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न्यायिक विलंब: न्याय की धीमी गति और इसके राष्ट्रीय परिणाम

राष्ट्रीय परिणाम: लोकतंत्र पर खतरा

न्याय व्यवस्था किसी भी लोकतंत्र का आधार होती है। यह न केवल अपराधियों को सजा देती है, बल्कि निर्दोषों को न्याय भी सुनिश्चित करती है। लेकिन भारत में न्यायिक विलंब एक गंभीर समस्या बन चुका है, जहाँ औसतन एक केस को निपटाने में 9 वर्ष लग जाते हैं। उत्तर प्रदेश में यह समय 11.5 वर्ष तक है। 5 करोड़ से अधिक लंबित मामले न्यायपालिका को चोक कर रहे हैं।

2025 में सुप्रीम कोर्ट में 88,417 मामले लंबित हैं, हाई कोर्ट में 63 लाख से अधिक, और निचली अदालतों में 4.7 करोड़। राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG) के अनुसार, अधीनस्थ अदालतों में औसत निपटान समय 10 वर्ष है। हाई कोर्ट में 3-4 वर्ष। उत्तर प्रदेश सबसे प्रभावित राज्य है जहाँ 117 लाख मामले लंबे हैं। बिहार (10.5 वर्ष), पश्चिम बंगाल (10 वर्ष) और मध्य प्रदेश (9.5 वर्ष) भी पीछे नहीं। वहीं लाक्षाद्वीप (1.5 वर्ष) और लद्दाख (2 वर्ष) में तेजी से न्याय होता है।​

ये आंकड़े बताते हैं कि न्याय मिलना एक लंबी प्रतीक्षा है। भूमि विवाद (सिविल केस का 60%) और आपराधिक मामले सबसे ज्यादा प्रभावित। 61% हाई कोर्ट केस और 46% जिला कोर्ट केस 3 वर्ष से अधिक लंबे हैं।​ न्यायिक देरी कई कारणों से है। सबसे बड़ा कारण जजों की कमी। हाई कोर्ट में 33% और जिला कोर्ट में 21% पद खाली हैं। प्रति लाख लोगों पर केवल 1 जज। नई फाइलिंग 2 करोड़ प्रतिवर्ष, लेकिन निपटान केवल 1.8 करोड़।​

दूसरा कारण बार-बार स्थगन। एक केस में औसतन 3 से अधिक स्थगन। वकीलों की हड़ताल, गवाहों की अनुपस्थिति, और सबूत जुटाने में देरी। भूमि विवादों में दस्तावेज सत्यापन महीनों लगता है। तीसरा, पुरानी फाइलें। 40% मामले 5 वर्ष से पुराने। डिजिटलीकरण 80% हुआ, लेकिन अभी भी कागजी कार्यवाही बाधा।​ राजनीतिक हस्तक्षेप और भ्रष्टाचार भी समस्या बढ़ाते हैं। जजों की नियुक्ति में देरी और वकीलों का राजनीतिकरण न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करता है।

एक गरीब किसान का भूमि विवाद 10 वर्ष चला तो उसकी पूरी जिंदगी बर्बाद। कर्ज, परिवार टूटना, मानसिक तनाव। बलात्कार पीड़िता को न्याय के लिए वर्षों इंतजार। अपराधी खुले घूमते हैं क्योंकि सजा में देरी। निर्दोष जेल में सड़ते हैं। एक अध्ययन कहता है कि देरी से 70% लोग न्याय से निराश हो जाते हैं।​ महिलाओं और बच्चों पर अपराध के मामलों में देरी सबसे घातक। 8.8 लाख निष्पादन याचिकाएँ लंबी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “यह न्याय का मजाक है।”

न्यायिक देरी लोकतंत्र को कमजोर करती है। कानून का राज कमजोर होता है। अपराध बढ़ते हैं क्योंकि सजा का डर नहीं। आर्थिक नुकसान: लंबे विवाद से निवेश रुकता है। विश्व बैंक कहता है, देरी से जीडीपी पर 1-2% असर। सामाजिक विश्वास घटता है। लोग खुद न्याय करने लगते हैं मॉब लिंचिंग इसका उदाहरण।​ राजनीतिक मामलों में देरी भ्रष्टाचारियों को बचाती है। अल्पसंख्यकों पर हिंसा के केस लंबे खिंचते हैं। इससे सामाजिक तनाव बढ़ता है।

ई-कोर्ट प्रोजेक्ट फेज III से 80% डिजिटलीकरण। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सुनवाई तेज। लेकिन जजों की भर्ती धीमी। राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग विवादास्पद। वैकल्पिक विवाद निपटान (ADR) को बढ़ावा, लेकिन उपयोग कम। फास्ट ट्रैक कोर्ट कुछ मामलों में सफल।​

प्रति लाख पर 50 जज का लक्ष्य। भर्ती प्रक्रिया तेज करें। 3 से अधिक स्थगन पर जुर्माना। सभी कोर्ट पेपरलेस। AI से केस मैनेजमेंट।हड़ताल पर रोक, समयबद्ध सुनवाई। मध्यस्थता को अनिवार्य। प्रत्येक कोर्ट की मासिक रिपोर्ट संसद को। राज्य स्तर पर भी प्रयास गुजरात (7.8 वर्ष) डिजिटलीकरण से सफल। छोटे राज्यों से सीखें।

न्यायिक देरी भारत के लोकतंत्र के लिए खतरा है। 9 वर्ष का इंतजार अस्वीकार्य। सरकार, न्यायपालिका और समाज को मिलकर काम करना होगा। त्वरित न्याय से ही कानून का राज मजबूत होगा। युवा वकीलों को प्रोत्साहित करें, तकनीक अपनाएं। न्याय मिलना चाहिए—न कि इंतजार।

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