की बढ़ती सॉफ्ट पावर और कूटनीतिक संप्रभुता का प्रतीक है। “रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता केवल वित्तीय बचत का मामला नहीं है, यह किसी भी संप्रभु राष्ट्र की संप्रभुता की पहली और अंतिम कसम है। जब आपके हथियार और सुरक्षा प्रणालियां स्वदेशी होती हैं, तो संकट के समय कोई भी विदेशी ताकत आपकी विदेश नीति को प्रभावित या कूटनीतिक रूप से ब्लैकमेल नहीं कर सकती।”
यह मील का पत्थर ऐसे समय में सामने आया है जब वैश्विक भू-राजनीति में भारत का कद असाधारण रूप से बढ़ रहा है। जी7 आउटरीच शिखर सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भारत को ‘सैन्य सुरक्षा गारंटी’ देना और भारत को वैश्विक व्यवस्था की एक कड़क धुरी मानना इसी स्वदेशी सैन्य सुदृढ़ता का वैश्विक परिणाम है। घरेलू मोर्चे पर भी, सांख्यिकी मंत्रालय (MoSPI) के आंकड़ों के अनुसार 7.7% की मजबूत वार्षिक जीडीपी वृद्धि दर और शत-प्रतिशत इथेनॉल (E100) जैसे हरित ईंधन सुधारों के बीच रक्षा क्षेत्र का यह स्वर्णिम प्रदर्शन भारत को एक संपूर्ण ‘आत्मनिर्भर महाशक्ति’ के रूप में स्थापित करता है।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस ऐतिहासिक उपलब्धि का श्रेय रक्षा उत्पादन विभाग (DDP), सार्वजनिक उपक्रमों और निजी क्षेत्र के सामूहिक व कड़े प्रयासों को दिया है। लड़ाकू विमानों (तेजस), मिसाइल प्रणालियों (ब्रह्मोस), युद्धपोतों और उन्नत गोला-बारूद के स्वदेशी निर्माण ने भारतीय सशस्त्र बलों को एक नया और बेखौफ आत्मविश्वास दिया है।
₹1.78 लाख करोड़ का यह रक्षा विनिर्माण आंकड़ा देश के युवाओं और भावी वैज्ञानिकों को यह कड़ा विश्वास दिलाता है कि भारत अब रक्षा तकनीकों की नकल करने वाला देश नहीं, बल्कि तकनीकी नवाचार (Innovation) का नेतृत्व करने वाला एक वैश्विक नेविगेटर है। सरकार की कूटनीतिक और नीतिगत निरंतरता को देखते हुए यह स्पष्ट है कि भारत का रक्षा औद्योगिक आधार आने वाले वर्षों में और अधिक कड़े रिकॉर्ड स्थापित करेगा, जो हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में नियम-आधारित व्यवस्था और वैश्विक शांति की रक्षा करने में भारत के तिरंगे के मान को सदैव सर्वोच्च बनाए रखेगा।



