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UCC: समानता की ओर या विविधता का संकट?

सिविल कोड पर समाज में गहराता संवाद

भारतीय समाज में “समान नागरिक संहिता” यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) पर चर्चा जितनी जरूरी है, उतनी ही जटिल और संवेदनशील भी है। यह मसला केवल कानून या संविधान का नहीं, बल्कि पहचान, परंपरा, समानता और विविधता की गहराई से जुड़ा है। सवाल है क्या एकसमान कानून सबके लिए न्याय लाएगा या हमारी बहुरंगी विरासत पर आंच आएगी?

UCC का मतलब है हर धर्म, जाति, या समुदाय के नागरिक के लिए विवाह, तलाक, संपत्ति और गोद लेने जैसे मुद्दों पर समान कानून का दायरा तैयार करना। भारत का संविधान अनुच्छेद 44 के माध्यम से राज्य को यह प्रयास करने का निर्देश तो देता है, लेकिन इसे ‘निर्देशात्मक सिद्धांत’ की कैटेगरी में ही रखा गया यानी इसकी पालना बाध्यकारी नहीं है, पर यह आदर्श ज़रूर है। इसके समर्थक कहते हैं कि व्यक्तिगत कानूनों के चलते कई मौकों पर महिलाओं, बच्चों और अल्पसंख्यकों के अधिकार कुचलते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट भी शाह बानो, सरला मुद्गल, शायरा बानो जैसे फैसलों में UCC लागू करने को लेकर टिप्पणी कर चुका है।

भारत में धर्म, समुदाय और रीति-रिवाज न केवल व्यक्तिगत आस्था के हिस्से हैं बल्कि सामाजिक ताने-बाने के आधार भी हैं। जो लोग UCC के विरोधी हैं, उनका मानना है कि केवल समानता के नाम पर लोगों की सांस्कृतिक पहचान और धार्मिक आज़ादी का हनन नहीं होना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद 25-26 धार्मिक स्वतंत्रता को भी सुरक्षा देते हैं, और यही वजह है कि कई समूह संशय में हैं कि कहीं ऐतिहासिक विविधता को “सपाट एकरूपता” की भेंट न चढ़ा दिया जाए।

गौवा एकमात्र राज्य है जहां पुर्तगाली दौर का कॉमन सिविल कोड आज भी चलता है। उत्तराखंड ने पहला राज्य-स्तरीय UCC विधान हाल में पारित किया है, जिसके दायरे में विवाह, तलाक, वसीयत, संपत्ति बँटवारे आदि के लिए लैंगिक समानता को ज़ोर से रखा गया, बशर्ते कि आदिवासी मामलों व अल्पसंख्यक चिंताओं को फिलहाल छूट दी गई है। लेकिन देश की विविधता को देखते हुए सवाल उठता है क्या भारत में सचमुच “एक आकार सबको फिट” कानून बनाना संभव या न्यायपूर्ण है?

यह सच है कि आज भी कई निजी कानून महिलाओं या वंचित तबकों के प्रति पक्षपाती हैं। धार्मिक मान्यताओं के नाम पर लैंगिक असमानता या अधिकारों का हनन भी होता है। लेकिन समाज की सामूहिक पहचान, संस्कृति और विविधता को संवेदनशीलता के साथ संतुलित करना भी लोकतंत्र की आत्मा है। UCC की बहस को राजनीतिक प्रचार या ‘अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक’ की जंग नहीं, एक न्यायपूर्ण, संवादपरक और मानवता-पोषित बदलाव के तरीके से ही समझना होगा।

UCC का मकसद न्याय, समानता और राष्ट्रनिर्माण है, मगर विविधता और समुदाय की पहचान को इज्जत देना भी भारतीयता की बुनियाद है। हमें एक ऐसे समाधान की तलाश करनी होगी, जिसमें कानून आधुनिक भी हो, और विविधता का सम्मान भी बरकरार रहे। इसी से भारत अपनी मौलिकता, न्यायप्रियता और भाईचारे के साथ आगे बढ़ सकता है

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